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Mercer | Mettl CEO: मुश्किलों ने दिया शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव का मौका, ऑनलाइन एजुकेशन-एग्जाम ने दिखाई नई राह

कोविड महामारी के दौरान देश में ऑनलाइन एजुकेशन का काफी विस्तार हुआ है. मर्सर मेटल (Mercer | Mettl) के सीईओ सिद्धार्थ गुप्ता का कहना है कि सही तकनीक और एप्रोच के इस्तेमाल से इस क्षेत्र में अभी और भी बड़े बदलाव किए जा सकते हैं. 

Updated: Aug 15, 2021 5:44 PM
ऑनलाइन एग्जाम्स प्लेटफॉर्म संचालित करने वाली कंपनी मर्सर-मेटल की सर्वे रिपोर्ट पिछले करीब सवा साल के दौरान ऑनलाइन परीक्षाओं से जुड़े अनुभव और उनसे उभरने वाले संकेतों के बारे में काफी कुछ बताती है.

Online Education: Challenges and Opportunities: कोविड-19 महामारी ने देश-दुनिया में पढ़ने-पढ़ाने और परीक्षा लेने के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है. पढ़ाई की क्लास हो या तरह-तरह के एग्जाम्स, हर जगह ऑनलाइन का बोलबाला रहा है. डिजिटल ईकोसिस्टम का फैलाव हो रहा है. ऐसे में अहम सवाल यह है कि आने वाले दिनों में पढ़ाई-लिखाई और परीक्षाओं का कौन सा मॉडल सफल होने वाला है? क्या कोविड-19 के काबू में आ जाने के बाद सबकुछ फिर पहले जैसा हो जाएगा या फिर एजुकेशन की दुनिया हमेशा के लिए बदल चुकी है? देश के शिक्षण संस्थान, उनकी फैकल्टी और छात्र भविष्य में ऑनलाइन पढ़ाई और इम्तेहान को जारी रखने के लिए कितने तैयार या उत्साहित हैं? पिछले डेढ़ साल में ऑनलाइन एजुकेशन और एग्जाम का तजुर्बा भविष्य के बारे में क्या संकेत दे रहा है? 

इनमें से कई सवालों के जवाब कुछ दिनों पहले आई एक सर्वे रिपोर्ट में मिलते हैं. यह रिपोर्ट ऑनलाइन एग्जाम्स प्लेटफॉर्म विकसित और संचालित करने वाली अंतरराष्ट्रीय कंपनी मर्सर-मेटल (Mercer | Mettl) ने तैयार की है, जिसके नतीजे पिछले करीब सवा साल के अनुभवों और उनसे उभरते संकेतों के बारे में काफी कुछ बताते हैं. फाइनेंशियल एक्सप्रेस ऑनलाइन ने मर्सर-मेटल के सीईओ सिद्धार्थ गुप्ता से इस बारे में विस्तार से बात की. 

ऑनलाइन परीक्षाओं के बारे में Mercer | Mettl ने जो रिपोर्ट जारी की है, उसका आधार क्या है? 

सिद्धार्थ गुप्ता – “द स्टेट ऑफ ऑनलाइन एग्जामिनेशंस 2021” (The State of Online Examinations 2021) के नाम से पेश यह रिपोर्ट एक विस्तृत सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है, जिसमें 18 देशों के 150 से ज्यादा शैक्षिक संस्थानों के 650 से ज्यादा अहम लोगों ने हिस्सा लिया है. इनमें इन संस्थाओं के डीन, विभागाध्यक्ष (HOD) प्रोफसर और दूसरे महत्वपूर्ण फैसले करने वाले लोग शामिल हैं. सर्वे में शामिल 80 फीसदी लोग और संस्थान भारत के हैं, जबकि 20 फीसदी दूसरे देशों के. इस सर्वे में हमने उन संस्थानों को भी शामिल किया है, जो हमारे ऑनलाइन असेसमेंट प्लेटफॉर्म के कस्टमर नहीं हैं.

इस रिपोर्ट और अपने अनुभव के आधार पर आपको ऑनलाइन एग्जामिनेशन के रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन या चुनौती क्या लगती है? 

सिद्धार्थ गुप्ता सबसे बड़ी चिंता परीक्षाओं में नकल या गलत तौर-तरीकों के इस्तेमाल को रोकने की है. मर्सर-मेटल (Mercer | Mettl) के सर्वे में शामिल 62.96 फीसदी लोगों ने माना कि उनके लिए ऑनलाइन परीक्षाओं के दौरान नकल या चीटिंग की आशंका चिंता की सबसे बड़ी वजह रही. ऐसा इसलिए क्योंकि हर प्रतिष्ठित संस्थान अपनी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को प्राथमिकता देता है. वे चाहते हैं कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ मेरिट को अहमियत देने वाले संस्थान के तौर पर पहचाना जाए. परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठ जाए तो उस संस्थान की प्रतिष्ठा खतरे में पड़ सकती है. 

हमारा प्लेटफॉर्म ऑनलाइन परीक्षा को विश्वसनीय और नकल मुक्त बनाकर इस समस्या को प्रभावशाली रूप से दूर कर सकता है. यही वजह है कि देश के कई IIM, यूनिवर्सिटीज़ और अन्य प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों की ऑनलाइन परीक्षाएं हमारे प्लेटफॉर्म के जरिए आयोजित की जा रही हैं. देश में ऐसे करीब 400 संस्थान हैं, जो ऑनलाइन परीक्षाएं लेने के लिए हमारे एग्ज़ाम इंजन का इस्तेमाल करते हैं. इनमें प्रवेश परीक्षाएं या डिस्टेंस लर्निंग वाले छात्रों के सेमेस्ट या मिड टर्म एग्जाम भी शामिल हैं. हमारे सॉफ्टवेयर की मदद से ये परीक्षाएं विश्वसनीय तरीके से और बिना चीटिंग के कर पा रहे हैं. 

ऑनलाइन एग्जाम की विश्वसनीयता बनाए रखने का क्या उपाय हो सकता है?

सिद्धार्थ गुप्ता – ऑनलाइन एसेसमेंट या परीक्षा की विश्वसनीयता को कायम रखने के लिए उसमें नकल या गलत उपायों के इस्तेमाल को पूरी तरह से रोकना जरूरी है. आधुनिक और सटीक टेक्नॉलजी का इस्तेमाल करके ऐसा किया जा सकता है. मिसाल के तौर पर हमारी कंपनी ऑनलाइन असेसमेंट और एग्जाम के लिए जो प्लेटफॉर्म मुहैया कराती है, उसमें दुनिया के किसी भी कोने में रहकर, हजारों किलोमीटर दूर बैठे परीक्षार्थियों के लिए प्रश्न पत्र (Question Paper) सेट और अपलोड किए जा सकते हैं. इतना ही नहीं, एग्जामिनर अपनी जगह पर बैठे-बैठे ही एग्जाम का निरीक्षण (invigilation) भी कर सकते हैं. हमारे ऑनलाइन एग्जामिनेशन प्लेटफॉर्म में इस काम के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर की मदद ली जाती है, जो छात्रों को नकल या गलत तरीकों के इस्तेमाल से रोकता है. इसके तहत परीक्षार्थियों के डिवाइस के कैमरों को ऑन करके आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से उन पर नजर रखी जाती है. इतना ही नहीं, AI की मदद से शिक्षक खुद भी इस प्रक्रिया पर नजर रखते हैं. 

मिसाल के तौर पर मान लीजिए कोई प्रोफेसर अपने घर में बैठकर अपनी क्लास की परीक्षा ले रहा रहा है. अगर इस दौरान परीक्षा दे रहा कोई छात्र कैमरे के सामने से हटा या किसी गलत तरीके का इस्तेमाल करने की कोशिश की, तो कैमरे से जुड़ा AI सॉफ्टवेयर प्रोफेसर को अलर्ट कर देगा. ऐसा होने पर प्रोफेसर अपने लैपटॉप पर एक क्लिक करके उस छात्र के टेस्ट को पॉज़ कर सकते हैं, उसे गलत तरीके इस्तेमाल नहीं करने के लिए टोक सकते हैं या जो भी जरूरी एक्शन हो वो ले सकते हैं. 

हमारे देश में 12वीं या 10वीं की बोर्ड परीक्षाएं काफी बड़े स्तर पर होती हैं. क्या इन परीक्षाओं में भी ऐसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल हो सकता है? 

सिद्धार्थ गुप्ता – फिलहाल सीबीएसई या अन्य बड़े पैमाने पर होने वाले बोर्ड एग्जाम्स के मामले में सबसे बड़ी चुनौती ये है कि देश में आज भी बहुत बड़ी आबादी के पास इंटरनेट या मोबाइल फोन जैसी जरूरी सुविधाएं नहीं हैं. इसीलिए वहां चिंता यह भी है कि आप ऐसे लोगों को दरकिनार करके सिर्फ कुछ बच्चों के लिए ऑनलाइन शिक्षा और परीक्षा मुहैया नहीं करा सकते. हमारे सर्वे में भी यह बात सामने आई है कि तुलनात्मक रूप से बेहतर सुविधाओं वाले उच्च शिक्षा संस्थानों तक में 20-22 फीसदी लोगों के लिए डिजिटल डिवाइस की उपलब्धता बड़ी चुनौती है. जाहिर है, जिन परीक्षाओं में आम छात्र बड़े पैमाने पर शामिल होते हैं, वहां यह समस्या और भी बड़ी होगी. 

हालांकि इस सिलसिले में हमारी सरकारी महकमों और उनके अधिकारियों के साथ भी काफी चर्चा होती रही है और वे भी इस दिशा में सोच रहे हैं. हम अथॉरिटीज़ के साथ इस बारे में भी बात कर रहे हैं कि शिक्षा और परीक्षा प्रणाली पर कोविड के असर को कम से कम करने में हम क्या योगदान कर सकते हैं. 

इन चुनौतियों के बीच क्या ऐसे कुछ संकेत भी उभर रहे हैं जो भविष्य के लिए नई उम्मीद जगाते हों? 

सिद्धार्थ गुप्ता – ऐसा नहीं है कि समस्याएं दूर नहीं हो रही हैं. कई सकारात्मक बातें भी सामने आ रही हैं. मसलन, हमने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करके बड़ी सफलता के साथ साइंस ओलंपियाड (Science Olympiad) कंडक्ट किया, जिसमें पिछले साल 7.5 लाख बच्चों ने परीक्षा दी थी और इस साल 15 से 17 लाख बच्चों के शामिल होने की उम्मीद है. 

आम लोग, शिक्षण संस्थान और अथॉरिटीज़, सभी इस बात को समझने लगे हैं कि महामारी जल्दी खत्म नहीं होने वाली है. दूसरी लहर भले ही चली गई लेकिन तीसरी लहर का खतरा अब भी बना हुआ है. उन्हें समझ आ रहा है कि हमें मौजूदा हालात को ध्यान में रखते हुए ज्यादा सफल और विश्वसनीय ढंग से परीक्षाएं आयोजित करने की क्षमता विकसित करनी होगी. लोग ऑनलाइन क्लासेस और एग्जाम्स कंडक्ट करने की क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें हम भी अपना योगदान कर रहे हैं. हम भारत में और दुनिया भर में काफी अच्छे शिक्षण संस्थानों और शिक्षाविदों के साथ काम कर रहे हैं. ताकि प्रवेश परीक्षाओं और सेमेस्टर एग्जाम्स में ऑनलाइन तरीकों को बेहतर ढंग से अपनाया जा सके. 

अब तक के अनुभव के आधार पर हम परीक्षा के तरीकों में लगातार सुधार कर रहे हैं. मिसाल के तौर पर हमने उन लोगों, खास तौर पर छोटे बच्चों के लिए अलग यूजर इंटरफेस और डिजाइन तैयार किया है, जिन्होंने पहले कभी लैपटॉप पर काम नहीं किया. हमने ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसे वे आसानी से समझ और अपना सकेंगे.

ऑनलाइन प्रणाली की सफलता के लिए क्या सिर्फ आधुनिक डिवाइस और तकनीक होना काफी है? या इसके लिए कुछ और पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा? 

सिद्धार्थ गुप्ता – सही तकनीक के इस्तेमाल के साथ-साथ यह देखना भी जरूरी है कि इस डिजिटल ईको-सिस्टम से जुड़े तमाम लोग इसके जरिए काम करने में सहज महसूस करें. प्रोफेसर को नई तकनीक के जरिए प्रश्न पत्र सेट करने और ऑनलाइन सबमिट की गई आन्सर शीट का ऑनलाइन मूल्यांकन करने में कंफर्टेबल होना चाहिए. एग्जामिनेशन कंट्रोलर को परीक्षा का ऑनलाइन शिड्यूल तैयार करने और एग्जाम रेगुलेट करने में सहज महसूस करना चाहिए और छात्रों को परीक्षा देने के नए तरीके को लेकर कंफर्टेबल होना चाहिए. 

इतना सब हो जाने के बाद हम इस बारे में सोच सकते हैं कि आगे एग्जाम प्रोसेस को और प्रभावशाली कैसे बनाया जाए. ताकि यह जांच की जा सके कि शिक्षण प्रक्रिया का लर्निंग आउटकम हासिल हो पाया है या नहीं. अगर इतना हो जाए तो शिक्षा के क्षेत्र में एक बिलकुल ही नया चैप्टर शुरू हो सकता है. 

ऑनलाइन एजुकेशन और एग्जाम के कारण आप शिक्षा के क्षेत्र में जिस नए अध्याय के शुरू होने की उम्मीद कर रहे हैं, उसका स्वरूप कैसा होगा? 

सिद्धार्थ गुप्ता –  ऑनलाइन परीक्षा या शिक्षा में आप तकनीक का इस्तेमाल ज्यादा क्रिएटिव और दिलचस्प ढंग से कर सकते हैं. मिसाल के तौर पर इंग्लिश के टीचर परीक्षा में सिर्फ टेक्स्ट ही नहीं, ऑडियो पैसेज भी दे सकते हैं, जिसके जरिए वे यह परख सकते हैं कि छात्र उसे सुनकर कितना समझ पा रहे हैं और किस हद तक उस पर आधारित सवालों के जवाब दे पाते हैं. परीक्षा में आप एक ऑडियो या मूवी क्लिप दिखाकर उसमें दी गई पोएट्री के बारे में सवाल पूछ सकते हैं. छात्रों से उस पर अपनी राय बताने को या उसकी समीक्षा करने को कह सकते हैं. टेक्नॉलजी के क्षेत्र से जुड़ी परीक्षाओं में भी कई नई संभावनाएं खुल सकती हैं. मिसाल के तौर पर आप सॉफ्टवेयर बेस्ड केस स्टडी दे सकते हैं, जिनमें परीक्षार्थी से बाकायदा सिस्टम पर लाइव कोडिंग करके दिखाने को कहा जा सकता है. अगर ऐसा किया जाए तो परीक्षाओं में मूल्यांकन का स्तर एक अलग ही लेवल पर पहुंच सकता है.

इसका अगला कदम यह भी हो सकता है कि अगर तकनीक का सही ढंग से इस्तेमाल किया जाए तो आपको परीक्षाएं लेने के लिए टीचिंग यानी पढ़ाने का काम रोकने की जरूरत नहीं होगी. आप मूल्यांकन की प्रक्रिया को लगातार जारी रख सकते हैं. ऐसा करने पर आपको चार बार प्री-बोर्ड परीक्षा लेने की जरूरत नहीं रह जाएगी. सेमेस्टर एग्जाम्स या अर्धवार्षिक परीक्षा से पहले दो क्लास टेस्ट और फाइनल परीक्षा से पहले दो क्लास टेस्ट नहीं लेने पड़ेंगे. 

ऑनलाइन टेस्ट की कोई खास लागत नहीं होती, इसलिए वे ऑनगोइंग असेसमेंट यानी लगातार चलने वाली मूल्यांकन प्रक्रिया को संभव बना सकते हैं. आप हर चैप्टर की पढ़ाई के बाद उससे जुड़े प्रश्न या असाइनमेंट दे सकते हैं, जिससे छात्रों का सतत मूल्यांकन किया जा सकता है. इस तरह आप छात्रों की प्रोग्रेस पर लगातार नज़र रखते हुए जरूरी इंप्रूवमेंट करते रह सकते हैं. ऐसा नहीं होगा कि अब बोर्ड आने वाला है या अब प्री-बोर्ड आने वाला है. इस नए तरीके को अपनाकर हम माइलस्टोन बेस्ड परीक्षाएं लेने के पुराने पड़ चुके सिस्टम से आगे बढ़ सकते हैं. यानी ऐसा काफी कुछ है जो आने वाले दिनों में पूरी तरह से बदल सकता है. कुल मिलाकर देखें तो एजुकेशनल सिस्टम में बड़े पैमाने पर बदलाव करने का एक सुनहरा मौका हमारे सामने है.

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