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MF: इक्विटी म्यूचुअल फंड में शेयर बाजार से कम है जोखिम, कम्पाउंडिंग का मिलेगा फायदा​

निवेश की शुरुआत करने से पहले हमें तीन बातों का अतंर बारीकी से समझना होगा कि बचत, निवेश और अटकलों में क्या अंतर है.

August 14, 2020 8:18 AM
Investment in equity mutual funds: Risks and ReturnsSIP के जरिए निवेश के कई लाभ हैं.

रिस्क यानी जोखिम हर सेक्टर में होता है, लेकिन यह स्थिति और दूसरे कारणों पर भी निर्भर करता है. फाइनेंशियल सेक्टर में निवेश से जुड़े कई इस्ट्रूमेंट्स है जिनमें अलग अलग तरह के रिस्क हैं. यानी, निवेश और जोखिम एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और हमेशा साथ-साथ चलते हैं. लेकिन इसके लिए हमें चीजों को मैनेज करना आना चाहिए. जब निवेश की बात आती है तो पहले हमें अपनी सुरक्षा खासकर जीवन और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए. वहीं, आपातस्थिति के लिए इमरजेंसी फंड का भी इंतजाम होना चाहिए. जब ये दोनों चीजे पूरी हो जाए तब निवेश के बारे में सोचना चाहिए. निवेश की शुरुआत करने से पहले हमें तीन बातों का अतंर बारीकी से समझना होगा कि बचत, निवेश और अटकलों में क्या अंतर है.

बचत और निवेश को समझना आसान है. जबकि अटकलें में जोखिम रहता है, क्योंकि यह फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स में पैसा लगाते समय उससे जुड़े जोखिम को समझने के बिना ऊंचे रिटर्न की उम्मीद में ही किया जाता है. म्यूचुअल फंड निवेश में एक सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें जोखिम उठाने की स्ट्रैटजी पहले से तय होती है. इस प्रबंधन प्रोफेशनल्स की ओर से किया जाता है और सख्त रेग्युलेशन की वजह से पारदर्शिता भी रहती है. इस तरह आप म्यूचुअल फंड में निवेश कर इक्विटी में निवेश से जुड़े जोखिमों का मैनेजमेंट सीखते हैं.

इक्विटी एक्सपोजर कम से कम 65%

इक्विटी म्युचुअल फंड के लिए फंड स्कीम का इक्विटी एक्सपोजर कम से कम 65 फीसदी होना चाहिए जो अधिकतम 100 फीसदी तक हो सकता है. इसके अलावा एक इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ELSS) भी होती है जिसमें इक्विटी एक्सपोजर कम से कम 80 फीसदी होता है. इस स्कीम में निवेश तीन साल के लॉक इन पीरियड के लिए होता है और यह स्कीम में निवेश पर इनकम टैक्स के सेक्शन 80सी के तहत टैक्स डिडक्शन का लाभ मिलता है.

डाइवर्सिफिकेशन

इक्विटी म्यूचुअल फंड्स के जरिए भारतीय और अंतरराष्ट्रीय स्टॉक्स में मार्केट कैपिटलाइजेशन और सेक्टर्स के लिहाज से पर्याप्त डाइवर्सिफिकेशन उपलब्ध होता है. इसके लिए निवेश के विभिन्न तरीके अपनाए जाते हैं. कोई भी व्यक्ति निवेश जोखिम का प्रबंधन करने के लिए सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) के जरिए इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश कर सकता है.

एवरेजिंग

एसआईपी के जरिए निवेश के कई लाभ हैं, लेकिन इसमें सबसे बड़ी समस्या लागत की एवरेजिंग है. यानी, जब आप एसआईपी के जरिए निवेश करते हैं तो बाजार में गिरावट के समय आप अधिक यूनिट खरीदते है, वहीं मार्केट में तेजी के समय कम यूनिट खरीदते हैं. इस तरह एक समय के बाद म्यूचुअल फंड स्कीम्स में आपके निवेश पर आपका नुकसान खत्म हो जाता है और आपको उसक पर फायदा दिखाई देने लगता है.

लंबी अवधि का बनाएं लक्ष्य

इक्विटी म्यूचुअल फंड 7 से 10 साल या इससे ज्यादा लंबी अवधि के निवेश के लिए सही रहते हैं. इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में लंबी समय तक निवेश से कंपाउंडिंग की पावर का फायदा मिलता है. आप एक वित्तीय लक्ष्य निर्धारित कर निवेश शुरू कर सकते हैं. इस लक्ष्य को पाने के लिए राशि और निवेश की अवधि तय करनी होती है. आपके वित्तीय लक्ष्य के अनुसार, एसआईपी निवेश की गणना करने के लिए कई ऑनलाइन कैलकुलेटर मौजूद हैं. इसके जरिए आप अनुमानित रिटर्न की गणना कर सकते हैं. आप अपने वित्तीय लक्ष्य को तय वर्षों में पाने के लिए इक्विटी म्यूचुअल फंड का एक मिक्स पोर्टफोलियो बना सकते हैं.

आमतौर पर एक पोर्टफोलियो में 4 से 5 फंड स्कीम हो सकती है, जिसे आप एक निवेश सलाहकार के साथ बातचीत करने के बाद तय कर सकते हैं. निवेश से पहले सलाहकार से जरूर सलाह करनी चाहिए. एडवाइजर बातचीत के दौरान आपके अनुभव के आधार पर सबसे अच्छी सलाह दे सकता है.

(लेखक: अजीत मेनन, CEO, PGIM इंडिया म्यूचुअल फंड) 

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