Debt Mutual Fund Investments in 2022: नए साल में कैसे करें डेट म्युचुअल फंड में निवेश, बेहतर रिटर्न के लिए अपनाएं ये रणनीति

अनुमान है कि फरवरी या मार्च 2022 से रेपो रेट ही ऑपरेशनल रेट बन जाएगा और अप्रैल 2022 से इसमें बढ़ोतरी हो सकती है. ऐसे में डेट फंड के निवेशकों को अपनी नीति पर विचार करना चाहिए.

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दरों में बढ़ोतरी और वित्तीय स्थिति सख्त किए जाने को लेकर डेट म्यूचुअल फंड निवेशकों को अपनी नीति पर विचार करना चाहिए.

Debt Mutual Fund Investments in 2022: लोगों ने धीरे-धीरे वायरस के साथ रहना सीख लिया है और अब दुनिया भर की सरकारें पिछले दो साल से दिए गए असाधारण प्रोत्साहन पैकेजों को वापस लेने पर विचार कर सकती हैं. हालांकि इन्हें वापस लेने की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है और कई केंद्रीय बैंक दरों में बढ़ोतरी कर रहे हैं. यह प्रक्रिया इस साल भी जारी रह सकती है.

हालांकि केंद्रीय बैंकों के सामने नीतिगत दरों को सामान्य करने की बजाय बाजारों में भारी मात्रा में मौजूद अतिरिक्त नकदी को मैनेज करना अधिक चुनौती है. इसे लेकर आरबीआई ने भी अपनी प्रक्रिया शुरू कर दी है. अनुमान के मुताबिक फरवरी या मार्च 2022 से रेपो रेट ही ऑपरेशनल रेट बन जाएगा और अप्रैल 2022 से इसमें बढ़ोतरी हो सकती है. ऐसे में दरों में बढ़ोतरी और वित्तीय स्थिति सख्त किए जाने को लेकर डेट म्यूचुअल फंड निवेशकों को अपनी नीति पर विचार करना चाहिए.

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निवेशक अपना सकते हैं ये स्ट्रेटजी

इस साल डेट म्यूचुअल फंड में निवेश के लिए निवेशक खास रणनीति अपना सकते हैं- रोल डाउन स्ट्रेटजी और लैडर पोर्टफोलियो स्ट्रेटजी. इसके तहत अगर पांच साल के लिए निवेश करना है तो पूरी पूंजी को पांच साल के लिए निवेश करने की बजाय इसे 1 साल, 2 साल, 3 साल, 4 साल और 5 साल की अवधि के लिए निवेश किया जा सकता है. ऐसा करने से यह फायदा होगा कि जब दरें बढ़ेंगी तो पूंजी का एक हिस्सा हर साल मेच्योर होगा और उस पैसे को फिर निवेश कर अधिक रिटर्न हासिल किया जा सकता है.

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RBI अपना सकता है ये नीति

इस साल रिज़र्व बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी के साथ ही बाजारों में नकदी डालना रोक सकता है और कर्ज में अधिक बढ़ोतरी के साथ अतिरिक्त नकदी घटने से कॉरपोरेट स्प्रेड बढ़ना शुरू हो सकता है, जो इस समय ऐतिहासिक निचले स्तर पर है. आरबीआई के लिए अतिरिक्त नगदी को मैनेज करना अहम है क्योंकि ड्यूरेबल लिक्विडिटी 11 लाख करोड़ रुपये से अधिक की हो गई है. इसके अलावा इस साल कम अवधि की दरें लंबी अवधि की दरों की तुलना में अधिक रह सकती हैं.
(आर्टिकल: पुनीत पाल, प्रमुख, फिक्स्ड इनकम, पीजीआईएम इंडिया म्युचुअल फंड)

(डिस्क्लेमर: यह लेखक के अपने विचार हैं और फाइनेंशियल एक्सप्रेस ऑनलाइन इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है. निवेश से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने सलाहकार से जरूर संपर्क कर लें.)

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