सर्वाधिक पढ़ी गईं

हाई रिटर्न के चलते इंटरनेशनल इक्विटी के प्रति बढ़ रहा आकर्षण; निवेश के पहले ध्यान रखें ये बातें, नहीं तो होगा नुकसान

Investing in International Equities: पिछले कुछ वर्षों से हाई रिटर्न के चलते कई निवेशक इंटरनेशनल इक्विटी फंड्स में निवेश के प्रति आकर्षित हुए हैं.

Updated: Mar 23, 2021 4:52 PM
Investing in International Equities Things to consider while investing abroadइंटरनेशनल इक्विटीज में निवेश को लेकर बहुत सावधानी बरतनी चाहिए.

Investing in International Equities: पिछले कुछ वर्षों से हाई रिटर्न के चलते कई निवेशक इंटरनेशनल इक्विटी फंड्स में निवेश के प्रति आकर्षित हुए हैं. इसके चलते इंटरनेशनल मार्केट्स में निवेश के लिए बहुत नए फंड ऑफर्स आ रहे हैं. इससे निवेशकों को विदेशी बाजार में निवेश के जरिए कमाने का मौका मिल रहा है. हालांकि विदेशी बाजार में भी निवेश करने से पहले कई बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है जैसे कि भारतीय बाजार में निवेशकों को करना होता है. इसमें सबसे अहम लागत है और किस माध्यम से विदेशी बाजार में निवेश कर रहे हैं, इसका भी ध्यान रखना होता है. इक्विटी रिस्क के अलावा विदेशों में निवेश पर करेंसी रिस्क और अन्य देशों के अलग ग्रोथ व इंफ्लेशन का भी रिस्क होता है. निवेशकों को इन सभी फैक्टर्स पर गौर करना चाहिए और अपनी रिस्क लेने की क्षमता के मुताबिक ही निवेश का फैसला लेना चाहिए.

इन बातों का रखें ध्यान

  • कॉस्ट स्ट्रक्चर: भारत में पूंजी बाजार नियामक सेबी ने म्यूचुअल फंड में निवेश के लिए एंट्री लोड पर कोई भी चार्ज लगाने पर रोक लगा दिया है और एग्जिट कॉस्ट भी बहुत कम है. इसके अलावा एक्सपेंस रेशियो की भी अधिकतम सीमा तय कर दी गई है. इसकी तुलना अगर अमेरिकी म्यूचुअल फंड्स से करें तो खुदरा निवेशकों के लिए अपफ्रंट लोड्स 5 फीसदी तक हो सकता है. यह लोड 8.5 फीसदी तक भी हो सकता है. इसके अलावा अमेरिकी म्यूचुअल फंड्स में 5 फीसदी या इससे अधिक का एग्जिट लोड भी हो सकता है. इसमें ट्रांजैक्शन फीस नहीं शामिल किया गया है जो म्यूचुअल फंड को खरीदने या बेचने के वक्त निवेशकों को चुकाना पड़ता है. ऐसे में निवेशकों को ध्यान रखना होगा कि उनकी प्रॉफिट का एक बड़ा हिस्सा चार्जेज में जा सकते हैं.
  • फंड ऑफ फंड्स रूट: भारत में निवेश के लिए जो भी इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड्स उपलब्ध हैं, वे फंड ऑफ फंड्स के रूप में स्ट्रक्चर्ड हैं. इसका मतलब यह हुआ कि डोमेस्टिक म्यूचुअल फंड स्कीम इंटरनेशनल म्यूचुअल फंड की यूनिट्स में निवेश करेगी. रिटेल प्लान्स की तुलना में इंस्टीट्यूशनल प्लानंस का फी लोड कम है लेकिन निवेशक को फंड के कॉस्ट स्ट्रक्चर के बारे में पता कर लेना चाहिए क्योंकि डोमेस्टिक फंड हाउस अपना भी एक्सपेंस रेशियो निवेशकों पर चार्ज करेगा. ऐसे में अगर फंड ऑफ फंड्स रूट के जरिए अधिक चार्ज देना पड़े तो पैसिव रूट के जरिए निवेश करना फायदेमंद होगा.
  • अपने निवेश को करें डाइवर्सिफाई: अधिकतर भारतीय निवेशक इंटरनेशनल इक्विटी फंड्स के लिए अमेरिकी मार्केट्स में निवेश करते हैं. पिछले दस वर्षों से यूएस इक्विटीज ने निवेशकों को तगड़ा रिटर्न दिया है, खासतौर से टेक स्टॉक है. हालांकि यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि अपने निवेश को डाइवर्सिफाई करना बेहतर फैसला है. ऐसे में सिर्फ अमेरिकी स्टॉक में निवेश करने की बजाय कई देशों के स्टॉक में निवेश करना चाहिए और सिर्फ टेक स्टॉक की बजाय अन्य सेग्मेंट के स्टॉक्स में भी निवेश करना चाहिए.
  • एसेट्स अंडर मैनेजमेंट के आधार पर लें फैसला: प्रत्येक म्यूचुअल फंड कंपनी अपनी प्रॉफिटिबिलिटी देखती है और वह एक लेवल से नीचे एसेट्स अंडर मैनेजमेंट की स्कीम को जारी नहीं रखती है. निवेशकों को इसे लेकर आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि उसकी म्यूचुअल फंड कंपनी ने एक स्कीम को किसी अन्य स्कीम में मर्ज कर दिया या उसके ऑब्जेक्टिव्स में बदलाव कर दिया. हालांकि यह शुरुआती निवेश के लक्ष्यों को पूरा नहीं कर पाता है. ऐसे में निवेशकों को फंड रेटिंग, स्कीम परफॉरमेंस और मैनेजमेंट ट्रैक रिकॉर्ड के साथ एसेट अंडर मैनेजमेंट को भी देखना चाहिए और अगर यह कम हो तो इसमें निवेश से बचना चाहिए.

(Article: Rishad Manekia, Founder and MD, Kairos Capital)

Get Business News in Hindi, latest India News in Hindi, and other breaking news on share market, investment scheme and much more on Financial Express Hindi. Like us on Facebook, Follow us on Twitter for latest financial news and share market updates.

  1. बिज़नस न्यूज़
  2. कारोबार बाजार
  3. हाई रिटर्न के चलते इंटरनेशनल इक्विटी के प्रति बढ़ रहा आकर्षण; निवेश के पहले ध्यान रखें ये बातें, नहीं तो होगा नुकसान

Go to Top