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ऐसे अपने निवेश पर भरें कम टैक्स और कमाएं ज्यादा मुनाफा

यदि आप एक वेतनभोगी हैं तो आप टीडीएस के रूप में अपने संबंधित टैक्स सीमा के अनुसार पहले से ही इनकम टैक्स भर रहे होंगे।

February 12, 2018 6:24 PM
निवेश, इनकम टैक्, आईटी, निवेश, इनकम टैक्सइक्विटी और डेब्ट दोनों तरह के म्यूच्यूअल फंड्स में, आपके निवेश पर मिलने वाले पूंजीगत लाभ पर लगने वाले टैक्स को कम करने या ख़त्म करने में आपकी मदद करने के लिए कुछ प्रावधान किए गए हैं।

यदि आप एक वेतनभोगी हैं तो आप टीडीएस के रूप में अपने संबंधित टैक्स सीमा के अनुसार पहले से ही इनकम टैक्स भर रहे होंगे। ऐसी परिस्थिति में, दीर्घकालिक धन सृजन के लिए म्यूच्यूअल फंड्स में निवेश करने का फैसला थोड़ा मुश्किल हो सकता है, क्योंकि आपको यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि उन फंड्स के माध्यम से होने वाले लाभ पर टैक्स नहीं लगता है या मामूली तौर पर टैक्स लगता है।

आपकी पसंद के म्यूच्यूअल फंड्स से होने वाले पूँजी लाभ से संभावित रूप से टैक्स की कटौती की बात को ध्यान में रखने के लिए यहाँ कुछ कारकों के बारे में बताया गया है।

दीर्घकालिक निवेश

इक्विटी और डेब्ट दोनों तरह के म्यूच्यूअल फंड्स में, आपके निवेश पर मिलने वाले पूंजीगत लाभ पर लगने वाले टैक्स को कम करने या ख़त्म करने में आपकी मदद करने के लिए कुछ प्रावधान किए गए हैं। इक्विटी फंड्स के मामले में, आपको दीर्घकालिक सीमा के अंतर्गत योग्यता प्राप्त करने के लिए अपने लाभ के लिए एक साल या उससे ज्यादा समय तक अपनी यूनिटों को बस होल्ड करके रखना पड़ता है। ऐसे दीर्घकालिक पूंजीगत लाभों पर 10% टैक्स लगता है लेकिन सिर्फ तभी जब आपके लाभ का परिमाण 1 लाख रुपये से अधिक होता है। इसलिए, टैक्स देने से बचने के लिए इससे कम परिमाण में बेचने की कोशिश करें।

डेब्ट फंड्स के मामले में, 3 साल से ज्यादा समय तक होल्ड करके रखी गई यूनिटों के लिए दीर्घकालिक पूँजी लाभ पर 20% टैक्स लगता है। लेकिन, यह टैक्स, इंडेक्सेशन लाभ के साथ लागू होता है, जो आपके टैक्स के परिमाण को कम करता है, समयावधि जितनी अधिक होती है उतना अधिक लाभ मिलता है।

बैलेंस्ड फंड्स

एक सबसे अच्छा निवेश साधन वही है जो कोई महत्वपूर्ण टैक्स प्रभाव डाले बिना आपके पैसे को इक्विटी और डेब्ट में विभाजित करके उसे बढ़ने में मदद करता है और बैलेंस्ड फंड्स में ठीक ऐसा ही होता है। यदि इसकी होल्डिंग, इक्विटी में ज्यादा है तो यह एक इक्विटी उन्मुखी बैलेंस्ड फंड है, और जैसा कि ऊपर बताया गया है, एक साल से ज्यादा लम्बे समय पर मिलने वाला लाभ, दीर्घकालिक पूँजी लाभ के दायरे में आता है जो आपके टैक्स को काफी हद तक कम कर देता है।

एक साल की समयावधि के दौरान इक्विटी और डेब्ट के बीच में इस तरह के फंड की होल्डिंग में अंतर आ सकने के बावजूद, आपको इस तरह के फंड में निवेशित रहने के दौरान किसी महत्वपूर्ण टैक्स प्रभाव की उम्मीद करने की जरूरत नहीं है।

अपने एसआईपी को रोक दें

यदि आपके पास पैसे कम हैं और आप अतिरिक्त लिक्विडिटी के लिए अपने म्यूच्यूअल फंड्स को रेडीम करने की योजना बना रहे हैं तो आपको उन यूनिटों पर अल्पकालिक पूँजी लाभ का सामना करना पड़ सकता है जो दीर्घकालिक पूँजी लाभ के योग्य नहीं भी हो सकते हैं। ऐसे मामलों में, यही सुझाव दिया जा सकता है कि आप ऐसा करने के बजाय अपना एसआईपी रोक दें: इससे आपको उन फंडों में निवेश करते रहने में मदद मिलेगी जिन्हें किसी अन्य उद्देश्य के लिए रखा गया है और आपके मौजूदा यूनिट्स, बाजार में निवेश रह सकेंगे।

पूँजी लाभ के अलावा जिन पर टैक्स लग सकता है, कुछ म्यूच्यूअल फंड्स में एग्जिट लोड के रूप में एक चार्ज भी लगता है यदि आप निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना निवेश निकालते हैं। इसलिए किसी एक या दूसरे फंड में निवेश करने का फैसला लेने से पहले उससे जुड़े सभी नियमों एवं शर्तों के बारे में अच्छी तरह जान लें।

फैमिली अकाउंट्स खोलें

आप परिवार के सदस्यों के नाम से ट्रेडिंग अकाउंट्स भी खोल सकते हैं बशर्ते उनकी उम्र 18 साल से ज्यादा होनी चाहिए। हालाँकि इससे यह सुनिश्चित नहीं हो सकता कि परिवार के किस सदस्य को अधिकतम लाभ मिलेगा, लेकिन कुछ टैक्स तो बच ही सकता है। उदाहरण के लिए, यदि कथित वित्तीय वर्ष में आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी और स्टॉक पर मिलने वाले लाभ का परिमाण 1 लाख से अधिक है तो आपको उस पर 10% टैक्स देना पड़ेगा। लेकिन यदि आपके पास अपनी पत्नी के नाम से कुछ शेयर हैं जिन्हें आप बेचना चाहते हैं तो 10% टैक्स भरने से बचने के लिए 1 लाख रुपये से कम का शेयर बेचने पर विचार करें।

कुल मिलाकर, प्रॉपर्टी को छोड़कर अधिकंश निवेशों के लिए, दीर्घकालिक टैक्स, अल्पकालिक टैक्स से काफी कम होता है, इसलिए अपने फंड्स को ज्यादा से ज्यादा लम्बे समय तक होल्ड करके रखने की कोशिश करें और उन्हें सिर्फ तभी बेचें जब आपको लगे कि वही सही समय है। कोई भी महत्वपूर्ण बिक्री करने से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श करना न भूलें।

इस लेख के लेखक आदिल शेट्टी , बैंक बाज़ार के सीईओ हैं।

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