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FD vs Debt Fund vs G-sec vs Bonds: रिटेल निवेशकों के लिए क्या है बेस्ट विकल्प ?

FD vs Debt Fund vs G-sec vs Bonds: निवेश के लिए इतने अधिक वित्तीय उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं कि निवेशकों के सामने एक उलझन रहती है कि वे कहां निवेश करें.

April 18, 2021 8:24 PM
FD vs debt fund vs G-sec vs bonds Which one is better for retail investors know here in detailsहर किसी को अपनी भविष्य की वित्तीय जरूरतों और रिटायरमेंट के बाद के खर्चों को पूरा करने के लिए बचत और निवेश करना चाहिए.

FD vs Debt Fund vs G-sec vs Bonds: हर किसी को अपनी भविष्य की वित्तीय जरूरतों और रिटायरमेंट के बाद के खर्चों को पूरा करने के लिए बचत और निवेश करना चाहिए. हालांकि निवेश के लिए इतने अधिक वित्तीय उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं कि निवेशकों के सामने एक उलझन रहती है कि वे कहां निवेश करें. कम वोलेटाइल इंस्ट्रूमेंट्स की बात करें तो निवेशकों के सामने बैंकों की एफडी (फिक्स्ड डिपॉजिट्स), डेट म्यूचुअल फंड या सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश का विकल्प है लेकिन इन सभी विकल्पों के अपने फायदे और रिस्क हैं. ऐसे में कहीं भी निवेश के पहले इनके फायदे और रिस्क को पूरी तरह से समझ लें.

निवेश की रणनीति किसी निवेशक के प्रिफरेंस पर निर्भर करती है कि उनकी फंड्स की जरूरत क्या है, फंड लागत क्या है, निवेशक की रिस्क लेने की क्षमता कितनी है और टैक्स स्ट्रक्चर क्या है.

Fixed Deposit (FD)

बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनीज (NBFCs) में एफडी में निवेश किया जा सकता है और यह निवेश के लिए बहुत पसंदीदा विकल्प माना जाता है. इसमें पूर्वनिर्धारित अवधि में निवेश पर एक निश्चित दर पर रिटर्न प्राप्त होता है और रिटर्न पर बाजार के उतार-चढ़ाव का फर्क नहीं पड़ता है. हालांकि बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के पूर्व चेयरमैन और रवि रंजन एंड कॉरपोरेशन के फाउंडर व मैनेजिंग डायरेक्टर एस रवि के मुताबिक एफडी पर रिटर्न निश्चित होता है लेकिन अन्य विकल्पों की तुलना में इस पर कम दरों पर रिटर्न मिलता है और टैक्स भी चुकाना होता है. बैंक 5 हजार रुपये से अधिक के ब्याज पर टीडीएस डिडक्ट करती है. रवि के मुताबिक एफडी में निवेश का फायदा यह है कि इसे लिक्विडिटी की जरूरत के मुताबिक प्लान्ड किया जा सकता है.

Debt Fund

म्यूचुअल फंड के एक हिस्से के रूप डेट फंड्स अपेक्षाकृत स्टेबल इंवेस्टमेंट्स है. इसमें निवेश की लिक्विडिटी बहुत अधिक रहती है और सुरक्षित है. डेट फंड्स में 3 साल से अधिक के निवेश पर यह इंफ्लेशन एफिशिएंट भी है. रवि के मुताबिक डेट फंड्स सरकारों और कपनियों द्वारा जारी किए जाने वाले फिक्स्ड इनकम सिक्योरिटीज में निवेश करते हैं जिसमें कॉरपोरेट बांड्स, सरकारी प्रतिभूतियां, ट्रेजरी बिल्स, मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स और अन्य प्रकार के डेट सिक्योरिटीज शामिल हैं. डेट फंड्स इक्विटी म्यूचुअल फंड्स की तुलना में कम रिस्की हैं और इसमें ट्रेडिशनल सेविंग प्रॉडक्ट्स की तुलना में अधिक रिटर्न मिलता है. रवि के मुताबिक डेट फंड्स में इक्विटी फंड की तुलना में कम रिटर्न मिलता है लेकिन एफडी और सरकारी प्रतिभूतियों की तुलना में अधिक रिटर्न मिलता है. डेट फंड्स की एनएवी ब्याज दरों में बदलाव से ऊपर-नीचे होती है. अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं तो इसकी एनएवी कम होगी. इसके अलावा डेट फंड्स के साथ क्रेडिट रिस्क जुड़ा हुआ है. रवि के मुताबिक लंबे समय के लिए निवेश पर डेट म्यूचुअल फंड्स में निवेश टैक्स एफिशिएंट है क्योंकि इस पर इंडेक्सेशन बेनेफिट्स लिया जा सकता है.

G-Sec

गवर्नमेंट सिक्योरिटीज को या तो राज्य सरकार या केंद्र सरकार जारी करती है और यह सबसे सुरक्षित डेट इंस्ट्रूमेंट है. इसे मुख्य रूप से चार प्रमुख श्रेणियों ट्रेजरी बिल्स (टी-बिल्स), कैश मैनेजमेंट बिल्स (सीएमबी), डेटेड जी-सिक्योरिटीज और स्टेट डेवलपमेंट लोन्स (एसडीएल) में बांटा जा सकता है. इस समय इस पर 6.13 फीसदी सालाना की दर से रिटर्न मिल रहा है. मेच्योरिटी रिडेंप्शन अवधि पर निर्भर है और इसे सेकंडरी मार्केट में भी ट्रेड किया जा सकता है. इस पर यील्ड निवेश या मेच्योरिटी के समय पर निर्भर करता है. रवि के मुताबिक निवेश के पहले या एग्जिट करने से पहले ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव के ट्रेंड पर नजर मार लेना चाहिए. इसमें निवेश पर रिस्क लगभग नगण्य है और इसमें जो रिस्क है, वह सिर्फ ब्याज दरों का उतार-चढ़ाव है. छोटे निवेशक इसमें म्यूचुअल फंड्स के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से निवेश कर सकते हैं. हालांकि आरबीआई ने एक नई शुरूआत के तहत खुदरा निवेशकों को मौका दिया है कि वे आरबीआई में अपने गिल्ट अकाउंट्स खोलकर गवर्नमेंट सिक्योरिटीज में ट्रेड कर सकते हैं. इस पर रिटर्न इस पर निर्भर करता है कि इसे जारी किसने किया है और इसकी मेच्योरिटी पीरियड क्या है. बैंक एफडी के समान इस पर भी टैक्स चुकाना होता है.

Bonds

सरकार के अलावा कंपनीज भी बांड्स इशू करती हैं और इसके जरिए वे निवेशकों से फंड जुटाती है. इस प्रकार के कॉरपोरेट बांड्स सरकारी प्रतिभूतियों की तुलना में अधिक दर पर ब्याज देती हैं लेकिन इसमें डिफॉल्ट होने का भी रिस्क तगड़ा होता है. येस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक जैसे मामलों में खुदरा निवेशकों को बहुत नुकसान उठाना पड़ा.

(Article: Amitava Chakrabarty)

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