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म्यूचुअल फंड में निवेश करते समय जरूर देखें एक्सपेंस रेश्यो, खर्च होगा कम और मुनाफा भी ज्यादा

जब भी आप निवेश के लिए कोई म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) का चुनाव करते हैं तो उसका प्रदर्शन जरूर देखते होंगे.

November 11, 2019 3:16 PM
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Check Expense Ratio: जब भी आप निवेश के लिए कोई म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) का चुनाव करते हैं तो उसका प्रदर्शन जरूर देखते होंगे. अमूमन आपको यही लगता होगा कि अगर उस फंड का रिटर्न 15 फीसदी या 18 फीसदी है तो आपको भी निवेश करने पर उतना ही फायदा होगा. लेकिन ऐसा नहीं है, आपको मिलने वाला असल रिटर्न उतना नहीं होता, जितना फंड का प्रदर्शन होता है. इसमें काम करता है एक्सपेंस रेश्यो (Expense Ratio) का फैक्टर. इसी वजह से एक्सपर्ट हमेशा यह सलाह देते हैं कि किसी भी फंड को चुनने के पहले उसका एक्सपेंस रेश्यो जरूर देख लें. क्या होता है एक्सपेंस रेश्यो, इससे कैसे तय होता है आपका रिटर्न…..

क्या होता है एक्सपेंस रेश्यो

असल में किसी भी फंड के एक्सपेंस रेश्यो से ही ये तय होता है कि कोई फंड आपको कितना सस्ता मिलेगा. वहीं, एक्सपेंस रेश्यो के कम या ज्यादा होने का सीधा असर आपके रिटर्न पर भी पड़ता है. म्यूचुअल फंड के मैनेजमेंट पर जो भी खर्च आता है, इसी खर्च का अनुपात एक्सपेंस रेश्यो कहलाता है. एक्सपेंस रेश्यो फंड हाउस द्वारा ली जा रही एक सालाना फीस होती है. यह प्रति यूनिट आने वाले खर्च को बताता है. इसलिए फंड में निवेश करते समय आपको एक्सपेंस रेश्यो जरूर देखना चाहिए.

फंड सस्ता या महंगा

मान लीजिए आपने निवेश के लिए कोई म्यूचुअल फंड चुना है, जिसका एक्सपेंस रेश्यो 1.8 फीसदी है. वहीं, आपने इसमें 20 हजार रुपये का निवेश किया है. इसका मतलब हुआ कि इस फंड के मैनेजमेंट के लिए आपको सालाना 360 रुपये चुकाने होंगे. इसी तरह से अगर इस फंड ने कुल 14 फीसदी रिटर्न दिया तो आपको 12.2 फीसदी रिटर्न असल में मिलेगा.

इसी के विपरीत अगर इसका एक्सपेंस रेश्यो 2.6 फीसदी होता तो आपको इसके मैनेजमेंट के लिए 520 रुपये सालाना फीस देनी होती और रिटर्न भी 11.4 फीसदी ही मिलता. सीधा है कि एक्सपेंस रेश्यो जितना ज्यादा होगा, आपका खर्च उतना ही ज्यादा बढ़ेगा.

नोट: हालांकि यहां यह बात ध्यान देने की होती है कि कम या ज्यादा एक्सपेंस रेश्यो से रिटर्न की गारंटी नहीं तय होती है. कई बार ज्यादा एक्सपेंस रेश्यो वाले फंड कम एक्सपेंस रेश्यो वाले फंड के मुकाबले ज्यादा रिटर्न देते हैं.

एक्सपेंस रेश्यो की तय है लिमिट?

हाल ही में मार्केट रेगुलेटर सेबी ने एक्सपेंस रेश्यो की सीमा तय की है. जिस म्यूचुअल फंड स्कीम का AUM 500 करोड़ रुपये है वे एक्सपेंस रेश्यो के रूप में अधिकतम 2.25 फीसदी चार्ज कर सकती हैं. इसी तरह 500-750 करोड़ रुपये AUM वाली स्कीम के लिए एक्सपेंस रेश्यो 2 फीसदी हो सकता है. 750-2000 करोड़ रुपये वाले फंड के लिए एक्सपेंस रेश्यो 1.75 फीसदी, 2000-5000 करोड़ AUM वाली स्कीम के लिए 1.6 फीसदी और 5000-10,000 करोड़ रुपये AUM वाले फंड के लिए एक्सपेंस रेश्यो 1.5 फीसदी हो सकता है.

सेबी के निर्देश के मुताबिक, 10-50,000 करोड़ AUM वाली स्कीम के लिए एक्सपेंस रेश्यो हर 5000 करोड़ रुपये बढ़ने के बाद 0.05 फीसदी कम होता चला जाएगा. अगर किसी म्यूचुअल फंड स्कीम का AUM 50,000 करोड़ से अधिक है तो उसके लिए AMC एक्सपेंस रेश्यो के रूप में 1.05 फीसदी चार्ज ले सकती हैं.

क्यों लिया जाता है

फंड को मैनेज करने के लिए फंड हाउसेज के तमाम खर्च होते हैं. फंड हाउस में प्रोफेशनल्स की टीम होती है जो मार्केट पर नजर रखती है. इसमें ट्रांसफर और रजिस्ट्रार से संबंधित खर्च भी शामिल होते हैं. कस्टोडियन, ऑडिट, मार्केटिंग आदि का खर्च भी इसमें शामिल होता है.

NAV से अलग है

नेट असेट वैल्यू (Net Asset Value) फंड के प्रति शेयर की मार्केट वैल्यू होती है. ये वह मूल्य है, जिस पर निवेशक यूनिट्स खरीदते या बेचते हैं. एक्सपेंस घटाने के बाद ही NAV निकलती है. NAV जहां रोजाना जारी की जाती है और एक्सपेंस रेश्यो हर 6 महीने में जारी होते हैं.

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