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‘बॉयकाट चीन’ कितना आसान? आत्मनिर्भर भारत के लिए मोदी सरकार को उठाने होंगे जरूरी कदम

कॉमर्स आफ मिनिस्ट्री के ताजा आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2020 में वित्त वर्ष 2019 के मुकाबले भारत का चीन से आयात कुछ घटा है.

Updated: Jul 08, 2020 12:46 PM
boycott china, India-China trade, Import from china, India trade dependency on China, how much easy for India to reduce trade dependency on China, india export and import, india china face off, galwan valleyकॉमर्स आफ मिनिस्ट्री के ताजा आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2020 में वित्त वर्ष 2019 के मुकाबले भारत का चीन से आयात कुछ घटा है.

सीमा विवाद के चलते गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच झड़प के बद भारत में बॉयकॉट चाइना की मुहिम तेज हो गई है. देश के ज्यादातर हिस्सों में चीन के प्रोडक्ट के बहिष्कार करने की मांग उठ रही है. इसकी जगी लोकल प्रोडक्ट को अपनाए जाने की मुहित चलाई जा रही है. लेकिन यह भी सही है कि भारत की तमाम इंडस्ट्री अपने प्रोडकट बनाने में जरूरी सामानों के लिए चीन पर बहुद हद तक निर्भर हैं. चीन से आने वाले जरूरी प्रोडकट या इनग्रेडिएंट से ही लोकल कंपनियां प्रोडक्ट मैन्युफैक्चरिंग का काम पूरा कर पाती हैं.

कॉमर्स आफ मिनिस्ट्री के ताजा आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2020 में वित्त वर्ष 2019 के मुकाबले भारत का चीन से आयात कुछ घटा है. एक वित्त वर्ष के दौरान चीन से आयात में करीब 500 करोड़ डॉलर की कमी आई है. वित्त वर्ष 2018 के बाद से लगातार 2 साल इसमें गिरावट रही है. चीन से आयात निर्भरता कम करने ​की दिशा में यह एक पॉजिटि संकेत जरूर है, लेकिन इसके लिए भारत अभी कितना तैयार है. क्या भारत में अभी ऐसा स्ट्रक्चर तैयार है कि आने वाले दिनों में भारतीय कंपनियां चीन पर निर्भर होने से मुक्त हो पाएंगी. इस बारे में एसबीआई ने अपनी एक रिसर्च रिपोर्ट दी है.

चीन पर ऐसे निर्भर होता गया भारत

अगर हिस्ट्री की बात करें तो 1996-97 में भारत के लिए चीन 18वां सबसे बड़ा इंपोर्ट पार्टनर था. उस दौरान भारत में होने वाले कुल मर्केंडाइज इंपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी 1.9 फीसदी थी. उस समय कंट्री वाइज क्लासिफिकेशन में पेट्रोलिसम प्रोडक्ट अलग कटेगिरी था. 1997 के बाद से भारत की चीन पर निर्भरता बढ़ने लगी. यह वित्त वर्ष 2018 में अपने पीक पर पहुंच गया. वित्त वर्ष 2019 में भारत में होने वाले कुल मर्केंडाइज इंपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी बढ़कर 14 फीसदी पहुंच गई. मौजूदा समय में भारत में चीन से कुल 6844 प्रोडक्ट का आयात होता है, जिसकी वैल्यू 6530 करोड़ डॉलर के करीब पहुंच गई है.

लो वैल्यू इंपोर्ट बनी वजह

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि चीन में बनने वाले माल का भारत में कम दाम पर आयात होता है. लो वैल्यू इंपोर्ट की वजह से ज्यादा से ज्यादा भारतीय कंपनियां चीन से माल मंगाती हैं. यही प्रोडक्ट दूसरे देशों से मंगाने पर महंगा पड़ता है. कई क्षेत्रों में चीन से होने वाले आयात की हिस्सेदारी 90 फीसदी तक हो गई है. मसलन कमोडिटी एक ऐसा क्षेत्र है, जहां आयात की वैल्यू तो 100 मिलिसन डॉलर से भी कम है, लेकिन इसकी हिस्सेदारी 90 फीसदी है.

कई क्षेत्रों में निर्भरता 40% से ज्यादा

FY20 की बात करें तो टेलिफोनिक और टेलिग्राफिक इक्यूपमेंट, पर्सनल कंप्यूटर, सोलर सेल्स, इलेक्ट्रॉनिक व इलेक्ट्रिकल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक इंटीग्रेटेड सर्किट, लिथियम आयन और कई अन्य केमिकल, मशीनरी इक्यूपमेंट, बेस मेटल, टेक्सटाइल्स, प्लास्टिक, रबर, आटो एसेसरीज, फुटवियर, हेडगियर इंपोर्ट के प्रमुख पार्ट रहे हैं. इनमें से ज्यादातर में 40 फीसदी या इससे भी ज्यादा इंपोट्र के लिए हम चीन पर निर्भर हैं. अगर इनमें अचानक से निर्भरता कम करनी है तो हमें तुरंत दूसरे देशों के सोर्स खोजने होंगे.

क्या खत्म हो पाएगी निर्भरता

अगर विश्व की ईज आफ डूइंग बिजनेस देखें तो चीन की रेंकिंग भारत से अच्छी है. हालांकि बिजनेस के अन्य पैमानों की बात करें तो भारत और चीन की स्थिति लगभग एक जैसी ही है. एक जैसी स्थिति होने के बाद भी चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब बन गया, जबकि भारत ऐसा नहीं कर पाया है. इसका अंतर साफ यहीं से दिख जाता है कि WTO डाटा के मुताबिक चीन का मर्केंडाइज एक्सपोर्ट 2499 बिलियन डॉलर है. जबकि भारत का सिर्फ 324 बिलियन डॉलर. जबकि 1950 के समय में हम चीन की मुकाबले दुनिया को ज्यादा एक्सपोर्ट करते थे. ऐसे में भारत को भी मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की दिशा में काम करना होगा. वहीं जिन प्रोडक्ट को लेकर इंपोर्ट पर निर्भरता ज्यादा है, उस क्षेत्र में लोकल इंडस्ट्री को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है.

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