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सस्ता क्रूड बनेगा गेमचेंजर! मोदी सरकार की सुधरेगी बैलेंसशीट, कंज्यूमर्स के लिए सस्ता होगा पेट्रोल-डीजल

सरकार बनाते ही मोदी को किस मोर्चे पर मिली राहत

Updated: Jun 03, 2019 12:15 PM
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नरेंद्र मोदी को दूसरी पारी शुरू करते ही जहां इकोनॉमी और रोजगार के मोर्चे पर बड़ा झटका मिला है. वहीं फिलहाल एक जगह से मोदी को बड़ी राहत की खबर आ रही है. इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड की कीमतों में एक बार फिर गिरावट का दौर शुरू हो गया है. पिछले 30 दिनों में ब्रेंट क्रूड 15 डॉलर प्रति बैरल सस्ता हो चुका है. एक्सपर्ट का मानना है कि इंटरनेशनल स्तर पर जो हालात हैं, उन्हें देखकर लगता है कि क्रूड 56 डॉलर और डबल्यूटीआई 46 डॉलर तक सस्ता हो सकता है. ऐसा हुआ तो सरकार को अपनी बैलेंसशीट सुधारने का अच्छा अवसर होगा.

मोदी के पहले टर्म में भी बना था वरदान

इसके पहले मोदी ने 2014 में जब पहली सरकार बनाई थी, उस समय भी क्रूड एक बड़ा वरदान साबित हुआ था. मोदी जब पहली बार सत्ता में आए थे, उस समय मई 2014 में क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के आस पास था. लेकिन उसके बाद से क्रूड में गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया. जनवरी 2016 आते आते क्रूड 30 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर पहुंच गया. सस्ता क्रूड मिलने से फायदा यह हुआ कि मोदी सरकार जहां इंपोर्ट पर होने वाले खर्च को घटाकर अपना बैलेंसशीट ठीक कर पाई, वहीं देश में महंगाई को भी कंट्रोल करने में मदद मिली.

क्रूड और करंट अकाउंट डेफिसिट

असल में भारत अपनी जरूरतों का करीब 82 फीसदी क्रूड खरीदता है. ऐसे में क्रूड की कीमतें घटने से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) भी घट सकता है. क्रूड की कीमतें लगातार घटने से भारत का इंपोर्ट बिल उसी रेश्‍यो में कम होगा, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट की स्थिति बेहतर हो सकती है.

कम होगा इंपोर्ट बिल

भारत के इंपोर्ट बिल में क्रूड का बड़ा हिस्सा होता है. वित्त वर्ष 2017-18 में 22.04 करोड़ टन क्रूड के इंपोर्ट पर 87.7 अरब डॉलर यानी 5.65 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे. वहीं, क्रूड की कीमतें बढ़ीं तो वित्त वर्ष 2018-19 में कुल 22.66 करोड़ टन क्रूड का इंपोर्ट पर 112 अरब डॉलर खर्च हुआ. ऐसे में अगर भारत को लगातार सस्ता क्रूड मिलता है तो सरकार को अपनी बैलेंसशीट मजबूत करने का मौका मिलेगा.

क्रूड और इकोनॉमिक ग्रोथ का कनेक्शन

इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, क्रूड की कीमतें अब 10 डॉलर बढ़ती हैं तो करंट अकाउंट डेफिसिट 1000 करोड़ डॉलर बढ़ सकता है. वहीं, इससे इकोनॉमिक ग्रोथ में 0.2 से 0.3 फीसदी तक कमी आती है. जबकि सस्ता होने पर इसका उल्टा असर होता है.

महंगाई काबू में रखने में मदद

इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड स्स्ता होने से इंडियन बास्केट में भी क्रूड सस्ता हो जाता है. इससे तेल कंपनियां पेट्रोल और डीजल पर उसी रेश्यो में छूट दे सकती हैं. पेट्रोल और डीजल सस्ता होने से महंगाई पर काबू रखा जा सकता है.

क्रूड में और गिरावट की उम्मीद

केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया का कहना है कि ट्रेड वार का बढ़ना तेल में गिरावट का बड़ा कारण है. यूएस द्वारा मैक्सिकन इंपोर्ट पर 5 फीसदी टैरिफ लगाने के बाद क्रूड में ज्यादा गिरावट आई है. निवेशक यूएस और चीन में ट्रेड वार को लेकर पहले से चिंतित हैं. सउदी ने भी आउटपुट बढ़ाया है. वहीं, यूएस में रिग की संख्या बढ़ी है. अब ओपेक देशों की मीटिंग पर नजर है. अगर वे आउटपुट जारी रखते हैं तो क्रूड 56 डॉलर और WTI 46 डॉलर के भाव पर आ सकता है.

एंजेल ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट, रिसर्च (कमोडिटी एंड करंसी) अनुज गुप्ता भी मानते हैं कि ट्रेड वार का बढ़ना ही क्रूड में गिरावट की प्रमुख वजह है. चीन जो क्रूड का बड़ा खरीददार है, उसकी ओर से डिमांड अचानक कम हो गई है. ऐसा ही रहा तो 15 दिनों में क्रूड 58 डॉलर और WTI 47 से 48 डॉलर की रेंज में आ जाएगा.

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