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कोरोना इम्पैक्ट: 35 साल बाद 20 डॉलर बिकेगा क्रूड! मोदी सरकार के 2014 वाले आएंगे ‘अच्छे दिन’ या मंदी खा जाएगी मुनाफा

क्या लगातार सस्ते हो रहे क्रूड से मोदी सरकार के आएंगे 2014 वाले अच्छे दिन?

March 19, 2020 1:31 PM
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क्रूड में आज फिर 20 फीसदी के करीब गिरावट रही और यह 25 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया. एक्सपर्ट मान रहे हैं कि जिस तरह के ग्लोबल संकेत हैं, क्रूड 1985 के बाद पहली बार 20 डॉलर प्रति बैरल के नीचे जा सकता है. अब सवाल उठता है कि स्लोडाउन के दौर से गुजर रही भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में क्या सस्ता क्रूड मोदी सरकार की उसी तरह से मदद कर सकता है, जिस तरह से इस सरकार के पहले कार्यकाल में हुआ था. जानकारों का कहना है कि इस बार क्रूड में गिरावट का फायदा सरकार को मंदी से उबरने के लिए एक लिमिट में ही मिलेगा.

असल में मोदी ने 2014 में जब पहली सरकार बनाई थी, उस समय भी क्रूड सरकार के लिए मददगार बना था. मई 2014 में क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के आस पास था. लेकिन उसके बाद से क्रूड में गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया. जनवरी 2016 आते आते क्रूड 30 डॉलर प्रति बैरल के भाव पर पहुंच गया. सस्ता क्रूड मिलने से फायदा यह हुआ कि मोदी सरकार जहां इंपोर्ट पर होने वाले खर्च को घटाकर अपना बैलेंसशीट ठीक कर पाई, वहीं देश में महंगाई को भी कंट्रोल करने में मदद मिली.

क्रूड से घटेगा व्यापार घाटा?

केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया का कहना है कि मौजूदा स्थिति की बात करें तो इन दिनों इंडस्ट्रियल एक्टिविटी कमजोर है. देश में क्रूड की ज्यादा मांग नहीं है. इसलिए करंट अकाउंट डेफिसिट के मोर्चे पर बहुत ज्यादा फायदा होने की उम्मीद नहीं है. असल में भारत अपनी जरूरतों का करीब 82 फीसदी क्रूड खरीदता है. ऐसे में क्रूड की कीमतें घटने से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) भी घट सकता है. आमतौर पर क्रूड की कीमतें लगातार घटने से भारत का इंपोर्ट बिल उसी रेश्‍यो में कम होता है, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट की स्थिति बेहतर हो सकती है. लेकिन अभी क्रूड की डिमांड बेहद कमजोर होने से यह तर्क सही साबित नहीं होता दिख रहा है.

कमजोर मांग बड़ी परेशानी

एंजेल ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट (कमोडिटी एंड करंसी), अनुज गुप्ता का कहना है कि देश के इंपोर्ट बिल में क्रूड की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा होती है. वित्त वर्ष 2018-19 में कुल 22.66 करोड़ टन क्रूड का इंपोर्ट पर 112 अरब डॉलर खर्च हुआ. अब क्रूड सस्ता होने पर इसका फायदा मिल सकता था. लेकिन मौजूदा दौर में फ्लाइट हों या ट्रेनें, डिमांड बेहद कमजोर है. इंडस्ट्रियल एक्विटविटी भी कमजोर है, जिससे उनमें कच्चे तेल की डिमांड कमजोर आ रही है. यही सबसे बड़ी परेशानी है. अगर अर्थव्यवस्था पहले से बेहतर स्थिति में होती तो आज क्रूड सस्ता होने का फायदा उसी रेश्यो में मिलता. क्योंकि क्रूड सस्ता होने का फायदा उठाने के लिए अलग अलग सेक्टर से ज्यादा मांग उठती. फिर सरकार की बैलेंसशीट भी इससे मजबूत होती.

हालांकि उनका कहना है कि सरकार ने हाल ही में पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई थी. इसका फायदा आयल मार्केटिंग कंपनियों को मिलेगा. वहीं, अगर क्रूड लंबे समय तक सस्ता बना रहता है तो रॉ मटेरियल के रूप में इसका इस्तेमाल करने वाली कंपनियों को राहत जरूर मिलेगी.

क्रूड और इकोनॉमिक ग्रोथ का कनेक्शन

इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, क्रूड की कीमतें अब 10 डॉलर बढ़ती हैं तो करंट अकाउंट डेफिसिट 1000 करोड़ डॉलर बढ़ सकता है. वहीं, इससे इकोनॉमिक ग्रोथ में 0.2 से 0.3 फीसदी तक कमी आती है. जबकि सस्ता होने पर इसका उल्टा असर होता है.

क्रूड 25 डॉलर के नीचे, इस साल 60% हुआ सस्ता

क्रूड गुरूवार को कारोबार के दौरान 20 फीसदी सस्ता होकर 25 डॉलर के नीचे चला गया. आज दिन का हाई 27.19 डॉलर और लो 24.96 डॉलर रहा. इस साल अबतक की बात करें तो क्रूड करीब 60 फीसदी तक सस्ता हो चुका है. वहीं, पिछले एक साल में इसकी कीमतें 61 फीसदी गिरी हैं.

20 डॉलर तक जा सकते हैं भाव

अजय केडिया का कहना है कि एक्सपर्ट का कहना है कि ओपेक देशों और नॉन ओपेक देशों में प्रोडक्शन कट को लेकर सहमति बनती नहीं दिख रही है. अगर रूस प्रोउक्शन कट करने का तैयार नहीं है तो सउदी अरब जैसे देश घाटा नहीं सहेंगे. दूसरी ओर कारेोना वायरस के चलते अमेरिका और चीन के अलावा भारत जैसे बड़े कंज्यूमर देशों की ओर से डिमांड घटी है, जबकि अमेरिका में इन्वेंट्री बहुत ज्यादा बढ़ी है. कोरोना का असर अभी इतनी जल्दी खत्म होता नहीं दिख रहा है. यह सब कारण है कि क्रूड आने वाले दिनों में 20 डॉलर तक जा सकता है. इसके पहले 1985 में क्रूड के भासव इस स्तर पर थे.

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