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Budget 2019: आम बजट से किस तरह अलग है अंतरिम बजट और वोट ऑन अकाउंट

आम परंपरा के अनुसार जिस साल लोकसभा चुनाव होने होते हैं, केंद्र सरकार पूरे वित्त वर्ष की बजाय कुछ महीनों तक के लिए ही बजट पेश करती है.

Updated: Jan 31, 2019 4:18 PM
Budget 2020, Budget 2019-20, Arun Jaitley, Finance Minister Jaitley Presents Budget, Interim Budget 2020, Election Year Budget, चुनावी बजट, अंतरिम बजट 2020सरकार के सामने अंतरिम बजट पेश करने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है लेकिन यह एक परंपरा बनी हुई है.

अगले वित्त वर्ष 2019-20 के लिए बजट पेश करने का समय नजदीक आ रहा है लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली आम बजट की बजाय अंतरिम बजट पेश करेंगे. आम परंपरा के अनुसार जिस साल लोकसभा चुनाव होने होते हैं, केंद्र सरकार पूरे वित्त वर्ष की बजाय कुछ महीनों तक के लिए ही बजट पेश करती है. चुनाव खत्म होने के बाद नई गठित सरकार पूर्ण बजट पेश करती है. आइए समझने को कोशिश करते हैं कि सरकार अंतरिम बजट क्यों पेश करती है और यह किस तरह पूर्ण बजट से अलग है.

अंतरिम बजट क्या है और क्यों पेश होता है?

जब केंद्र सरकार के पास पूर्ण बजट पेश करने के लिए समय नहीं होता है तो वह अंतरिम बजट पेश करती है. लोकसभा चुनाव के वक्त सरकार के पास वक्त तो होता है लेकिन परंपरा के मुताबिक चुनाव पूरा होने तक के समय के लिए बजट पेश करती है. यह पूरे साल की बजाय कुछ समय तक के लिए ही होता है. हालांकि अंतरिम बजट ही पेश करने की बाध्यता नहीं होती है लेकिन परंपरा के मुताबिक इसे अगली सरकार पर छोड़ दिया जाता है. नई सरकार के गठन के बाद वह आम बजट पेश करती है.

अंतरिम बजट और आम बजट में अंतर

दोनों ही बजट में सरकारी खर्चों के लिए संसद से मंजूरी ली जाती है लेकिन परंपरा के कारण अंतरिम बजट आम बजट से अलग हो जाता है. अंतरिम बजट में सामान्यतः सरकार कोई नीतिगत फैसला नहीं करती है. इसकी कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है। यह परंपरा रही है कि चुनाव के बाद गठित सरकार ही अपनी नीतियों के मुताबिक फैसले ले और योजनाओं की घोषणा करे. हालांकि कुछ वित्त मंत्री पूर्व टैक्स की दरों में कटौती जैसे नीतिगत फैसले ले चुके हैं.

अंतरिम बजट और लेखानुदान (वोट ऑन अकाउंट) में अंतर

जब केंद्र सरकार पूरे साल की बजाय कुछ ही महीनों के लिए संसद से जरूरी खर्च के लिए अनुमति लेनी होती है तो वह अंतरिम बजट की बजाय वोट ऑन अकाउंट पेश कर सकती है. अंतरिम बजट और वोट ऑन अकाउंट दोनों ही कुछ ही महीनों के लिए होते हैं लेकिन दोनों के पेश करने के तरीकों में तकनीकी अंतर होता है. अंतरिम बजट में केंद्र सरकार खर्च के अलावा राजस्व का भी ब्यौरा पेश करती है जबकि लेखानुदान में सिर्फ खर्च के लिए संसद से मंजूरी मांगती है.

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