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Pegasus जासूसी विवाद की जांच के लिए बंगाल सरकार ने बनाया आयोग, देश भर में किसी को भी पूछताछ के लिए कर सकता है तलब

Pegasus जासूसी विवाद की जांच के लिए पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा जांच आयोग का गठन किए जाने के बाद अब केंद्र पर इसकी जांच का दबाव बढ़ सकता है.

Updated: Jul 28, 2021 10:21 AM
West Bengal probes Pegasus spyware case what are the powers of a Commission of Inquiry know here in detailsThe Shiv Sena noted that the French government had initiated a probe into the allegations of snooping by Pegasus (on senior officials in France).

Pegasus Spyware के जरिए फोन की जासूसी मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने एक जांच आयोग का गठन किया है. राज्य सरकार द्वारा जारी अध्यादेश के मुताबिक यह आयोग जासूसी मामले की जांच करेगा और यह पता लगाएगा कि इसके जरिए जुटाई गई जानकारियों का इस्तेमाल किस तरह से किया गया. नोटिफिकेशन के मुताबिक यह ‘सार्वजनिक महत्व का निश्चित मामला’ है. पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा गठित इस आयोग में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मदन बी लोकुर और कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस ज्योतिर्मय भट्टाचार्य शामिल हैं.

इजराइल की कंपनी NSO ग्रुप के स्पाइवेयर पेगासस के जरिए केंद्रीय मंत्रियों, विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, कारोबारियों और अहम पदों पर बैठे सरकारी अधिकारियों की जासूसी किए जाने के आरोप लग रहे हैं. यह मामला दुनिया भर की 17 मीडिया एजेंसियों की वैश्विक जांच से सामने आया है.

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा इस मामले की जांच के लिए आयोग गठित करने से अब केंद्र सरकार पर इस मामले पर प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ेगा. विपक्ष के नेता पहले ही केंद्र से इसकी जांच की मांग कर चुके हैं. पश्चिम बंगाल सरकार ने छह महीने के भीतर लोकुर आयोग को रिपोर्ट पेश करने को कहा है. हालांकि सरकार इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है. इस रिपोर्ट की फाइंडिग्स को लागू करने के लिए राज्य सरकार बाध्य नहीं है लेकिन इसे कोर्ट में तथ्य के तौर पर पेश किया जा सकता है.

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आयोग के पास सिविल कोर्ट की शक्तियां

कमीशंस ऑफ इंक्यावरी एक्ट, 1952 के तहत सरकार द्वारा गठित किए गए आयोग के पास सिविल कोर्ट की शक्तियां होती हैं. यह कोड ऑफ सिविल प्रोसीजर, 1908 के तहत मामला दर्ज कर सकती है. इसका मतलब हुआ कि इसके पास देश के किसी भी हिस्से से किसी भी शख्स को समन भेजकर उपस्थित होने का आदेश देने की शक्ति है. इसके अलावा इस एक्ट के तहत गठित आयोग के पास देश के किसी भी कोर्ट या ऑफिस से कोई पब्लिक रिकॉर्ड कॉपी मंगाने की शक्ति होती है. एक्ट के सेक्शन 5 के तहत जांच से संबंधित किसी भी महत्वपूर्ण जानकारी के लिए किसी शख्स को बुला सकती है, चाहे वह किसी भी शक्तिशाली पद पर हो.

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केंद्र के ऊपर बढ़ सकता है दबाव

किसी मामले की जांच के लिए केंद्र और राज्य सरकारों, दोनों को ही इस प्रकार के आयोग गठित करने की शक्ति है. हालांकि राज्यों के पास इसे लेकर सीमित शक्तियां हैं कि किन विषयों को लेकर यह आयोग का गठन कर सकती है. हालांकि यहां यह भी है कि वैधानिक रूप से कौन एक ही मामले की जांच के लिए पहले आयोग का गठन करता है. अगर किसी मामले की जांच के लिए केंद्र सरकार ने आयोग का गठन कर दिया है तो उस पर राज्य सरकार बिना केंद्र की मंजूरी के आयोग का गठन नहीं कर सकती है. हालांकि अगर राज्य ने किसी मामले को लेकर जांच आयोग का गठन कर दिया है तो अगर केंद्र समझता है कि जांच का दायरा दो या दो से अधिक राज्यों का है, तो वह उसी मामले को लेकर जांच आयोग का गठन कर सकता है. पेगासस जासूसी मामले में पश्चिम बंगाल की सरकार द्वारा गठित आयोग से अब केंद्र पर भी इस मामले पर प्रतिक्रिया देने का दबाव बढ़ेगा.

पेगासस की लिस्ट में राहुल गांधी, प्रशांत किशोर, अशोक लवासा के फोन नंबर होने का दावा, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और प्रह्लाद पटेल से जुड़े नंबर भी शामिल

पहले भी एक मामले पर बने हैं केंद्र और राज्य के अपने आयोग

केंद्र और राज्य सरकार इससे पहले भी एक ही मामले की जांच के लिए अलग-अलग आयोग गठित कर चुकी हैं. 2002 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जस्टिस जीटी नानावटी और जस्टिस एएच मेहता ने गोधरा ट्रेन को जलाए जाने और उसके बाद राज्य में होने वाले दंगो की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया था. नानावटी आयोग ने गुजरात सरकार को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी थी. इसी मसले को लेकर 2004 में तत्कालीन केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस यूसी बनर्जी की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन किया था. बनर्जी कमीशन के रिपोर्ट की फाइंडिंग्स नानावटी आयोग की रिपोर्ट के विपरीत थी. हालांकि गुजरात हाई कोर्ट ने बाद में बनर्जी आयोग के गठन के अवैध बताते हुए इसकी रिपोर्ट खारिज कर दी थी. हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि राज्य सरकार ने इस मामले की जांच के लिए पहले ही आयोग का गठन किया है, जिसके चलते केंद्र द्वारा समान मामले के लिए आयोग का गठन करना अवैध है.

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कौन से विषय के मामले देख सकते है आयोग?

कमीशंस ऑफ इनक्वायरी एक्ट, 1952 के सेक्शन 2(ए) के तहत केंद्र सरकार द्वारा गठित आयोग सातवीं अनुसूची के केंद्रीय सूची या राज्य सूची या समवर्ती सूची में शामिल किसी भी विषय से जुड़े मामले की जांच के लिए आयोग का गठन कर सकती है. इसके विपरीत राज्य सरकार द्वारा गठित आयोग सिर्फ राज्य सूची व समवर्ती सूची के विषय से जुड़े मामले की जांच के लिए आयोग का गठन कर सकती है. पेगासस जासूसी के मामले में पश्चिम बंगाल सरकार ने पब्लिक ऑर्डर और पुलिस एंट्रीज का उल्लेख किया है. ये राज्य सूची के विषय हैं. हालांकि इसे लेकर इस पर विवाद हो सकता है क्योंकि जांच के दौरान कुछ बिंदु ऐसे हैं जो केंद्रीय सूची के हिस्सा हैं जैसे कि टेलीग्राफ्स, टेलीफोन्स, वायरलेस ब्रॉडकॉस्टिंग या संचार के अन्य साधन केंद्रीय सूची के हिस्सा है.
(सोर्स: इंडियन एक्सप्रेस)

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