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क्या होता है स्टैंडर्ड डिडक्शन, टैक्स एक्जम्शन और रिबेट? आसान भाषा में Tax के मुश्किल टर्म्स

बजट घोषणा में मौजूदा सरकार ने इस 2,500 रुपये की रिबेट को बढ़ाकर 12,500 रुपये कर दिया है जिससे कि अब 5,00,000 रुपये तक की आय कमाने वालों को कोई टैक्स नहीं देना होगा.

Updated: Feb 11, 2019 12:08 PM
understand income tax terms from standard deduction to cess and rebate टैक्स की मुश्किल टर्म्स को समझिए आसान भाषा में.

Tax : टैक्सपेयर्स खासकर नौकरीपेशा लोगों के लिए इनकम टैक्स सेविंग का प्रूफ जमा करने की आखिरी तारीख 31 मार्च 2019 तक है. यानी, यदि टैक्सपेयर्स ने इस अवधि में किसी टैक्स सेविंग निवेश विकल्प में पैसा लगाया है तो वह वित्त वर्ष 2018—19 के दौरान अपनी टैक्स छूट का लाभ ले सकता है. बहरहाल, टैक्स सेविंग से लेकर इनकम टैक्स रिटर्न (income tax return) दाखिल करने की एक पूरी प्रक्रिया हर साल टैक्सपेयर्स को फालो करनी पड़ती है. इनकम टैक्स से जुड़ी इस पूरी प्रक्रिया में कई ऐसे टर्म होते हैं, जिनके बारे में अच्छी तरह नहीं समझते हैं. आइए जानते हैं कुछ ऐसे आम शब्दों के बारे में​ जिनसे हमें हमेशा दो-चार होना पड़ता है…

ग्रॉस टोटल इनकम (gross total income)

इनकम टैक्स के तहत, 5 मुख्य सोर्स से किसी भी व्यक्ति की कमाई के ऊपर टैक्स कैलकुलेट होता है. हाउस प्रॉपर्टी, कैपिटल गेन्स, सैलरी, अन्य सोर्स आदि. एक व्यक्ति की ना सिर्फ सैलरी बल्कि घर का मिलने वाला किराया, सेविंग अकाउंट या पोस्ट ऑफिस से मिलने वाला ब्याज, ये सभी उसकी कमाई है. इनकम टैक्स निकालते वक्त सभी सोर्सेज से की गई कमाई ग्रॉस टोटल इनकम कहलाती है.

स्टैंडर्ड डिडक्शन (standard deduction)

स्टैंडर्ड डिडक्शन एक तय रकम होती है, जो डिडक्शन के तौर पर कोई भी टैक्सपेयर अपनी ग्रॉस टोटल इनकम से घटा सकता है. स्टैंडर्ड डिडक्शन घटाते वक्त इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि किसी व्यक्ति का टोटल खर्च कितना हुआ. चाहे किसी व्यक्ति का टोटल खर्च तय स्टैंडर्ड डिडक्शन से ज्यादा है या कम है, लेकिन टैक्सपेयर बताई गई स्टैंडर्ड डिडक्शन को ही अपनी ग्रॉस टोटल इनकम से घटाएगा. बजट 2019 में स्टैंडर्ड डिडक्शन की रकम को 40,000 से बढ़ा कर 50,000 कर दिया गया.

फाइनेंशियल ईयर और असेसमेंट ईयर (financial year and assessment year)

फाइनेंशियल ईयर को हम करंट ईयर भी बोल सकते हैं. फाइनेंशियल ईयर वो ईयर है जिसमें कोई व्यक्ति टैक्स कमाता है और असेसमेंट ईयर वो ईयर होता है जिसमें वह व्यक्ति फाइनेंशियल ईयर में कमाई गई रकम पर टैक्स भरता है. अगर 2018-19 किसी व्यक्ति का फाइनेंशियल ईयर है तो 2019-20 उसका असेसमेंट ईयर होगा.

टैक्स एक्जम्शन

इनकम टैक्स एक्जम्शन का मतलब है टैक्स में छूट. जिस भी कमाई या चीज पर टैक्स नहीं देना होता है, उसे टैक्स में एक्जम्पटेड बोला जाता है. जैसे इनकम टैक्स में 2,50,000 रुपये तक के टैक्स पर कोई टैक्स नहीं देना होता है, इस रकम पर टैक्स निल है. इसलिए इस रकम को एक्जम्पटेड लिमिट भी बोला जाता है.

सेस (cess)

सेस का मतलब है tax on tax. यानी ये आपकी सैलरी या कमाई पर ना लगकर उस रकम पर लगता है, जो आपको टैक्स के तौर पर सरकार को देनी है. टैक्स देनदारी (Tax liability) में सेस की रकम जोड़कर, फाइनल रकम टैक्स के तौर पर सरकार को दी जाती है. बन रही होती है. सेस किसी विशेष उद्देश्य को पूरा करने के लिए लगाया जाता है. सेस को सिर्फ उसी काम के लिए खर्च किया जाता है जिस नाम से लिया गया है. फिलहाल लोगों को अपनी टैक्स देनदारी का 4 फीसदी Education And Health Cess के नाम से देना पड़ता है.

सरचार्ज (surcharge)

सरचार्ज भी टैक्स के ऊपर टैक्स (Tax On Tax) ही होता है, लेकिन यह सभी टैक्स भरने वालों पर न लगकर, एक तय सीमा से ज्यादा आमदनी वाले Taxpayers पर ही लगता है. Surcharge के रूप में वसूली गई रकम को आम इसे टैक्स की तरह ही किसी भी उद्देश्य के लिए खर्च किया जा सकता है. भारत में 50 लाख रुपये सालाना से ज्यादा कमाने वाले को इनकम टैक्स देनदारी का 10 फीसदी Surcharge के रूप में चुकाना पड़ता है. साथ ही उन्हें सेस भी देना होता है.

रिबेट (rebate)

इनकम टैक्स में रिबेट को सेक्शन 87A के तहत लिया जाता है. यूं तो इनकम टैक्स में सिर्फ 2,50,000 तक की आय पर ही टैक्स में छूट मिलती है. लेकिन पहले हर भारतीय नागरिक को 2,500 तक की रिबेट मिलती थी जिससे की 3.5 लाख तक सालाना आय वालों को कोई टैक्स नहीं देना होता. इसी अंतरिम बजट 2019 में मौजूदा सरकार ने इस 2,500 की रिबेट को बढ़ाकर 12,500 कर दिया है जिससे की अब 5,00,000 तक की आय कमाने वालों को कोई टैक्स नहीं देना होगा.

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