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NBFC संकट से लेकर डिमांड में सुस्ती तक, नई वित्त मंत्री के सामने होंगी ये 5 बड़ी चुनौतियां

नई वित्त मंत्री की राह नहीं होगी आसान

May 31, 2019 4:24 PM
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New FM Big Challenges: मोदी की नई कैबिनेट में वित्त मंत्री बनी निर्मला सीतारमण की राह इतनी आसान नहीं हागी. एक्सपर्ट भी मान रहे हैं निर्मला को ऐसे समय में वित्त मंत्रालय का जिम्मा दिया गया है, जब अर्थव्यवस्था के लिहाज से कई इश्यू सामने दिख रहे हैं. शेयर बाजार के लिहाज से कंजम्पशन स्टोरी में सुस्ती, सरकारी बैंकों के सामने फंसे कर्ज की समस्या और एनबीएफसी में लिक्विडिटी क्राइसिस बड़ी चुनौतियां हैं, जिन पर तुरंत ध्यान दिया जाना जरूरी होगा.

क्या कहते हैं जानकार

प्रभुदास लीलाधर के CEO-PMS अजय बोडके का कहना है कि निर्मला सीतारमण से बाजार को बहुत उम्मीदें हैं. उनका अकेडमिक बैकग्राउंड भी अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है, वहीं इससे पहले वह रक्षा मंत्रालय जैसा अहम पद संभाल चुकी हैं. ऐसे में यह बाजार के लिए अच्छे संकेत हैं. उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह किस तरह से कंजम्पशन स्टोरी को आगे बढ़ाने के लिए काम करती हैं. वहीं देश के सुस्त पड़े निर्यात को तेजी देना भी बड़ा चैलेंज होगा.

फॉर्च्यून फिस्कल के डायरेक्टर जगदीश ठक्कर का कहना है कि बैंकों खासतौर से सरकारी बैंकों में एनपीए की बड़ी समस्या है जो पूरी अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती है. उम्मीद है कि नई वित्त मंत्री की प्राथमिकता में यह इश्यू होगा. बैंकों के कंसोलिडेशन की जो प्रक्रिया पिछली सरकार में शुरू हुई, उसे बेहतर तरीके से पूरा किया जाना जरूरी है. लिक्विडिटी भी एक इश्यू है, जिसपर फोकस करना जरूरी है.

ट्रेडिंग बेल्स के को फाउंडर और COO पार्थ नयाती का कहना है कि निर्मला सीतारमण के वित्त मंत्री बनाए जाने के ऐलान के बाद निफ्टी में 50 अंकों की गिरावट आई, लेकिन बाद में रिकवरी देखी गई. इसके पहले उन्हें मिनिस्ट्री आफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री और डिफेंस मिनिस्ट्री का अनुभव है. उन्होंने दोनों विभागों में बेहतर काम किया है. ऐसे में नए मंत्रालय को लेकर भी उनसे उम्मीदें हैं. आने वाले दिनों में उनके वित्त मंत्री बनने से बाजार का रिएक्शन न्यूट्रल होगा. फिलहाल बाजार को उनसे किसी बड़े निर्णय की उम्मीद है.

ये होंगी बड़ी चुनौतियां

अर्थव्यवस्था में सुस्ती: देश की आर्थिक विकास दर पिछली 5 तिमाही के निचले स्तर 6.6% पर पहुंच गई है. ऐसा माना जा रहा है कि डिमांड में कमी और क्रूड में तेजी आने से आंकड़े और खराब हो सकते हैं. आर्थिक विकास की रफ्तार कैसे बढ़े, यह एक प्रमुख चुनौती है.

​कंजम्पशन: देश में कंजम्पशन स्टोरी सुस्त पड़ी हुई है. आटो व एफएमसीजी सेक्टर, कंज्यूमर ड्यूरेबल पर इसका दबाव देखा जा रहा है. ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 के आखिरी तीन महीनों में एफएमसीजी सेक्टर की वृद्धि दर 16 फीसदी थी और इस साल के पहले तीन महीनों में गिरकर 13.6 फीसदी रह गई है. मानसून को लेकर स्थिति अभी साफ नहीं हो पा रही है. ऐसे में कंजम्पशन स्टोरी आगे बढ़ाने की बड़ी चुनौती नई वित्त मंत्री के सामने होगी.

तेल की कीमतें: इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड में पिछले दिनों तेजी दर्ज हुई है. ओपेक देशों द्वारा उत्पादन सीमित कर दिए जाने से डिमांड और सप्लाई का गैप बढ़ा, जिससे क्रूड में तेजी आई. इसका असर ये है कि देश में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेजी आ रही है. इससे महंगाई बढ़ने का डर बन गया है. इसपर कंट्रोल करना भी एक चुनौती होगी.

NBFC में लिक्विडिटी का संकट: पिछले साल एनबीएफसी में लिक्विडिटी का जो संकट शुरू हुआ, वह अबतक बना हुआ है. पिछले साल के अंतिम महीनों की बात करें तो एनबीएफसी में दबाव ने शेयर बाजार का हाल खराब कर दिया था. इस सेक्टर पर दबाव भी सुस्त कंजम्पशन की एक बड़ी वजह है.

रोजगार व मैन्युफैक्चिरिंग: रोजगार के मोर्चे पर पिछली सरकार को लगातार अलोचना झेलनी पड़ी है. अब संभावित आर्थिक मंदी से रोजगार के नए अवसर पैदा करने में चुनौती और बढ़ जाएगी. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी कमजोरी बनी हुई है. औद्योगिक उत्पादन मार्च में 21 महीने के निचले स्तर (-) 0.1 पर आ गया.

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