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सबरीमला और मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश का मामला SC ने 7 सदस्‍यीय संविधान पीठ को सौंपा

सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर, 2018 को 4:1 के बहुमत से फैसला देते हुए, सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की व्यवस्था को असंवैधानिक करार दिया था.

November 14, 2019 1:23 PM
The Supreme Court refers review pleas on Sabarimala to seven-judge bench for re-examinationसुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर, 2018 को 4:1 के बहुमत से फैसला देते हुए, सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की व्यवस्था को असंवैधानिक करार दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मंदिर, मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और दाऊदी बोहरा समाज में स्त्रियों के खतना सहित विभिन्न धार्मिक मुद्दे गुरुवार को नए सिरे से विचार के लिये सात सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिए. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ इन धार्मिक मुद्दों को नए सिरे से विचार के लिए सात सदस्यीय पीठ को सौंपे जाने पर एकमत थी.

हालाकि, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस इन्दु मल्होत्रा ने बहुमत के फैसले में सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने संबंधी अपने निर्णय पर पुर्निवचार की याचिकाओं को लंबित रखने का निश्चय किया.

संविधान पीठ ने बहुमत के निर्णय में शीर्ष अदालत के 28 सितंबर, 2018 के फैसले पर कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की और न ही पहले के फैसले पर रोक लगाई है. इसी निर्णय में न्यायालय ने सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी.

इस मामले में जस्टिस आर एफ नरिमन और जसिटस धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ ने अल्पमत का फैसला सुनाते हुए सभी पुर्निवचार याचिकाएं खारिज कर दीं और 28 सितंबर, 2018 के निर्णय पर अमल का निर्देश दिया.

सबरीमला मंदिर प्रकरण में संविधान पीठ ने बहुमत का निर्णय 56 पुर्निवचार याचिकाओं सहित 65 याचिकाओं पर सुनाया. न्यायालय के 28 सितंबर के फैसले का केरल में हिंसक विरोध होने के बाद ये याचिकायें दायर की गई थीं.

शीर्ष अदालत ने रोक  को बताया था असंवैधानिक

शीर्ष अदालत ने 28 सितंबर, 2018 को 4:1 के बहुमत से फैसला देते हुए, सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक की व्यवस्था को गैरकानूनी और असंवैधानिक करार दिया था. कोर्ट ने इस व्यवस्था को पक्षपातपूर्ण और महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर अन्याय करार दिया था.

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