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कोरोना के चलते खत्म हुई 1 करोड़ सैलरीड जॉब, एग्रीकल्चर सेक्टर की तरफ शिफ्ट हो रहा लेबर फोर्स

Job Lost: सबसे अधिक दबाव सैलरीड कर्मियों पर है क्योंकि उनके लिए नई स्किल डेवलप करना मुश्किल है और फिर उसके मुताबिक नई नौकरी खोजना भी मुश्किल है.

Updated: Apr 19, 2021 3:02 PM
Salaried jobs lost 10 crore and counting know here the job crisis situationकोरोना महामारी के चलते वित्त वर्ष 2020-21 में 55 लाख नौकरी गईं लेकिन सैलरीड जॉब की बात करें तो यह आंकड़ा 1 करोड़ तक पहुंच जाता है.

वित्त वर्ष 2019-20 में औसतन जितने लोगों की जॉब छूटी थी, उसके मुताबिक कोरोना महामारी के चलते वित्त वर्ष 2020-21 में 55 लाख नौकरी गईं लेकिन सैलरीड जॉब की बात करें तो यह आंकड़ा 1 करोड़ तक पहुंच जाता है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के सीईओ और एमडी महेश व्यास के मुताबिक इन 1 करोड़ जॉब्स में करीब 60 लाख जॉब्स ग्रामीण सेक्टर से गईं जहां एमएसएमई और अन्य इंडस्ट्रियल यूनिट्स पर आए संकट के चलते कामगार बुरी तरह प्रभावित हुए.
कंपनियों और स्माल एस्टैब्लिशमेंट में अवसर न मिलने के चलते लेबर फोर्स एग्रीकल्चर सेक्टर की तरफ शिफ्ट हो रहा है जिससे एक तरह से बेरोजगारी की स्थिति पैदा हो रही है. यह एक तरह से ठीक उल्टा ट्रेंड है जब इकोनॉमी को लिबरलाइज्ड किया गया था तो लोग खेतों से निकलकर फैक्ट्रीज में काम करने आ रहे थे.

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रिस्ट्रिक्ंशस के चलते आजीविका का बढ़ता संकट

महाराष्ट्र में आधे से अधिक कारखाने या तो बंद पड़े हैं या बंद होने की कगार पर हैं.व्यास के मुताबिक शहरों में कोरोना का संक्रमण तेजी से गहराता जा रहा है और इसके चलते राज्य अधिक से अधिक रिस्ट्रिक्शंस लगा रहे हैं जिससे और लोगों की आजीविका जाने की आशंका बन रही है. सीएमआईई के 30-दिनों का मूविंग एवरेज अनएंप्लॉयमेंट मानक की बात करें तो 11 अप्रैल को जॉबलेसनेस 7 फीसदी था जो अब बढ़कर 7.4 फीसदी हो गया है यानी कि लोग तेजी से रोजगार गंवा रहे हैं. व्यास का अनुमान है कि हाउसहोल्ड इनकम में 20 फीसदी की गिरावट आई है और ग्रामीण इलाकों में पिछले साल अक्टूबर 2020 से मजदूरी में अभी कोई सुधार नहीं दिख रहा है.

सैलरीड कर्मियों पर नई स्किल डेवलप करने का दबाव

इनफॉर्मल सेक्टर के अधिकतर कामगार जल्द ही काम पा जाएंगे क्योंकि वे ऐसे ही बैठे ही नहीं रह सकते है लेकिन उन्हें निश्चित ही कमाई का नुकसान झेलना पड़ेगा. व्यास के मुताबिक सबसे अधिक दबाव सैलरीड कर्मियों पर है क्योंकि उनके लिए नई स्किल डेवलप करना मुश्किल है और फिर उसके मुताबिक नई नौकरी खोजना भी मुश्किल है. उनका कहना है कि आज जो एक ड्राफ्ट्समैन के तौर पर काम कर रहा है, वह कल एग्रीकल्चर वर्कर के तौर पर काम नहीं कर सकता है और करीब 1 करोड़ सैलरीड जॉब जा चुकी है तो उनकी चिंता बहुत बड़ी है.

सरकारी विभागों में रोजगार के मौके

उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि अधिकतर सरकारों की निवेश योजना कैपिटल इंटेंसिव थी जो विदेशी कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाली रही. व्यास के मुताबिक बेहतरीन रोजगार के मौके देना बहुत जरूरी है. व्यास का मानना है कि कई सरकारी विभागों में कर्मियों की भारी कमी है जैसे कि स्वास्थ्य व पुलिस विभाग में. ऐसे में सरकार को इनमें अधिक से अधिक भर्तियां करनी चाहिए जिससे कि नागरिकों को भी बेहतर तरीके से इनकी सेवाओं को उपलब्ध कराया जा सकेगा.

महिला कामगारों की संख्या में आ रही गिरावट

कोरोना के चलते लगाए गए रिस्ट्रिक्शंस से हर दिन कमाने वाले लोगों को मजबूरन घर पर रूकना पड़ा जिसके चलते महामारी के बाद करीब 1.2 करोड़ लोगों को रोजगार गंवाना पड़ा जिसमें से अधिकतर इनफॉर्मल सेक्टर से रहे. इसकी तुलना में नोटबंदी के बाद करीब 30 लाख लोगों को रोजगार गंवाना पड़ा था. कोरोना के चलते जिन लोगों ने रोजगार गंवाए, उनकी स्थिति में सिर्फ एक बार जनवरी 2021 में कुछ सुधार आया था जब रोजगार का आंकड़ा 40 करोड़ पहुंच गया. इसके अलावा एक और चिंता की बात है कि महिलाओं मजदूरी की रोजगार में भागीदारी कम होती जा रही है.
(Surya Sarathi Ray)

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