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1 अप्रैल से बदल जाएंगे नियम, RBI के ब्याज दर घटाते ही कम हो जाएगी आपके लोन की EMI

हालांकि एक्सटर्नल बेंचमार्किंग जहां कस्टमर्स के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, वहीं कुछ बैंकों के लिए निगेटिव भी रह सकती है.

February 11, 2019 8:32 AM
external benchmarking system customers will get full benefit of policy rate cutदिसंबर 2018 में RBI ने घोषणा की थी कि वह अप्रैल 2019-20 से पॉलिसी रेट कट में एक्सटर्नल बेंचमार्किंग का नियम लागू करेगा. (Reuters)

दिसंबर 2018 में RBI ने घोषणा की थी कि वह अप्रैल 2019-20 से पॉलिसी रेट कट में एक्सटर्नल बेंचमार्किंग का नियम लागू करेगा. इस नियम के तहत लोन्स में ‘फ्लोटिंग’ (परिवर्तनीय) ब्याज दरें रेपो रेट या गवर्मेंट सिक्योरिटी में निवेश पर यील्ड जैसे बाहरी मानकों से संबद्ध की जाएंगी. इसका फायदा यह होगा कि RBI द्वारा पॉलिसी रेट कम किए जाते ही कस्टमर्स के लिए लोन भी तुंरत सस्ते हो जाएंगे.

फिलहाल बैंक अपने कर्ज पर दरों को प्रिन्सिपल लेंडिंग रेट (PLR), बेंचमार्क प्रिन्सिपल लेंडिंग रेट (BPLR), बेस रेट और मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड बेस्ड लेंडिंग रेट (MCLR) जैसे आंतरिक मानकों के आधार पर तय करते हैं.

SBI के पूर्व CGM सुनील पंत के मुताबिक, एक्सटर्नल बेंचमार्किंग का नियम आने के बाद रिजर्व बैंक द्वारा की जाने वाली कटौती का असर जल्द दिखेगा. अभी रिजर्व बैंक के फैसलों का मार्केट में ट्रांसमिशन होने में वक्त लगता है और असर उतना नहीं दिखता है, जितना दिखना चाहिए.

अभी बैंक रेपो रेट घटने के बाद भी अपने फंड की पोजिशन देखकर कस्टमर्स के लिए कर्ज दरें घटाते हैं. ऐसे में RBI द्वारा की गई कटौती जितना ही लेंडिंग रेट बैंक भी कम कर देंगे, ऐसा नहीं हो पाता है. साथ ही बैंकों द्वारा दर कम किए जाने में वक्त भी लगता है. वहीं हर बैंक लेंडिंग रेट घटाए, ऐसा जरूरी भी नहीं है. लेकिन एक्सटर्नल बेंचमार्किंग का नियम अमल में आ जाने से रेपो रेट घटते ही बैंकों की कर्ज दरें में घटेंगी और उतनी ही घटेंगी,​ जितना रेपो रेट कम हुई. यानी कस्टमर्स को कटौती का पूरा और जल्द ​फायदा मिल सकेगा.

कुछ बैंकों पर पड़ सकता है निगेटिव इंपैक्ट

पंत ने यह भी कहा कि इस प्रणाली के फायदों के साथ रिस्क फैक्टर भी हैं. एक्सटर्नल बेंचमार्किंग जहां कस्टमर्स के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है, वहीं कुछ बैंकों के लिए निगेटिव भी रह सकती है. बैंक अभी RBI द्वारा किए गए रेट कट का फायदा कस्टमर्स को उतना ही देते हैं, जितना वे झेल सकें. एक्सटर्नल बेंचमार्किंग का नियम आ जाने से बैंकों को कटौती का पूरा फायदा कस्टमर्स को देना होगा और ऐसे में हो सकता है कि कुछ बैंकों का मार्जिन इतना न हो कि वे इसे झेल सकें. ऐसे बैंक घाटे में भी जा सकते हैं.

पंत ने कहा कि इन कारकों को देखते हुए हो सकता है कि आगे चलकर RBI रेट कट के वक्त किस बैंक की क्या पोजिशन है, इस बात पर भी गौर करे. ऐसा हुआ तो नई प्रणाली का कोई बड़ा निगेटिव इंपैक्ट नहीं होगा.

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केंद्रीय बैंक के मुताबिक, किसी कर्ज के लिए ब्याज दर निर्धारित मानक दर से कितनी ऊंची रखी जाए, यह निर्णय कर्ज देने वाले बैंक का होगा. मानक दर और कर्ज की दर के बीच का यह अंतर कर्ज की पूरी अवधि के लिए एक जैसा बना रहेगा, बशर्ते उस कर्ज के आकलन में अचानक कोई बड़ा बदलाव न आ जाए या दोनों पक्षों के बीच अनुबंध में बदलाव की सहमति न हो जाए.

एक तरह के लोन के लिए नहीं होगी अलग-अलग स्टैंडर्ड रेट्स

RBI ने यह भी कहा है कि पारदर्शिता, मानकीकरण और कर्जदारों के लिये कर्ज उत्पादों के बारे में आसान समझ सुनिश्चित करने के लिए बैंक किसी एक कर्ज श्रेणी में एक समान बाह्य मानक दर अपनाएंगे. यानी एक ही बैंक द्वारा किसी एक कर्ज श्रेणी में कई मानकों को अपनाने की अनुमति नहीं होगी.

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