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Postal Life Insurance: IL&FS के खराब बांड में डाक जीवन बीमा पॉलिसी धारक भी फंसे हैं.

Updated: Feb 25, 2019 11:12 AM
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इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशिययल सर्विसेज लिमिटेड (IL&FS) बांड का जहर तेजी से फैल रहा है. IL&FS के खराब बांड में डाक जीवन बीमा (Postal Life Insurance) पॉलिसी धारक भी फंसे हैं. आईएएनएस की खबर के मुताबिक इसका असर करीब 47 लाख पॉलिसी धारकों पर हो सकता है, जिनकी 1 लाख करोड़ से ज्यादा रकम पॉलिसी में लगी है. फिलहाल यह आगामी आम चुनाव से पहले सरकार के लिए अच्छी खबर नहीं है. विपक्षी पार्टियों ने भी इन खराब बांड में वेतनभोगियों के फंसने पर चिंता जाहिर की है.

46.8 लाख Postal Life Insurance

ऐसे में सरकार के लिए यह जरूरी हो गया है कि इन बांडों में आई भारी गिरावट को देखते हुए निवेशकों में बढ़ती घबराहट को कम करने के लिए तुरंत कोई कारगर कदम उठाए. बता दें कि पीएलआई पॉलिसी धारकों की सूची में 2016-17 के आखिर में 2,13,323 नई पॉलिसी जुड़ी, जिसकी कुल बीमा रकम 11,096.67 करोड़ रुपये है. वित्त वर्ष 2016-17 के आखिर में कुल पॉलिसी की संख्या 46.8 लाख थी और कुल रकम 1,13,084.31 करोड़ रुपये थी. वित्त वर्ष 2016-17 के अंत में शेष निधि 55,058.61 करोड़ रुपये थी, जबकि किस्त से प्राप्त आय 7,233.89 करोड़ रुपये थी.

क्या है IL&FS

IL&FS को नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनी यानी एनबीएफसी का दर्जा हासिल है और यह सरकारी क्षेत्रकी कंपनी है. सन 1987 में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया और हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कंपनी ने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को कर्ज देने के लिए इसे बनाया था. IL&FS दूसरे बैंकों से लोन लेती है. सरकारी क्षेत्र की कंपनी होने के कारण इसे किसी तरह की गारंटी नहीं देनी पड़ती है. इसे रेटिंग एजेंसिया ने भी अति सुरक्षित का दर्जा दे रखा था.

क्या है IL&FS संकट

IL&FS ग्रुप पर करीब 91 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है, जिसे चुकाने में कंपनी नाकाम रही है. कंपनी के बॉन्ड्स में देश के करीब सभी म्युचुअल फंड्स, इंश्योरेंस कंपनियों और एनबीएफसी का पैसा लगा हुआ है. पिछले साल कंपनी में लिक्विडिटी क्राइसिस की समस्या सामन आई और कंपनी की हालत ऐसी है ​कि बाजार में इसके बॉन्ड्स को खरीददार नहीं मिल रहे हैं. IL&FS पुराने कर्ज चुकाने में बार-बार डिफॉल्ट हो रही है.

कंपनी ने पिछले साल सितंबर में ही तीन डिफॉल्ट किए थे. कंपनी को अब लोन नहीं मिल सकता और ये बाजार से पैसे जुटाने में भी नाकाम है, क्योंकि इसकी रेटिंग ‘जंक स्टेटस’ में बदल चुकी है. आईसीआरए ने जैसे ही कंपनी की रेटिंग घटाई थी उसके बाद से निवेशक, बैंकों, म्यूचुअल फंड में घबराहट फैली, जो अब तक बरकरार है.

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