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बेकार पड़े जमीन से 19,000 करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी में भारतीय रेलवे

शिमला, बांद्रा, रक्सौल, ग्वालियर और पाडी (चेन्नई) में पांच जगह के भूमि की प्रीमियम हाल ही में पेश की गई है जो करीब 72 करोड़ रुपये है.

March 9, 2018 1:17 PM
indian railways, piyush goyal, RLDA, भारतीय रेलवे, पीयूष गोयल, भारत, रेल भूमि विकास प्राधिकरणशिमला, बांद्रा, रक्सौल, ग्वालियर और पाडी (चेन्नई) में पांच जगह के भूमि की प्रीमियम हाल ही में पेश की गई है जो करीब 72 करोड़ रुपये है. (प्रतिकात्मक चित्र: PTI)

भारतीय रेलवे ने अपनी भूमि मुद्रीकरण परियोजना पर तेजी से काम किया है, यह एक ऐसा कदम है जो संभवतः अपने निवेश योग्य संसाधनों को बढ़ा सकता है. आधिकारिक सूत्रों  के मुताबिक RLDA (रेल भूमि विकास प्राधिकरण) ने 30 भूमि पार्सल के वाणिज्यिक विकास के लिए मध्य अप्रैल तक बोलियां आमंत्रित करेगा. ट्रांसपोर्टर्स की संभावित रसीदों के रूप में इन भूमि पार्सल से लीज रेंटल 10 साल की अवधि में लगभग 7,000 करोड़ रुपये हो सकती है. रेलवे की योजना अगले पांच सालों में भूमि मुद्रीकरण से कम से कम 19,000 करोड़ रुपये का अधिग्रहण करने का है, जिसका मतलब है कि ज्यादा से ज्यादा जमीन के पार्सल को जल्द ही वाणिज्यिक उपयोग में लाया जाएगा.

RLDA डेवलपर्स को जमीन दे रही है, जिनका प्रीमियम (रेंटल) आधार पर चयन किया जाएगा जो वे भुगतान करने को तैयार हैं. शिमला, बांद्रा, रक्सौल, ग्वालियर और पाडी (चेन्नई) में पांच जगह के भूमि की प्रीमियम हाल ही में पेश की गई है जो करीब 72 करोड़ रुपये है. झांसी में एक जमीन तैयार है (पट्टे पर देने के लिए) जो 30.5 करोड़ रुपये लाएगी, अधिकारी ने कहा. उन्होंने बताया कि नौ पार्सल के जमीन की निविदाएं पहले ही शुरू हो चुकी है और 6 अन्य भी जल्द ही तैयार किए जाएंगे.

डेवलपर्स वाणिज्यिक उपयोग के प्रकार को तय करने के लिए स्वतंत्र होंगे, जिसमें होटल, मॉल या स्थान पर निर्भर करते हुए व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य कुछ भी शामिल हैं. अधिकारी ने बताया कि दिल्ली में सराय रोहिल्ला (2000 करोड़ रुपये), अशोक विहार (1500 करोड़ रुपये) और मुंबई के बांद्रा (2000 करोड़ रुपये) से बड़े रकम की उम्मीद है. डेवलपर्स को कुल प्रीमियम अपफ्रंट का 10% का भुगतान करना पड़ता है, फिर वे दो-दो साल के लिए बिना भुगतान वाले विकल्प ले सकते हैं. अधिकारी ने कहा, “भुगतान तीसरे वर्ष के बाद से फिर से शुरू होगा जो 10वें साल तक जाएगा. यदि डेवलपर्स चाहें तो उनके पास पूर्ण प्रीमियम अग्रिम भुगतान करने का विकल्प होता है.”

आरएलडीए को 2007 में बनाया गया था जिसे ट्रांसपोर्टर की खाली भूमि के कुछ हिस्सों को वाणिज्य माध्यम के लिए पहचानने का अधिकार था. हालांकि, आरएलडीए ने थोड़ी प्रगति की है कि राज्य सरकारों और अन्य मुद्दों पर लगाए गए भूमि उपयोग प्रतिबंधों से यह लाचार सा हो गया था, रेलवे बोर्ड द्वारा एक टुकड़े टुकड़े के रूप में जमीन को निर्धारित करने की एक पहले की नीति भी शामिल है. सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-17 और 2015-16 में रेल मंत्रालय को सिर्फ 22 करोड़ रुपये दिए गए.

चालू वित्त वर्ष की शुरुआत में, रेलवे द्वारा RLDA को सौंपी गई कुल भूमि 485.70 हेक्टेयर थी. इसी वक्त, रेलवे में कुल 51,648 हेक्टेयर रिक्त भूमि थी – हालांकि बहुसंख्यक रेलवे पटरियों के साथ स्ट्रिप्स हैं जो वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य नहीं हैं – और लगभग 862 हेक्टेयर अतिक्रमण किए गए. रेलवे के मानक नियमों के तहत रेलखंड के दोनों तरफ 15 मीटर की जमीन खाली रखनी होती है. ट्रांसपोर्टर अपने वर्तमान और भविष्य की परियोजनाओं के लिए अपनी खाली जमीन के पार्सल की भी पहचान करने में व्यस्त है. भूमि सीमा को रेखित किया जा रहा है ताकि अतिक्रमण हटाया जा सके और जब आवश्यक हो, भूमि पार्सल परियोजना के लिए तैयार हो जाए. “हालांकि रेल मंत्री ने अभी तक इस नीति को मंजूरी नहीं दी है. अधिकारी ने कहा,  रेलवे इस बात विचार कर रहा है कि आने वाले वक्त में कितनी जमीन इस्तेमाल की जा सकती है.” अधिशेष स्थापित होने के बाद, ये जमीन पार्सल रेलवे परियोजनाओं जैसे कि स्टेशन पुनर्विकास, माल ढुलाई, गोदामों, लॉजिस्टिक्स पार्क और मॉडल स्टेशनों के लिए आवंटित किए जाएंगे. इन आवंटन के बाद अधिशेष RLDA द्वारा वाणिज्यिक विकास के लिए जाएगा.

 

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