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GDP में उतार-चढ़ाव सामान्य बात, पहले भी जा चुकी है काफी नीचे; फिर लौटेगी तेजी

सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में गिरावट को सामान्य बताते हुए कहा है कि इसमें तिमाही आधार पर उतार चढ़ाव सामान्य बात है.

December 5, 2019 7:51 PM
increase or decrease in GDP is normal says modi government minister rao inderjit singhसरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में गिरावट को सामान्य बताते हुए कहा है कि इसमें तिमाही आधार पर उतार चढ़ाव सामान्य बात है.(Representational Image)

सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर में गिरावट को सामान्य बताते हुए कहा है कि इसमें तिमाही आधार पर उतार चढ़ाव सामान्य बात है. इसलिए चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी का घटकर 4.5 फीसदी रह जाना अप्रत्याशित या अभूतपूर्व नहीं है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने गुरुवार को राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान जीडीपी की वास्तविक स्थिति के बारे में पूछे गए एक पूरक प्रश्न पर बताया कि मंत्रालय के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में जीडीपी घटकर 4.5 फीसदी के स्तर पर आ गई है.

आंकड़ों की अस्पष्टता और भ्रांति को लेकर पूछे गए पूरक प्रश्न के जवाब में राव ने स्पष्ट किया कि यह अप्रत्याशित या अभूतपूर्व नहीं है. उन्होंने अतीत के अनुभवों का उदाहरण देते हुए बताया कि 2004-05 के आधार वर्ष पर साल 2008-09 में जीडीपी घटकर 3.9 फीसदी के स्तर पर आ गई थी. इसके अगले ही साल यह 2009-10 में 8.5 फीसदी हो गई.

आगे उछाल आने की उम्मीद

उन्होंने कहा कि तिमाही आधार पर भी जीडीपी में इस तरह का उतार चढ़ाव आना असामान्य नहीं है. 2015 की दूसरी तिमाही में जीडीपी 8.7 फीसदी थी और तीसरी तिमाही में घटकर 5.9 फीसदी रह गई, जबकि इसकी अगली तिमाही में यह फिर से बढ़कर 7.1 फीसदी हो गई. इसी तरह 2016-17 में जीडीपी पहली तिमाही में 9.4 फीसदी से घट कर आठ फीसदी रह गई. राव ने कहा कि इसलिए एक तिमाही में जीडीपी की गिरावट चिंता की बात नहीं है, उम्मीद है कि इसमें आगे उछाल आएगा.

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पहले भी 7 बार बदला गया है आधार वर्ष

राव ने जीडीपी के आकलन हेतु आधार वर्ष में बदलाव किए जाने से जुड़े एक सवाल के जवाब में कहा कि यह पहली बार नहीं हुआ है. संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावित प्रणाली के आधार पर इससे पहले भी 1967 से 2015 तक सात बार आधार वर्ष बदला गया है. उन्होंने उपभोग व्यय में कमी आने को भी गलत बताते हुए कहा कि पिछले तीन साल में निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) 2016-17 में 91.15 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में 112 लाख करोड़ रुपये हो गया है.

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