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गुलाब, गेंदे ने बदली गुजरात के किसानों की जिंदगी, 1 लाख रु महीने की हो रही कमाई

गुजरात सरकार की फ्लोरीकल्चर (फूलों की खेती) पहल गुजरात के किसानों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाई है.

November 7, 2019 1:58 PM
How rose, marigold farming improves Gujarat farmers life, now they earn over Rs 1 lakh per monthगुजरात के दाहोद जिले के रोजम गांव में अपने बेटे और पति के साथ गुलाब फार्म पर गेसुबेन परमार. (Express Image)

गुजरात सरकार की फ्लोरीकल्चर (फूलों की खेती) पहल गुजरात के किसानों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाई है. इस पहल से न केवल किसानों की आय 10 गुना बढ़ी है, बल्कि कामगार अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च उठा पाने में भी सक्षम बने हैं. कुल मिलाकर किसानों का जीवन इस पहल से बेहतर बना है.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी गुजरात में दाहोद जिले की अनुसूचित जनजाति इससे पहले गुजरात के शहरों में कैजुअल मजदूर के तौर पर काम करते थे. यानी उनकी आय का कोई नियमित साधन नहीं था. लेकिन अब वे गुलाब और गेंदा उगाते हैं. इसके चलते उनकी मासिक आय 10 गुना तक बढ़ गई है.

दाहोद की एक किसान गेसूबेन परमार ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,’मेरी मौजूदा मासिक आय 1-1.5 लाख रुपये है. यह शहर में मिलने वाली आय से 10 गुना ज्यादा है. यहां मैंने दो लेबर भी रखे हैं.’ गेसूबेन अब 6 साल तक गुलाब की खेती करेंगी और इस वक्त वह 20000-30000 गुलाब हर माह उगाती हैं. उन्होंने आगे बताया कि सामान्य दिनों में अगर वह गुलाब होलसेल फ्लॉवर वेंडर को बेचती हैं तो प्रति गुलाब 20 पैसे से लेकर मेन रोड पर राह चलते कस्टमर को बेचने पर 10 रुपये तक मिलते हैं. त्योहार जैसे नवरात्रि, दिवाली और गणेश पूजा के समय गुलाब की कीमत 20-40 रुपये तक चली जाती है.

दाहोद लिमखेड़ा तालुका के एक छोटे गांव कंबोई में भी बदलाव देखने को मिला है. यहां के एक तिहाई निवासी फूलों की खेती से जुड़ चुके हैं. कंबोई के 300 घरों में 100 से ज्यादा आदिवासी एंटरप्रेन्योर-किसान ड्राइलैंड क्रॉप एग्रीकल्चर से गुलाब, गेंदा और गुलदाउदी की खेती पर शिफ्ट हो चुके हैं.

कई किसानों की पहली पीढ़ी जा रही स्कूल

गुलाब और गेंदे की खेती से होने वाली आय ने दाहोद के किसानों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने में भी मदद की है. इनमें से कई किसान ऐसे हैं, जिनके परिवार में कोई पहली बार स्कूल जा रहा है. पटेलिया आदिवासी समुदाय की एक 56 वर्षीय महिला के मुताबिक, ‘मेरे पति और मैं नहीं पढ़ सके और न ही हमारा बेटा पढ़ सकता. इसकी वजह थी कि हमें हमेशा एक जगह से दूसरी जगह जाना होता था. लेकिन अब मेरे पोता-पोती स्कूल जा रहे हैं.’ यह महिला और इनके पति दोनों पहले प्रवासी कामगार थे लेकिन अब उनका खुद का खेत है.

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आखिर ऐसा क्या किया गुजरात सरकार ने

गुजरात सरकार ने हॉर्टिकल्चर विभाग से 30000 रुपये की सब्सिडी देकर इन कामगारों को फूलों की खेती करने के लिए प्रेरित करने की पहल की थी. सब्सिडी में खेत तैयार करने, अंकुरण और प्लांटिंग पर किया जाने वाले शुरुआती निवेश कवर होता है. किसानों को एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी मैनेजमेंट एजेंसी (ATMA) के अधिकारियों द्वारा औपचारिक ट्रेनिंग भी दी गई थी.

कम जोखिम भी कर रहा प्रेरित

फूलों की खेती करने के लिए वास्तव में किसानों को जो चीज प्रेरित कर रही है, वह यह है कि इस खेती में जोखिम कम है. अन्य प्रकार की खेती में पहाड़ी भूभाग, पानी की कमी, छोटी जमीन आदि से जुड़े जोखिम हैं. वहीं फूलों की खेती में कम पानी की जरूरत होती है और पूरे साल प्रॉडक्शन हो सकता है.

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