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COVID-19 वैक्सीन इतनी जल्दी कैसे बन गई, किस तरह करती है काम? जानिए इससे जुड़े हर सवाल के जवाब

वैक्सीन बनाने में डेटा और तथ्यों के आधार पर साइंटिफिक मेथड और प्रॉसेस को फॉलो किया गया है तो इसे लेकर कोई संदेह नहीं किया जाना चाहिए.

January 21, 2021 3:03 PM
Experts Explain How do vaccines work and do they help and how covid 19 vaccine made soon know here all details about covid 19 vaccineकोवैक्सीन जांची-परखी तकनीक पर आधारित है.

Covi19 Explained:  भारत में 16 जनवरी से दुनिया का सबसे बड़ा कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हो चुका है. पहले चरण में अब तक वैक्सीन की दो डोज में एक डोज 7 लाख से अधिक लोगों को दी जा चुकी है. डॉक्टर्स और अन्य हेल्थकेयर वर्कर्स समेत कुछ लोगों को वैक्सीन का टीका लेने से झिझक हो रही है. इसकी वजह से वैक्सीन को लेकर कई सवाल खड़े हुए हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में सभी सवालों के जवाब दिए गए हैं जैसेकि वैक्सीन किस तरह कार्य करती है और कोरोना वैक्सीन इतनी जल्दी कैसे बन गई आदि.
वैक्सीन को वैज्ञानिक तरीकों से तैयार किया जाता है. अगर इसे बनाने में डेटा और तथ्यों के आधार पर साइंटिफिक मेथड और प्रॉसेस को फॉलो किया गया है तो इसे लेकर कोई संदेह नहीं किया जाना चाहिए.

इस तरह काम करती है वैक्सीन

वैक्सीन एक ऐसा पदार्थ होता है जो एक तरह से रोग पैदा करने वाले वायरस या बैक्टीरिया के समान होता है जिसे पैथोजेन कहते हैं. जब इसका टीका लगाया जाता है तो यह शरीर के प्रतिरोधक क्षमता को प्रशिक्षण देता है और एक मेमोरी (याददाश्त) तैयार करता है. जब कोई वायरस या बैक्टीरिया (पैथोजेन) भविष्य में शरीर को संक्रमित करता है, तो मेमोरी इसे खत्म करने के लिए तुरंत तैनात हो जाती है और शरीर में रोग पैदा नहीं कर पाता है.

वैक्सीनेशन से सालाना बची 20-30 लाख लोगों की जिंदगियां

वैक्सीन के चलते कई रोगों पर जीत हासिल की जा चुकी है. स्मालपॉक्स की समाप्ति और पोलियो की लगभग समाप्ति के अलावा वैक्सीन के कारण 20 अन्य जानलेवा रोगों से सुरक्षा सुनिश्चित हो सकी है जिससे सालाना 20-30 लाख लोगों की मौत हो सकती थी. भारत में यूनिवर्सल इम्यूनिजेशन प्रोग्राम दुनिया में सबसे बड़ा है और इसके तहत हर साल करीब 2.6 करोड़ बच्चों का टीकाकरण होता है. एक अनुमान के मुताबिक बच्चों के टीकाकरण पर एक डॉलर (72.98 रुपये) किए गए खर्च से अर्थव्यवस्था में 44 डॉलर (3211.01 रुपये) जुड़ता है क्योंकि इससे बचपन में टीकाकरण से वे बड़े होने पर स्वस्थ रहेंगे और जीडीपी में अहम योगदान करेंगे.

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तीन चरणों में तैयार होती है वैक्सीन

वैक्सीन तैयार होने में कई वर्ष लग जाते हैं. सबसे पहले रिसर्च लैब में एक प्रूफ ऑफ कांसेप्ट तैयार किया जाता है. फिर उसके बाद स्थाई और हाईली प्योर प्रॉडक्ट्स के लिए कंट्रोल्ड मैनुफैक्चरिंग प्रॉसेसेज डेवलप किए जाते हैं. इसके बाद उसका जानवरों पर परीक्षण किया जाता है. फिर सेफ्टी और प्रभावी क्षमता जांचने के लिए इंसानों पर उसका परीक्षण किया जाता है. इंसानों पर क्लीनिकल ट्रॉयल तीन चरणों में किया जाता है.

  • पहला चरण: इंसानों पर क्लीनिकल ट्रॉयल के पहले चरण में 20-100 स्वस्थ वालंटियर्स को वैक्सीन डोज देकर देखा जाता है कि वैक्सीन कितनी सुरक्षित है. अगर वैक्सीन कारगर है तो उसके गंभीर साइड इफेक्ट्स और डोज की मात्रा को लेकर अध्ययन किया जाता है.
  • दूसरा चरण: कुछ सौ वालंटियर्स पर इसका परीक्षण किया जाता है. इस चरण में वैक्सीन से लोगों में सबसे अधिक होने वाले साइड इफेक्ट्स को लेकर अध्ययन किया जाता है जो कुछ समय के लिए प्रभावी होते हैं. इसके अलावा इस चरण में यह देखा जाता है कि शरीर की प्रतिरोधी क्षमता वैक्सीन को लेकर कैसी प्रतिक्रिया दे रही है जिसे एक शब्द में इम्यूनोजेनेसिटी कहते हैं.
  • तीसरा चरण: अंतिम चरण में हजारों वालंटियर्स पर ‘ब्लाइंडेड मैनर’ में ट्रॉयल किया जाता है. ब्लाइंडेड मैनर का मतलब हुआ कि दो ग्रुप बनाए जाते हैं जिसमें एक ग्रुप को वैक्सीन की डोज दी जाती है और दूसरे ग्रुप को प्लेसेबो या डमी वैक्सीन दी जाती है. हालांकि वालंटियर्स को जानकारी नहीं होती है कि उन्हें असली वैक्सीन दी गई है या डमी. इस चरण में सेफ्टी को लेकर फिर से अध्ययन किया जाता है और गंभीर साइड इफेक्ट्स को लेकर स्टडी की जाती है. इस चरण में सबसे महत्वपूर्ण स्टडी यह की जाती है कि वैक्सीन इंफेक्शन या बीमारी को रोकने में सक्षम है या नहीं.

इस कारण जल्दी बन गई कोरोना वैक्सीन

  • वैक्सीन तैयार होने में कई वर्ष लगते हैं लेकिन कोरोना वैक्सीन एक साल के भीतर ही तैयार हो गई. इस समय 68 कोरोना वैक्सीन का ह्यूमन क्लीनिकल ट्रॉयल हो रहा है जिसमें से 20 तीसरे चरण में पहुंच चुके हैं और आठ को आपातकालीन प्रयोग की मंजूरी मिल चुकी है. इसके अलावा दो को पूर्ण प्रयोग को मंजूरी मिल चुकी है. कोरोना वैक्सीन के इतनी जल्द बनने का सबसे बड़ा कारण यह रहा कि साइंटिफिक इंफॉर्मेशन को सार्वजिनक तौर पर साझा किया गया और यह वायरस सार्स-कोवी-1 व मेर्स के समान ही है जिन पर पहले ही बहुत काम किया जा चुका है. 11 जनवरी 2020 को इसका जीनोम सीक्वेंस उपलब्ध हुआ था और महज 63 दिनों के भीतर ही मोडेर्ना एमआरएनए-1273 वैक्सीन का ट्रॉयल अमेरिका में पहले फेज में शुरू हो गया.
  • इसके अलावा नियामकों ने वैक्सीन बनाने के प्रॉसेस को तेज करने के उद्देश्य से समानांतर चरणों के लिए क्लीनिकल टेस्टिंग और डेटा रिव्यू की मंजूरी दे दी. सरकारों ने इस पर भारी निवेश भी किया और इनोवेटिव फाइनेंसियल मॉडल के जरिए फॉर्मा कंपनियों के लिए फाइनेंसियल रिस्क की परवाह किए बिना वैक्सीन डेवलप करने को प्रोत्साहित किया.
  • कोरोना वैक्सीन जल्द से जल्द बनने का एक और कारण यह रहा कि इसके लिए सभी उपलब्ध वैक्सीन प्लेटफॉर्म का उपयोग किया गया. उन प्लेटफॉर्म का भी प्रयोग किया गया जिसने अभी तक इंसानों के लिए वैक्सीन विकसित नहीं किया है. फाइजर/बॉयोएनटेक और मोडेर्ना ने इस तकनीक का प्रयोग किया जिसके तहत मानव कोशिकाओं में एमआरएनए फ्रेग्मेंट को सीधे प्रवेश कराया जाता है और यह वायरल स्पाइक प्रोटीन पैदा करती है जो एंटी-वायरल इम्यूनिटी को बढ़ाती है. खास बात यह है कि यह तकनीक पिछले दस साल से कैंसर रोधी वैक्सीन बनाने के लिए डेवलपमेंट प्रॉसेस में है.
  • इसके अलावा नॉन-रेप्लिकेटिंग वायरल वेक्टर्स का डेवलपमेंट पिछले कुछ साल से चल रहा था. 2014-16 में पश्चिमी अफ्रीका में इबोला वायरस को लेकर करीब 60 हजार लोगों को प्रायोगिक एडेनोवायरस आधारित इबोला वैक्सीन लगाया गया था. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स कुछ प्रायोगिक वैक्सीन तैयार करने के लिए चिंपाजी एडेनोवायरस प्लेटफॉर्म का प्रयोग कर रहे थे जिसका इस्तेमाल कोविड19 वैक्सीन बनाने के लिए कर लिया गया. इस प्रकार इनएक्टिवेटेड (असक्रिय) वायरस पर आधारित वैक्सीन लंबे समय से परखा हुआ तरीका है जिसे आईसीएमआर/भारत बॉयोटेक ने प्रयोग किया है. इसी तरीके से चीन ने कम से कम तीन वैक्सीन तैयार किए हैं.
  • हालांकि सभी प्लेटफॉर्म की सीमा भी जानना महत्वपूर्ण है. एमआरएनए एक फ्रेजाइल (क्षणभंगु) मॉलिक्यूल है जिसे फ्रोजेन स्टोरेज जैसे किसी सुरक्षित माहौल की जरूरत होती है. इस वजह से इसके भंडारण में समस्या आती है. वायरल वेक्टर वैक्सीन अधिक स्थायी हैं और इन्हें 2-8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जा सकता है. वायरल वेक्टर वैक्सीन के साथ समस्या यह है कि समान वेक्टर को एक ही शख्स पर अन्य रोगों के लिए नहीं प्रयोग किया जा सकता है क्योंकि एंटी-वेक्टर इम्यूनिटी इसकी प्रभावी क्षमता को खत्म कर देगी. वायरल वैक्सीन आमतौर पर सुरक्षित मानी जाती हैं लेकिन रेस्पेरिटरी सिंसिटियल वायरस और खसरा के खिलाफ इसी प्रकार की वैक्सीन का प्रयोग को मना कर दिया गया क्योंकि वे रोग को बढ़ा सकती थी.

कोवैक्सीन जांची-परखी तकनीक पर आधारित

महामारी ने सुरक्षा से समझौता किए बिना वैक्सीन डेवलपमेंट को लेकर लगने वाले समय को कम करने का बड़ा अवसर दिया है. नियामकों ने आपातकालीन प्रयोग की मंजूरी (EUA) देना शुरू किया है. इसके तहत पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी के समय वैक्सीन को उपलब्धता को सुनिश्चित किया जाता है. हालांकि इस मैकेनिज्म में सुरक्षा के साथ समझौता नहीं किया जाता है और इसमें फेज 1 और फेज 2 का रिव्यू किया जाता है. इसके अलावा फेज 3 फॉलोअप में करीब दो महीने (अमेरिकी नियामक एफडीए) या 70 दिनों (यूरोपियन मेडिकल एजेंसी) के डेटा का भी मूल्यांकन किया जाता है. वैक्सीन की प्रभावी क्षमता के लिए अंतरिम विश्लेषण भी किया जाता है. इसके बाद संक्रमण के अधिक खतरे को देखते हुए वैक्सीन के आपातकालीन प्रयोग के लिए मंजूरी दी जाती है.

भारत में भारत बॉयोटेक की कोवैक्सीन को लेकर सवाल उठाए गए क्योंकि अभी यह क्लीनिकल ट्रॉयल मोड में है. इसके अलावा इसे बैकअप वैक्सीन के तौर पर कहा गया और अन्य वैक्सीन की तुलना में इसे कम बेहतर कहा गया. हालांकि कोवैक्सीन जांची परखी तकनीक पर आधारित है और आमतौर पर इसे सुरक्षित माना जाता है.

कोरोना वायरस म्यूटेंट के खिलाफ वैक्सीन कितनी प्रभावी

कोरोना वायरस अन्य आरएनए वायरस की तुलना में धीमी गति से म्यूटेट हो रही है. इसके बावजूद ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में में इसके नए वैरिएंट सामने आए और अब यह भारत समेत 50 देशों में फैल चुका है. इन वायरसों के स्पाइक प्रोटीन में बदलाव आया है जिसके कारण वे आसानी से शरीर की कोशिकाओं के अंदर प्रवेश कर पा रही हैं. एक आकलन के मुताबिक कोरोना वायरस का यूके वैरिएंट 30-70 फीसदी अधिक तेजी से फैल रहा है. आरंभिक डेटा के मुताबिक कोरोना संक्रमण से उबर चुके लोगों के ब्लड सीरम के जरिए कोरोना वायरस को खत्म किया जा सकता है, चाहे वह म्यूटेंट हो गया हो.

वैक्सीन के असफल होने पर अभी कुछ कहना संभव नहीं है. जिन लोगों को वैक्सीन लगवाने के बावजूद कोरोना संक्रमण हुआ है, उनकी जांच की जानी चाहिए ताकि यह पता लग सके कि कोरोना के किस वैरिएंट से वह संक्रमित हुए हैं. इसके अलावा अभी इस पर अध्धयन किया जाना बाकी है कि कोरोना से ठीक हुए मरीजों या वैक्सीनेटेड लोगों को सीरम से इस वैरिएंट को न्यूट्रलाइज किया जा सकता है या नहीं.

इंफेक्टेड लोग कर सकते हैं इंतजार

अधिक से अधिक लोगों को वैक्सीन लगवाने की सलाह दी जा रही है. अभी तक उपलब्ध डेटा के मुताबिक जो लोग कोरोना पॉजिटिव हो चुके हैं, उनमें जो एंटीबॉडीज बनती है, वह तीन से पांच महीने तक रहती है. हालांकि शरीर की प्रतिरोधी क्षमता कुछ और समय तक रक्षा करने में सक्षम है. ऐसे में अगर वैक्सीन की आपूर्ति पर्याप्त नहीं है तो जिन लोगों को एक बार कोरोना संक्रमण हो चुका है, वे कुछ महीने तक रुक सकते हैं. हालांकि भारत में अभी इसकी आपूर्ति के शॉर्टेज होने के चांसेज कम हैं.

(लेख: शाहिद जमील, वायरोलॉजिस्ट्स, अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी स्कूल ऑफ बॉयोसाइंसेज के निदेशक और वीरेंदर सिंह चौहान, आईसीजीईबी के पूर्व निदेशक, मलेरिया के खिलाफ वैक्सीन बनाने में बड़ी भूमिका)

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