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अब आपके इंटरनेट की स्पीड और होगी तेज, सरकार इसी साल करेगी 5G स्पेक्ट्रम की नीलामी

मौजूदा साल में ही स्पेक्ट्रम नीलामी की जाएगी

June 3, 2019 3:53 PM
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दूरसंचार मंत्री का पद संभालते ही रविशंकर प्रसाद ने सोमवार को बड़ी घोषणा की है. रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि मौजूदा साल में ही 5-जी और अन्य बैंड के लिए स्पेक्ट्रम नीलामी की जाएगी. यह देश की सबसे बड़ी स्पेक्ट्रम नीलामी होगी. माना जा रहा है कि यह नीलामी सेक्टर रेग्युलेटर की तरफ से सुझाए गए दाम पर हो सकती है.

प्रसाद ने कहा कि उनकी प्राथमिकताओं में सरकारी स्वामित्व वाले एमटीएनएल और बीएसएनएल का पुनरुद्धार करना शामिल होगा. उन्होंपे कहा कि दूरसंचार निगमों को पेशेवर और सहयोग के साथ काम करना होगा. हम इसी साल स्पेक्ट्रम की नीलामी करेंगे. प्राथमिकता वाले अन्य मुद्दों में 100 दिनों में 5-जी परीक्षण, 5 लाख वाईफाई हॉटस्पॉट पर तेजी से काम करना और दूरसंचार विनिर्माण को बढ़ावा देना शामिल हैं.

अक्टूबर तक प्रक्रिया हो सकती है पूरी

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार सितंबर या अक्टूबर तक नीलामी की यह प्रक्रिया पूरी की जा सकती है. नीलामी में 5.77 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित बेस प्राइस वाले 8,293.95 मेगाहर्ट्ज स्पेक्ट्रम ऑफर किए जा सकते हैं, जो 2016 में नीलामी में मुहैया कराए गए 2354 मेगाहर्ट्ज के तीन गुना से ज्यादा हैं. 2016 वाले स्पेक्ट्रम ऑक्शन से सरकार को लगभग 66 हजार करोड़ रुपये मिले थे.

2020 तक 5जी सेवा शुरू करने का लक्ष्य

बता दें कि दुनियाभर में दूरसंचार कंपनियों द्वारा हाई स्पीड की सेवा शुरू किए जाने के साथ ही भारत भी 2020 तक 5जी सेवा शुरू करना चाहता है. भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने करीब 8644 मेगाहट्र्ज आवृत्ति के बैंड के स्पेक्ट्रम नीलामी की अनुशंसा की है, जिसका अनुमानित आधार मूल्य (बेस प्राइस) 5 लाख रुपये है. इसमें 5जी सेवा के लिए रेडियो वेब्स भी शामिल हैं.

ऑपरेटर्स को कीमत लग रही है ज्यादा

ट्राई ने 3300-3600 मेगाहट्र्ज बैंड के 5जी स्पेक्ट्रम के लिए 492 करोड़ रुपये प्रति मेगाहट्र्ज की सुरक्षित कीमत की सिफारिश की है, जोकि पूरे भारत में कम से कम 20 मेगाहट्र्ज के लिए है. इस प्रकार एक ऑपरेटर को 9840 करोड़ रुपये चुकाने होंगे, जिसे वे काफी ज्यादा मान रहे हैं.

टेलिकॉम इंडस्ट्री का सुझाव

रिपोर्ट के अनुसार टेलिकॉम इंडस्ट्री ने कहा है कि ट्राई ने स्पेक्ट्रम के लिए जो प्राइस तय करने का सुझाव दिया है वह बहुत ज्यादा है, उससे पार्टिसिपेशन में कमी आ सकती है. उन्होंने साउथ कोरिया जैसे देशों की दलील दी, जहां 5जी स्पेक्ट्रम के लिए कम बेस प्राइस तय किया गया है. 2016 में जियो की एंट्री के समय से इंडस्ट्री में शुरू हुए कड़े प्रतिस्पर्धा के चलते सभी टेलिकॉम कंपनियों की बैलेंसशीट में कमजोरी आई है. इसके चलते कई कंपनियों को कारोबार समेटना पड़ गया और इंडस्ट्री में कंसॉलिडेशन का दौर चला.

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