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सुप्रीम कोर्ट ने कहा, केंद्र की नई टीकाकरण नीति तर्कहीन और मनमानी भरी, 18 से 44 साल वालों के लिए क्यों नहीं खरीदे टीके?

SC on Vaccination Policy: सरकार की नीतियां जनता के अधिकारों के खिलाफ होंगी, तो हम मूक दर्शक बनकर देखते नहीं रहेंगे.

Updated: Jun 03, 2021 12:06 AM
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि महामारी से निपटने से जुड़ी सरकारी नीतियों की न्यायिक समीक्षा उसकी जिम्मेदारी है.

SC Order In Covid-19 Suo Moto Case: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की नई टीकाकरण नीति को पहली नजर में तर्कहीन और मनमानी भरी बताते हुए उस पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं. इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी पूछा है कि केंद्र सरकार ने जब 45 साल से ज्यादा उम्र वालों के लिए टीके खुद खरीदे और उनके मुफ्त टीकाकरण का इंतजाम किया, तो 18 से 44 साल के नागरिकों के मामले में भी ऐसा ही क्यों नहीं किया गया. अदालत ने सरकार से बजट में टीकों की खरीद के लिए पास किए गए 35 हजार करोड़ रुपये का हिसाब-किताब पेश करने को भी कहा है.

देश की सबसे बड़ी अदालत ने यह भी कहा है कि सरकार की नीतियां अगर आम नागरिकों के अधिकारों का हनन करेंगी, तो देश की अदालतें तमाशबीन की तरह मूक दर्शक बनकर सब कुछ देखती नहीं रहेंगी. सुप्रीम कोर्ट को यह कठोर टिप्पणी उस वक्त करनी पड़ी, जब केंद्र सरकार ने अदालतों को कोविड-19 महामारी से निपटने की कोशिशों में दखलंदाजी न करने की नसीहत दी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश का संविधान अदालतों से यह अपेक्षा नहीं करता कि जब सरकारी नीतियों द्वारा नागरिकों के अधिकारों का हनन हो रहा हो तो वो हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोरोना महामारी की दूसरी लहर से निपटने की कोशिशों के दौरान वे सरकार की समझदारी पर सवालिया निशान नहीं लगाना चाहते. लेकिन अदालत यह जरूर देखेगी कि सरकार द्वारा चुनी गई नीति तार्किकता की कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं. कोर्ट यह भी देखेगा कि सरकार की नीतियों का निर्धारण मनमाने ढंग से न किया जाए और उनसे सभी नागरिकों के जीवन जीने के अधिकार की रक्षा हो.

सरकारी नीतियों को संविधान की कसौटी पर परखना हमारा काम : SC

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एल एन राव और जस्टिस एस रवींद्र भट की स्पेशल बेंच ने कहा कि यह बात बार-बार दोहराने की कोई जरूरत नहीं है कि अधिकारों का बंटवारा हमारे संविधान के बुनियादी ढांचे का अंग है और नीतियां बनाना सिर्फ सरकार का काम है. बेंच ने कहा कि यह बात सभी को पता है. लेकिन इसके साथ ही हमारा संविधान यह भी नहीं कहता कि अगर सरकार की नीतियां नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन कर रही हों, तो अदालतें चुपचाप देखती रहें. न्यायिक समीक्षा करना और सरकार की नीतियों को संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर कसना भी एक बेहद जरूरी काम है, जिसकी जिम्मेदारी अदालतों को सौंपी गई है.

कोर्ट सरकारी नीतियों की न्यायिक समीक्षा कर सकता है : SC

बेंच ने कहा, हम जानते हैं कि सरकार के अधिकारों और दायित्वों को अपने हाथ में ले लेना न्यापालिका काम नहीं है. लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार अपने कामकाज के लिए जवाबदेह होती है और नीतियां बनाने के लिए जरूरी संसाधन भी उसी के पास होते हैं. लेकिन अधिकारों के इस बंटवारे का यह मतलब नहीं है कि कोर्ट सरकार की बनाई नीतियों की न्यायिक समीक्षा नहीं कर सकता.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस वक्त वो देश के तमाम लोगों को एक ऐसा प्लेटफॉर्म मुहैया कराने का काम कर रहे हैं, जहां वे महामारी के मैनेजमेंट के बारे में अपनी संवैधानिक शिकायतें पेश कर सकें. इसलिए हम एक खुली अदालती प्रक्रिया के तहत सरकार के साथ इस मसले पर बात कर रहे हैं. इस दौरान सरकार से उसकी नीतियों का औचित्य पूछा जाएगा और यह भी देखा जाएगा कि वे नीतियां संवैधानिकता की कसौटी पर खरी उतरती हैं या नहीं.

पहली नजर में अतार्किक, मनमानी भरी है नई टीकाकरण नीति : SC

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की नई कोरोना वैक्सीनेशन नीति पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं. अदालत ने कहा कि सरकार ने वैक्सीनेशन के मामले में दो तरह की नीति अपनाई है. 45 साल तक के नागरिकों के लिए उसने खुद वैक्सीन खरीदी और मुफ्त टीकाकरण करवाया. लेकिन 1 मई से लागू नई टीकाकरण नीति के तहत 18 से 44 साल तक नागरिकों के लिए वैक्सीन जुटाने की जिम्मेदारी उसने राज्य सरकारों और निजी अस्पतालों पर डाल दी. इस आयु-वर्ग के लोगों को वैक्सीन मुफ्त में मिले इसका इंतजाम भी केंद्र ने नहीं किया. उनके लिए सरकार की नीति यह है कि या तो राज्य सरकारें खुद वैक्सीन खरीदकर उन्हें मुफ्त में मुहैया कराएं या फिर वे निजी अस्पताल में पैसे देकर टीका लगवाएं. सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग उम्र के लोगों के लिए दो तरह की टीकाकरण नीति अपनाने को पहली नज़र में अतार्किक और मनमानी भरा फैसला बताया.

बजट में 35 हजार करोड़ का प्रावधान किया था, खर्च कितना हुआ ?

कोर्ट ने यह भी पूछा है कि केंद्र सरकार ने टीके खरीदने के लिए बजट में 35 हजार करोड़ रुपये का प्रावधान किया था, उसमें से कितनी रकम इस काम पर खर्च की गई है? साथ ही अदालत ने सरकार से यह बताने को भी कहा है कि 35 हजार करोड़ के इस बजट की बची हुई रकम 18 से 44 साल के नागरिकों के टीकाकरण पर खर्च क्यों नहीं की जा सकती?

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कोवैक्सीन, कोविशील्ड और स्पुतनिक की खरीद के आंकड़ों का पूरा ब्योरा भी देने को कहा है. अदालत ने कहा है कि सरकार शुरुआत से अब तक का सारा डेटा हलफनामे के साथ पेश करे. इसमें  सरकार को यह भी बताना होगा कि कितनी वैक्सीन की खरीद का ऑर्डर किस कंपनी को और किस तारीख को दिया गया? सप्लाई की अनुमानित तारीख क्या है? साथ ही सरकार को अदालत में यह भी बताना होगा कि सभी वैक्सीनों का भारतीय कीमत और अंतरराष्ट्रीय कीमत कितनी है? साथ ही सरकार ने अदालत में 31 दिसंबर तक वैक्सीन की पूरी उपलब्धता और टीकाकरण का पूरा रोडमैप बनाकर पेश करने को भी कहा है.

देश की सबसे बड़ी अदालत ने ये तमाम बातें 31 मई के अपने उस आदेश में कही हैं, जिसे बुधवार 2 जून को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश कोविड महामारी के मैनेजमेंट से जुड़े मसलों पर अदालत की अपनी पहल पर चलाए जा रहे केस की सुनवाई के दौरान दिया.

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