तीनों चुनाव आयुक्तों के साथ पीएमओ की ‘अनौपचारिक’ चर्चा पर विवाद, सरकारी चिट्ठी की भाषा पर भी उठे सवाल

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने इस घटनाक्रम पर एतराज जताया, एस वाई कुरैशी ने कहा, सीईसी को बैठक के लिए बुलाने का अधिकार प्रधानमंत्री को भी नहीं.

CEC ECs interacted with PMO after Government note sought presence of poll panel chief
सीईसी सुशील चंद्र (मध्य में), राजीव कुमार (बायें तरफ) और अनूप चंद्र पांडेय.

मोदी सरकार की तरफ से चुनाव आयोग को भेजे गए एक पत्र ने आयोग की स्वायत्तता, निष्पक्षता और संवैधानिक शिष्टाचार को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं. द इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक कानून मंत्रालय की तरफ से आयोग को भेजे गए इस पत्र में कहा गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रधान सचिव पी के मिश्र की अध्यक्षता में एक बैठक बुलाई जा रही है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के उपस्थित रहने की अपेक्षा की जाती है. खबर के मुताबिक आयोग ने शुरुआत में इस पत्र पर एतराज जाहिर किया, लेकिन बाद में 16 नवंबर को मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्र के साथ साथ दोनों चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और अनूप चंद्र पांडेय भी पीएमओ की तरफ से बुलाए गए ऑनलाइन ‘इंटरैक्शन’ में शामिल हुए.

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी खबर में सूत्रों के हवाले से बताया है कि चुनाव आयोग के भीतर पत्र को लेकर काफी असहजता महसूस की गई. सूत्रों के मुताबिक पत्र की भाषा ऐसी है मानो मुख्य चुनाव आयुक्त को बैठक में समन किया जा रहा हो. मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने इस मामले पर खुद कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अखबार को बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस मामले में अपनी ‘अप्रसन्नता’ या नाखुशी के बारे में कानून मंत्रालय को बता दिया था और यह भी साफ कर दिया था कि वे बैठक में शामिल नहीं होंगे. लेकिन खबर के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त ने आखिरकार इस मसले पर कड़ा रुख नहीं अपनाया.

सीईसी समेत कोई भी चुनाव आयुक्त पत्र के जरिए बुलाई गई वीडियो बैठक में शामिल नहीं हुए, उसमें आयोग के दूसरे अफसर मौजूद रहे. लेकिन खबर के मुताबिक इस बैठक के फौरन बाद सीईसी समेत तीनों चुनाव आयुक्तों ने पीएमओ के प्रधान सचिव पी के मिश्रा के साथ ‘अनौपचारिक बातचीत’ में हिस्सा लिया. एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस बातचीत के दौरान कॉमन इलेक्टोरल रोल और उसके लिए जरूरी कई कट-ऑफ की व्यवस्था जैसे चुनाव सुधारों पर चर्चा की गई. इसमें 5 राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम के बारे में कोई बात नहीं हुई. अधिकारी के मुताबिक यह चर्चा इसलिए की गई ताकि चुनाव सुधारों में तेजी लाई जा सके.

दरअसल ये वही चुनाव सुधार हैं, जिनसे जुड़े संशोधनों को बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दी है. हालांकि इससे पहले इन्हीं मुद्दों पर साल 2020 में 13 अगस्त और 3 सितंबर को भी बैठकें हुई थीं, लेकिन उनमें चुनाव आयोग के अधिकारियों ने हिस्सा लिया था, चुनाव आयुक्तों ने नहीं.

औचित्य को लेकर उठ रहे सवाल

चुनाव आयोग को सरकार की तरफ से भेजे गए पत्र और फिर उसके बाद सीईसी समेत तीनों चुनाव आयुक्तों के साथ पीएमओ की चर्चा के औचित्य पर तीखे सवाल उठ रहे हैं. सवाल यह कि क्या यह देश की संवैधानिक परंपरा और चुनाव आयोग की गरिमा और स्वायत्तता के खिलाफ नहीं है?

चुनाव आयोग और पीएमओ के बीच बातचीत के औचित्य के बारे में पूछे जाने पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह अनौपचारिक संवाद था, कोई बैठक नहीं. आयुक्तों ने पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर कोई चर्चा नहीं की और यह सिर्फ चुनाव सुधारों को जल्द से जल्द लागू करने को लेकर सीमित रहा. इसके बावजूद इस चर्चा के संवैधानिक औचित्य को लेकर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि चुनावी मामलों को लेकर सरकार के साथ चुनाव आयोग का संपर्क उसकी एडमिनिस्ट्रेटिव मिनिस्ट्री यानी कानून मंत्रालय तक सीमित रहता है. चुनावों के दौरान सुरक्षा का प्रबंध करने के लिए आयोग गृह मंत्रालय से बातचीत करता है. इसके अलावा जरूरत पड़ने पर सरकार अधिकारी ही तीनों चुनाव आयुक्तों से मुलाकात करते हैं. आयुक्तों को बैठक के लिए सरकारी विभाग में बुलाए जाने या ‘तलब’ किए जाने का तो सवाल ही नहीं उठता है. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक कानून मंत्रालय के अधिकारी इस मसले के बारे में पूछे जाने पर बात करने को तैयार नहीं हुए.

पूर्व चुनाव आयुक्तों ने कहा, ऐसा नहीं होना चाहिए था

देश के कम से कम तीन पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि सरकार की तरफ से भेजी गई चिट्ठी में सीईसी से बैठक में शामिल होने की उम्मीद किया जाना किसी भी मायने में स्वीकार्य नहीं है. इतना ही नहीं, इसके बाद सभी चुनाव आयुक्तों की प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव के साथ अनौपचारिक बातचीत होना एक ऐसा कदम है, जिससे चुनाव आयोग की स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था होने की इमेज को भारी नुकसान हो सकता है.

पूर्व सीईसी एसवाई कुरैशी ने इस घटनाक्रम को खतरनाक (atrocious) बताते हुए कहा कि इसे किसी भी स्पष्टीकरण के जरिए जायज नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार इसी तरह किसी दिन भारत के प्रधान न्यायाधीश समेत सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों को न्यायिक सुधारों पर चर्चा के लिए बुला सकती है? फिर भला सरकार चुनाव आयोग को बैठक के लिए कैसे बुला सकती है? उन्होंने कहा कि सीईसी को बैठक के लिए बुलाने का अधिकार प्रधानमंत्री को भी नहीं है.

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएस कृष्णमूर्ति ने कहा कि चुनाव आयुक्तों के संवैधानिक दर्जे को ध्यान में रखते हुए यह बात साफ है कि उनके लिए सरकारी अधिकारियों द्वारा बुलाई गई किसी भी बैठक में शामिल होना जरूरी नहीं है. हां, सरकार को अगर किसी मसले पर आयोग से कोई बात पूछनी है तो वो लिखकर ऐसा कर सकती है, जिसका लिखित जवाब दिया जा सकता है.

एक और पूर्व सीईसी ने नाम न बताने की शर्त पर इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि सरकार और आयोग के बीच ऐसी बातचीत से हर हाल में बचना चाहिए था. सरकारी बैठकों में पूरे चुनाव आयोग की मौजूदगी रहे, इसकी कोशिश पहले भी हुई थी, लेकिन हमने इसके लिए कभी नहीं गए. इस बार भी ऐसा नहीं होना चाहिए था.

(स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस)

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