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SC Ayodhya verdict: रामजन्म भूमि न्यास को दी गई 2.77 एकड़ की विवादित जमीन, सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का आदेश

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने छह अगस्त से रोजाना 40 दिन तक सुनवाई की थी.

November 10, 2019 5:11 PM
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Ram Temple Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को राजनीतिक रूप से संवेदनशील राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में अपना बहुप्रतीक्षित फैसला सुना दिया है. शीर्ष कोर्ट ने 2.77 एकड़ की पूरी विवादित जमीन राम जन्मभूमि न्यास को देने का आदेश दिया है. वहीं, सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में 5 एकड़ की वैकल्पिक जमीन देने का फैसला सुनाया है. चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने भारतीय इतिहास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस व्यवस्था के साथ ही करीब 130 साल से चले आ रहे इस संवेदनशील विवाद का पटाक्षेप कर दिया.

शीर्ष अदालत ने कहा कि मस्जिद का निर्माण ‘प्रमुख स्थल’ पर किया जाना चाहिए और सरकार को उस स्थान पर मंदिर निर्माण के लिये तीन महीने के भीतर एक ट्रस्ट गठित करना चाहिए जिसके प्रति अधिकांश हिन्दुओं का मानना है कि भगवान राम का जन्म वहीं पर हुआ था. इस स्थान पर 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद थी जिसे कार सेवकों ने छह दिसंबर, 1992 को गिरा दिया था. संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर शामिल थे.

पीठ ने कहा कि 2.77 एकड़ की विवादित भूमि का अधिकार राम लला की मूर्ति को सौंप दिया जाए, हालांकि इसका कब्जा केन्द्र सरकार के रिसीवर के पास ही रहेगा. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि केंद्र सरकार 3-4 महीने में ट्रस्ट बनाने के लिए स्कीम बनाए और मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट को विवादित जमीन दी जाए.

इस बीच, एक मुस्लिम पक्षकार के वकील जफरयाब जीलानी ने फैसले पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि फैसले का अध्ययन करने के बाद अगली रणनीति तैयार की जाएगी. दूसरी ओर, निर्मोही अखाड़े ने कहा कि उसका दावा खारिज किए जाने का उसे कोई दु:ख नहीं है.

अयोध्या मसले पर संविधान पीठ ने 16 अक्टूबर को इस मामले की सुनवाई पूरी की थी. उधर, फैसले के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में धारा 144 लागू कर दी गई है. सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबंद इंतजाम किए गए हैं.

SC के फैसले के प्रमुख अंश:

  • केंद्र और उप्र सरकार साथ मिलकर प्राधिकार की आगे की कार्रवाई की निगरानी कर सकती हैं: सुप्रीम कोर्ट (PTI)
  • केंद्र सरकार 3-4 महीने में ट्रस्ट बनाने के लिए स्कीम बनाए और मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट को विवादित जमीन दी जाए. कोर्ट ने केन्द्र को यह भी आ​देश दिया है कि इस ट्रस्ट को स्थापित करने में निर्मोही अखाड़े को भी किसी तरह का प्रतिनिधित्व देने पर विचार किया जाए. (ANI)
  • अयोध्या में 5 एकड़ की वैकल्पिक जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाए: सुप्रीम कोर्ट (ANI)
  • रामजन्म भूमि न्यास को दी गई विवादित जमीन
  • हालांकि कोर्ट ने यह माना कि बाबरी मस्जिद को नुकसान पहुंचाना कानून का उल्लंघन था. (PTI)
  • वहीं हिंदुओं ने यह सबित किया कि मस्जिद के बाहरी हिस्से पर उनका कब्जा था: सुप्रीम कोर्ट
  • विवादित स्थल के बाहरी आंगन पर मुस्लिमों का कब्जा नहीं था. यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड अयोध्या मामले में अपना पक्ष स्थापित करने में असफल रहा: सुप्रीम कोर्ट
  • इस बात के सबूत नहीं हैं कि मुस्लिमों ने मस्जिद का त्याग कर दिया था. हिंदू हमेशा से मानते रहे हैं कि भगवान राम का जन्म मस्जिद के भीतरी आंगन में हुआ था. यह साबित हुआ है कि मुस्लिम भीतरी आंगन में इबादत करते रहे और हिंदू बाहरी आंगन में: सुप्रीम कोर्ट (ANI)
  • मुस्लिमों ने मस्जिद को नहीं छोड़ा. हिंदू राम चबूतरा की पूजा करते रहे लेकिन वे गर्भ गृह के मालिकाना हक को लेकर भी दावा करते रहे: सुप्रीम कोर्ट (ANI)
  • सबूत है कि अंग्रेजों के आने से पहले हिंदू राम चबूतरा, सीता रसोई की पूजा करते थे. रिकॉर्ड्स में मौजूद सबूत दर्शाते हैं कि विवादित जमीन के बाहरी हिस्से में हिंदुओं का कब्जा था. (ANI)
  • आस्था और विश्वास पर शीर्षक तय नहीं किए जा सकते लेकिन दावों पर किए जा सकते हैं. ऐतिहासिक तथ्य हिंदुओं के इस विश्वास की ओर संकेत करते हैं कि अयोध्या भगवान राम की जन्मस्थली है: सुप्रीम कोर्ट (ANI)
  • हिंदुओं की आस्था और विश्वास है कि भगवान राम गुंबद के नीचे पैदा हुए. आस्था व्यक्तिगत विश्वास का मामला है: सुप्रीम कोर्ट (ANI)
  • हालांकि ASI यह स्थापित नहीं कर पाया कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को ध्वस्त कर किया गया था: सुप्रीम कोर्ट (PTI)
  • बाबरी मस्जिद का निर्माण खाली जगह पर हुआ था, जमीन के नीचे का ढांचा इस्लामिक नहीं था. ASI के निष्कर्षों से साबित हुआ कि नष्ट किए गए ढांचे के नीचे मंदिर था: सुप्रीम कोर्ट (PTI)
  • हिंदुओं की आस्था कि भगवान राम अयोध्या में पैदा हुए, यह निर्विवाद है. (ANI)
  • हिंदू अयोध्या को भगवान राम की जन्मभूमि मानते हैं. उनकी धार्मिक भावनाएं हैं, मुस्लिम इसे बाबरी मस्जिद कहते हैं. (ANI)
  • निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज. कोर्ट ने कहा उनका दावा केवल प्रबंधन का. निर्मोही अखाड़ा शबैत (भक्त) नहीं. (ANI)
  • सीजेआई ने कहा कि बाबरी मस्जिद को मीर बकी ने बनाया था. कोर्ट धर्मशास्त्र में पड़े, यह उचित नहीं. (ANI)
  • भारत के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने 1946 में फैजाबाद कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली शिया वक्फ बोर्ड की स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) को खारिज कर दिया है. (ANI)

इससे पहले, चीफ जस्टिस गोगोई ने शुक्रवार को उप्र के मुख्य सचिव राजेन्द्र कुमार तिवारी और प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओम प्रकाश सिंह को अपने कक्ष में बुलाकर उनसे राज्य में सुरक्षा बंदोबस्तों और कानून व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त की थी.

पीएम मोदी ने की शांति की अपील

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले पर शनिवार को उच्चतम न्यायालय का फैसला आने से पहले देशवासियों से शांति बनाए रखने की अपील की है. प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार रात सिलसिलेवार ट्वीट कर यह अपील की. प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया, “अयोध्या पर कल सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आ रहा है. पिछले कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट में निरंतर इस विषय पर सुनवाई हो रही थी, पूरा देश उत्सुकता से देख रहा था. इस दौरान समाज के सभी वर्गों की तरफ से सद्भावना का वातावरण बनाए रखने के लिए किए गए प्रयास बहुत सराहनीय हैं.”

उन्होंने कहा, “देश की न्यायपालिका के मान-सम्मान को सर्वोपरि रखते हुए समाज के सभी पक्षों ने, सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों ने, सभी पक्षकारों ने बीते दिनों सौहार्दपूर्ण और सकारात्मक वातावरण बनाने के लिए जो प्रयास किए, वे स्वागत योग्य हैं. कोर्ट के निर्णय के बाद भी हम सबको मिलकर सौहार्द बनाए रखना है.”

प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया, “अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वो किसी की हार-जीत नहीं होगा. देशवासियों से मेरी अपील है कि हम सब की यह प्राथमिकता रहे कि ये फैसला भारत की शांति, एकता और सद्भावना की महान परंपरा को और बल दे.”

40 दिन तक चली सुनवाई

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने, अयोध्या में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान- के बीच बराबर बराबर बांटने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सितंबर, 2010 के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर छह अगस्त से रोजाना 40 दिन तक सुनवाई की थी.

इस दौरान विभन्न पक्षों ने अपनी अपनी दलीलें पेश की थीं. संविधान पीठ ने इस मामले में सुनवाई पूरी करते हुए संबंधित पक्षों को ‘मोल्डिंग ऑफ रिलीफ’ (राहत में बदलाव) के मुद्दे पर लिखित दलील दाखिल करने के लिये तीन दिन का समय दिया था. उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर सभी पक्षकारों की दलीलों को विस्तार से सुना.

संविधान पीठ द्वारा किसी भी दिन फैसला सुनाये जाने की संभावना को देखते हुये केन्द्र ने देश भर में सुरक्षा बंदोबस्त कड़े कर दिए. अयोध्या में भी सुरक्षा बंदोबस्त चाक चौबंद किए गए हैं ताकि किसी प्रकार की कोई अप्रिय घटना नहीं हो सके.

मध्यस्थता से समाधान निकालने में नहीं मिली सफलता

संविधान पीठ ने इस प्रकरण पर 6 अगस्त से नियमित सुनवाई शुरू करने से पहले मध्यस्थता के माध्यम से इस विवाद का सर्वमान्य समाधान खोजने का प्रयास किया था. न्यायालय ने इसके लिये शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एफएमआई कलीफुल्ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति भी गठित की थी लेकिन उसे इसमें सफलता नहीं मिली. इसके बाद, प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने सारे प्रकरण पर छह अगस्त से रोजाना सुनवाई करने का निर्णय किया.

निचली अदालत में दायर हुए था 5 मुकदमे

शुरुआत में निचली अदालत में इस मसले पर पांच वाद दायर किए गए थे. पहला मुकदमा ‘राम लला’ के भक्त गोपाल सिंह विशारद ने 1950 में दायर किया था. इसमें उन्होंने विवादित स्थल पर हिन्दुओं के पूजा अर्चना का अधिकार लागू करने का अनुरोध किया था. उसी साल, परमहंस रामचन्द्र दास ने भी पूजा अर्चना जारी रखने और विवादित ढांचे के मध्य गुंबद के नीचे ही मूर्तियां रखी रहने के लिए मुकदमा दायर किया था. लेकिन बाद में यह मुकदमा वापस ले लिया गया था.

बाद में, निर्मोही अखाड़े ने 1959 में 2.77 एकड़ विवादित स्थल के प्रबंधन और शेबैती अधिकार के लिये निचली अदालत में वाद दायर किया. इसके दो साल बाद 1961 में उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड भी अदालत में पहुंचा गया और उसने विवादित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक होने का दावा किया.

उच्च न्यायालय के फैसले को दी गई थी चुनौती

‘राम लला विराजमान’ की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश देवकी नंदन अग्रवाल और जन्म भूमि ने 1989 में मुकदमा दायर कर समूची संपत्ति पर अपना दावा किया और कहा कि इस भूमि का स्वरूप देवता का और एक ‘न्यायिक व्यक्ति’ जैसा है. अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने की घटना और इसे लेकर देश में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद सारे मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय को निर्णय के लिये सौंप दिए गए थे.

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला- के बीच बांटने के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई थी. शीर्ष अदालत ने मई 2011 में उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाते हुए अयोध्या में यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिया था.

 

Input: PTI/ANI

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