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अयोध्या मसला: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका डालेगा मुस्लिम पक्ष, AIMPLB की बैठक में हुआ फैसला

मस्जिद की जमीन के बदले में मुसलमान कोई अन्य जमीन कबूल नहीं कर सकते: AIMPLB

Updated: Nov 17, 2019 5:31 PM
Ayodhya verdict: muslim community to file review petition against Supreme Court’s November 9 judgment, all india muslim personal law board, Jamiat Ulama-i-Hindप्रेस कांफ्रेंस में बोलते हुए AIMPLB के सैयद कासिम रसूल इलियास (Image: ANI)

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने अयोध्या मामले में 9 नवंबर को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर करने का फैसला किया है. यह फैसला बोर्ड की वर्किंग कमेटी की बैठक में लिया गया. इसकी जानकारी बोर्ड के सचिव जफरयाब जिलानी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी. उन्होंने बताया कि अयोध्या मामले पर 9 नवंबर को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर पुनर्विचार याचिका दाखिल की जाएगी. मस्जिद की जमीन के बदले में मुसलमान कोई अन्य जमीन कबूल नहीं कर सकते हैं.

बता दें कि 9 नवंबर के फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच ने अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित जमीन रामलला को देने का फैसला सुनाया था. वहीं मुस्लिम समुदाय को अलग से अयोध्या में ही 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था.

आखिरी दम तक जारी रहेगी कानूनी लड़ाई

जफरयाब जिलानी ने कहा, ‘बोर्ड का मानना है कि मस्जिद की जमीन अल्लाह की है और शरई कानून के मुताबिक, वह किसी और को नहीं दी जा सकती. उस जमीन के लिए आखिरी दम तक कानूनी लड़ाई लड़ी जाएगी.’ आगे कहा कि 23 दिसंबर 1949 की रात बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्तियां रखा जाना असंवैधानिक था तो सुप्रीम कोर्ट ने उन मूर्तियों को आराध्य कैसे मान लिया. वे तो हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार भी आराध्य नहीं हो सकते.

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जमीयत उलेमा-ए-हिंद भी साथ

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के चीफ मौलाना अरशद मदानी ने भी पुनर्विचार याचिका डालने की बात कही है. उन्होंने कहा कि हम जानते हैं कि यह 100 फीसदी खारिज हो जाएगी, फिर भी हम याचिका दायर करेंगे. यह हमारा हक है. मस्जिद हमारी नाक का मसला नहीं है. यह शरिया कानून का मसला है. हम न मस्जिद दे सकते हैं, न उसके बदले कुछ ले सकते हैं. इस विषय पर संगठन की ओर से बनाए गए पांच सदस्यीय पैनल की कानून के विशेषज्ञों से विचार-विमर्श करने के बाद बनी राय के आधार पर यह निर्णय लिया गया. मौलाना मदनी ने एक बयान में कहा, ‘माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक हजार से अधिक पृष्ठों वाले निर्णय में मुस्लिम पक्ष के अधिकतर तर्कों को स्वीकार किया. ऐसे में अभी भी कानूनी विकल्प मौजूद हैं.’

मदनी ने दावा किया, ‘अदालत ने पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट से यह स्पष्ट कर दिया कि मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर नहीं किया गया. 1949 में मस्जिद के बाहरी हिस्से में अवैध रूप से मूर्ति रखी गई और फिर वहां से उसे अंदर के गुम्बद के नीचे वाले हिस्से में स्थानांतरित किया गया, जबकि उस दिन तक वहां नमाज का सिलसिला जारी था.’ मदनी ने कहा कि अदालत ने भी माना कि 1857 से 1949 तक मुसलमान वहां नमाज पढ़ता रहा तो फिर 90 साल तक जिस मस्जिद में नमाज पढ़ी जाती हो, उसको मंदिर को देने का फैसला समझ से परे है.

Input: PTI

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