सर्वाधिक पढ़ी गईं

मुगल साम्राज्य, ब्रिटिश हुकूमत और आजादी के बाद भी नहीं सुलझ सका था अयोध्या मसला, दशकों बाद अब जाकर हुआ खत्म

दशकों तक अनसुलझा रहा अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद आखिरकार 9 नवम्बर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद समाप्त हो गया.

November 10, 2019 5:18 PM

Ayodhya dispute spanning Mughal, colonial & post-Independence era ends on Nov 9, 2019, ram mandir, babri masjid case, supreme court verdict on ram janmsthan

मुगल साम्राज्य, ब्रिटिश शासन…और फिर स्वतंत्रता के बाद भी दशकों तक अनसुलझा रहा अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद आखिरकार 9 नवम्बर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद समाप्त हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि 1989 में ‘भगवान श्रीराम लला विराजमान’ की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी क्योंकि अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी ‘पूजा-सेवा’ जारी रही.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने मुसलमान पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि राम लला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त है क्योंकि घटना 1949 की है और याचिका 1989 में दायर की गई है. अयोध्या में विवादित स्थल राम जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुए केन्द्र सरकार को निर्देश दिया कि ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड’ को मस्जिद के निर्माण के लिए पांच एकड़ भूमि आवंटित की जाए.

130 साल पुराना विवाद

भारतीय इतिहास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस व्यवस्था के साथ ही करीब 130 साल से चले आ रहे इस संवेदनशील विवाद पर परदा गिर गया. देश का सामाजिक ताना बाना इस विवाद के चलते बिखरा हुआ था. मुगल बादशाह बाबर के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में कराया था. यह पाया गया कि यह स्थल दशकों से निरंतर संघर्ष का एक केन्द्र रहा और 1856-57 में, मस्जिद के आसपास के इलाकों में हिंदू और मुसलमानों के बीच कई बार दंगे भड़क उठे.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो धार्मिक समुदायों के बीच कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की. भीतरी बरामदे का इस्तेमाल मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे.

SC Ayodhya verdict: रामजन्म भूमि न्यास को दी गई 2.77 एकड़ की विवादित जमीन, सुन्नी बक्फ बोर्ड को 5 एकड़ वैकल्पिक जमीन देने का आदेश

16 जनवरी 1950 को दर्ज हुआ पहला मुकदमा

इस विवाद में पहला मुकदमा ‘राम लला’ के भक्त गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 को दायर किया था. इसमें उन्होंने विवादित स्थल पर हिन्दुओं के पूजा अर्चना का अधिकार लागू करने का अनुरोध किया था. उसी साल, पांच दिसंबर, 1950 को परमहंस रामचन्द्र दास ने भी पूजा अर्चना जारी रखने और विवादित ढांचे के मध्य गुंबद के नीचे ही मूर्तियां रखी रहने के लिए मुकदमा दायर किया था. लेकिन उन्होंने 18 सितंबर, 1990 को यह मुकदमा वापस ले लिया था.

1959 में निर्मोही अखाड़ा, 1961 में यूपी सुन्नी वक्त बोर्ड ने दिया दखल

बाद में, निर्मोही अखाड़े ने 1959 में 2.77 एकड़ विवादित स्थल के प्रबंधन और शेबैती अधिकार के लिये निचली अदालत में वाद दायर किया. इसके दो साल बाद 18 दिसंबर 1961 को उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड भी अदालत में पहुंचा गया और उसने बाबरी मस्जिद की विवादित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक होने का दावा करते हुए इसे बोर्ड को सौंपने और वहां रखी मूर्तियां हटाने का अनुरोध किया.

1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस

अयोध्या में 6 दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराए जाने की घटना और इसे लेकर देश में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद सारे मुकदमे इलाहाबाद उच्च न्यायालय को निर्णय के लिए सौंप दिए गए थे. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों-सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच बांटने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.

अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद: जानें 1528 से 2019 तक का पूरा घटनाक्रम

Get Business News in Hindi, latest India News in Hindi, and other breaking news on share market, investment scheme and much more on Financial Express Hindi. Like us on Facebook, Follow us on Twitter for latest financial news and share market updates.

  1. बिज़नस न्यूज़
  2. राष्ट्रीय
  3. मुगल साम्राज्य, ब्रिटिश हुकूमत और आजादी के बाद भी नहीं सुलझ सका था अयोध्या मसला, दशकों बाद अब जाकर हुआ खत्म

Go to Top