New CEA And Economic Survey: आर्थिक सर्वेक्षण से ठीक पहले नए CEA की नियुक्ति : दिलचस्प है यह टाइमिंग

Appointment of New CEA Just Before Economic Survey: 31 जनवरी को इकनॉमिक सर्वे पेश होना है, जिसे तैयार करना CEA का काम होता है. लेकिन नए CEA की नियुक्ति इसी 28 जनवरी को की गई है. आखिर क्या है आखिरी वक्त में की गई इस नियुक्ति की अहमियत?

मोदी सरकार ने 28 जनवरी को वी अनंत नागेश्वरन को नया मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त करने का एलान किया है.

Importance of Appointing New CEA in the Last Moment: केंद्र सरकार ने 31 जनवरी को इकनॉमिक सर्वे पेश किए जाने तीन दिन पहले मुख्य आर्थिक सलाहकार की नियुक्ति करके बड़ा कदम उठाया है. यह महत्वपूर्ण पद दिसंबर 2021 के पहले सप्ताह में पिछले सीईए का कार्यकाल खत्म होने के बाद से ही खाली पड़ा था. दरअसल, पिछले सीईए के वी सुब्रमण्यम ने अक्टूबर 2021 में ही एलान कर दिया था कि वे अपना कार्यकाल खत्म होने के बाद इस पद पर बने नहीं रहेंगे. दिसंबर के पहले सप्ताह में उनका कार्यकाल खत्म भी हो गया, लेकिन नए सीईए की नियुक्ति का एलान अब जाकर (28 जनवरी को) किया गया है. 

सीईए का पद खाली रहने पर उठ रहे थे सवाल

सीईए का पद खाली रहने के दौरान ऐसी चर्चाएं होती रहीं कि इस बार का आर्थिक सर्वेक्षण सीईए की गैरमौजूदगी में ही पेश करना पड़ेगा. ऐसी खबरें भी आईं कि सीईए के न होने की वजह से इस बार आर्थिक सर्वेक्षण दो की बजाय एक वॉल्यूम में ही पेश किया जाएगा, जिसमें मुख्य आर्थिक सलाहकार की तरफ से पेश किए जाने वाले पॉलिसी प्रिस्क्रिप्शन की कोई जगह नहीं होगी. 

दरअसल, बजट से पहले पेश होने वाले आर्थिक सर्वेक्षण को तैयार करना ही सीईए की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानी जाती है. ऐसे में 31 जनवरी को अगर यह पद खाली रहता तो आलोचकों को सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने का एक और मौका मिल जाता. जाहिर है, सीईए के तौर पर अर्थशास्त्री वी अनंत नागेश्वरन की नियुक्ति की टाइमिंग को आलोचनाओं का मुंह बंद करने एक कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है. लेकिन यह सवाल अब भी बना हुआ है कि अंतिम वक्त में की गई इस नियुक्ति से क्या आर्थिक सर्वेक्षण तैयार करने की प्रक्रिया और उसकी क्वॉलिटी पर भी कोई असर पड़ेगा?

अंतिम वक्त में नियुक्ति से क्या लाभ होगा?

यह बात तो कोई भी समझ सकता है कि आर्थिक सर्वेक्षण जैसे विस्तृत दस्तावेज को तैयार करना लंबा वक्त लेने वाला काम है. पेश करने की तारीख के तीन दिन पहले पद संभालने वाले सीईए इसमें शायद ही कोई बदलाव या वैल्यू एडीशन कर पाएंगे. इसी मसले को दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यह सवाल भी उठ सकता है कि आर्थिक सर्वेक्षण को तैयार करने में सीईए की भूमिका क्या वाकई इतनी अहम है या यह पद सिर्फ नाम के लिए होता है, जिसके खाली रहने, न रहने से पूरी प्रक्रिया पर कोई खास असर नहीं पड़ता? सवाल यह भी है कि देश की इकॉनमी के मैनेजमेंट में आर्थिक सर्वेक्षण की अहमियत क्या है? 

क्यों महत्वपूर्ण है इकनॉमिक सर्वे? 

देश के जानेमाने अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार बताते हैं कि देश के आर्थिक हालात का गहराई से विश्लेषण करके सही नतीजों तक पहुंचना इकनॉमिक सर्वे की जिम्मेदारी है, ताकि अर्थव्यवस्था में नई जान डालने का रास्ता निकाला जा सके. उनके मुताबिक उम्मीद यह भी की जाती है कि आर्थिक सर्वेक्षण बजट प्रस्तावों को सही दिशा देने का काम करेगा. खास तौर पर आर्थिक संकट के दौर में तो इसकी अहमियत और भी बढ़ जाती है. अरुण कुमार बताते हैं कि बजट एक टेक्निकल डॉक्युमेंट होता है, जिसे ठीक से समझना उन लोगों के लिए आसान नहीं होता जो इस विषय के एक्सपर्ट नहीं हैं, भले ही वे काफी बुद्धिमान और पढ़े-लिखे हों. लेकिन इकनॉमिक सर्वे के जरिए ऐसे लोग देश के आर्थिक हालात को काफी हद तक समझ सकते हैं.

इकनॉमिक सर्वे पर क्या पड़ा होगा असर?

वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रोफेसर प्रवीण झा का कहना है कि आर्थिक सर्वेक्षण की गिनती हर साल पेश होने वाले देश के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक और वित्तीय दस्तावेजों में होती है. वे कहते हैं कि ऐसे महत्वपूर्ण दस्तावेज को तैयार करने के दौरान सीईए का पद खाली रहना किसी मज़ाक से कम नहीं. उन्हें लगता है कि मौजूदा सरकार ऐसे विशेषज्ञता वाले पदों की अहमियत को लेकर गंभीर नहीं है और इन्हें सिर्फ सेरेमोनियल यानी दिखावे का मानती है. प्रोफेसर झा का कहना है कि आर्थिक सर्वेक्षण भले ही तत्कालीन सरकार के आर्थिक विज़न का ही एक अंग हो, लेकिन ऐतिहासिक रूप से इसे तैयार करने में मुख्य आर्थिक सलाहकार और उनकी टीम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है.

प्रोफेसर अरुण कुमार मानते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था फिलहाल जिस मुश्किल और जटिल दौर से गुज़र रही है, उसमें तमाम आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करके सही आर्थिक दिशा दिखाने की जिम्मेदारी सीईए के रूप में एक प्रोफेशनल अर्थशास्त्री ही निभा सकता है. वे बताते हैं कि सीईए का काम आसान नहीं होता. इसके लिए ऐसे स्पेशलिस्ट की जरूरत होती है, जिसे अर्थव्यवस्था के बारे में व्यापक समझ और तजुर्बा हो, ताकि वो इकॉनमी की एक बहुआयामी तस्वीर सही ढंग से पेश कर सके. अरुण कुमार के मुताबिक कई सीईए ऐसे रहे हैं, जिन्होंने आगे बढ़कर अर्थव्यवस्था के विश्लेषण को नई दिशा देने का काम किया है, लेकिन अगर इकनॉमिक सर्वे को तैयार करते समय सीईए का पद खाली रहा हो, तो इसका असर सर्वेक्षण की क्वॉलिटी पर पड़ सकता है. वे कहते हैं कि सीईए की गैर-मौजूदगी में इकनॉमिक सर्वे तैयार भले ही हो गया हो, लेकिन यह एक रुटीन सर्वेक्षण होगा, जिसमें सीईए की तरफ से जोड़ा जाने वाला वो विश्लेषण नहीं शामिल नहीं होगा, जिसकी देश को इस वक्त जरूरत है.  

कैसे तैयार होता है इकनॉमिक सर्वे?

आर्थिक सर्वेक्षण को तैयार करने की जिम्मेदारी वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ इकनॉमिक अफेयर्स (DEA) के इकनॉमिक डिविज़न की होती है. इस काम को मुख्य आर्थिक सलाहकार के सीधे निर्देशन में पूरा किया जाता है. एक तरह से सीईए ही इस रिपोर्ट का मुख्य लेखक या आर्किटेक्ट होता है.आम रिवाज़ यह है कि सीईए की तरफ से इस रिपोर्ट को अंतिम रूप दे दिए जाने के बाद इसे औपचारिक मंजूरी के लिए वित्त मंत्री के सामने पेश किया जाता है. 

इकनॉमिक सर्वे केंद्रीय बजट से एक दिन पहले बजट में होने वाली घोषणाओं की दिशा और उनका संदर्भ देश के सामने पेश करता है. इसमें देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम सेक्टर्स के प्रमुख ट्रेंड्स और पिछले एक साल के दौरान उनकी दशा-दिशा का ब्योरा पूरे आंकड़ों के साथ मौजूद होता है. इसके साथ ही आर्थिक सर्वेक्षण देश के सामने मौजूद प्रमुख आर्थिक चुनौतियों और उनसे निपटने के तरीकों का एक खाका भी पेश करता है. इस सर्वेक्षण के तहत अर्थव्यवस्था के तमाम आंकड़े सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों से जुटाकर एक साथ इस तरह पेश किए जाते हैं, जिनसे देश की आर्थिक तस्वीर साफ साफ उभरकर सबके सामने आ जाए.

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