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भारत में उच्च शिक्षा की नई दिशा: बेहतर भविष्य की तरफ बढ़ा जरूरी कदम या एक अव्यावहारिक प्रस्ताव?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उन सुधारों का खाका पेश किया गया है, जिनसे न सिर्फ प्राथमिक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में, बल्कि तकनीकी शिक्षा में भी सुधार होगा. इसके जरिए हम अपनी अगली पीढ़ी को उद्योगों की जरूरतों के हिसाब से रोजगार के लिए तैयार कर सकेंगे. लेकिन इस मकसद को हासिल करने के लिए हमें कई बातों का ध्यान रखना होगा.

June 28, 2021 8:03 PM
राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर सही ढंग से अमल किया जाए तो सभी मुद्दों पर अमल किया जाए, तो देश की शिक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा मिल सकती है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 को 34 साल बाद इस वादे के साथ पेश किया गया था कि इससे भारतीय शिक्षा प्रणाली को एक नई ऊर्जा मिलेगी, खास तौर पर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में इससे काफी सकारात्मक बदलाव आएंगे. पिछले कई बरसों के दौरान शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े तमाम लोगों, संस्थाओं और अधिकारियों ने प्राथमिक शिक्षा यानी प्राइमरी एजुकेशन के क्षेत्र में तो सुधार सुनिश्चित किया, लेकिन उच्च शिक्षा की आमतौर पर अनदेखी हुई. लेकिन अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के जरिए ऐसे सुधारों का खाका पेश किया गया है, जिससे न सिर्फ प्राथमिक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में, बल्कि तकनीकी शिक्षा में भी सुधार होगा. इसके जरिए हम अपनी अगली पीढ़ी को उद्योगों की जरूरतों के हिसाब से रोजगार के लिए तैयार कर सकेंगे.

असल में, इस अभूतपूर्व समय में भी, तकनीकी व्यवधान ने दुनिया भर में शिक्षा के रूप को एक आसानी से प्राप्त किए जाने वाले माध्यम में परिवर्तित कर दिया है, जिससे नए आनेवाले व्यक्तियों के लिए इस आवश्यक अतिरिक्त कौशल को अपनाना संभव हो गया है। यह सच है कि महामारी के दौरान इन सुधारों के अपने लाभ और हानियाँ होती हैं, लेकिन इसके लाभ हानियों से कहीं अधिक होते हैं। मानव विकास के लिए संदर्भ प्रदान करने में अपनी मौलिक भूमिका निभाने के साथ-साथ शिक्षा अब आर्थिक प्रगति का एक साधन बन गई है। आर्थिक विकास की ओर बढ़ते हुए झुकाव के साथ, अप्रचलित होने से बचने के लिए शिक्षा के उद्योग के लिए समय पर मानव संसाधन के कौशल का नवीनिकरण करने और उसे बेहतर बनाने की आवश्यकता है। यही कारण है कि एक मिश्रित मॉडल की दिशा में प्रगतिशील परिवर्तन, जहाँ उच्च शिक्षा का मौलिक उद्देश्य समान रूप से स्वीकार किया जाता है, साथ ही इसे मानव संसाधन के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के संपूर्ण विकास के लिए एक आसानी से अपनाया जा सकने वाला दृष्टिकोण बना देता है। अतः, जबकि प्रस्तावित नीतियों को अमल में लाया जाता है, अल्बर्ट आइंस्टीन की ज्ञानवर्धक बातों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने एक बार कहा था, “कॉलेज की शिक्षा का मूल्य कई तथ्यों को सीखना नहीं है बल्कि मष्तिष्क को सोचने के लिए तैयार करना होता है।”

शिक्षा के नियामक तकनीकी क्षमता और गंभीर सोच एवं मल्टीटास्किंग के द्वारा जटिल समस्याओं के समाधान जैसे तौर-तरीकों को बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि आधुनिक तकनी कों द्वारा कौशल की माँग को सही तरीके से बेहतर बनाए रखना और काम करने वाले व्यक्तियों की गति को तेज़ करना सुनिश्चित किया जा सके, जो प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ाते हैं। एक मिश्रित विधि होनी चाहिए जो समाज में मनोरंजनात्मक मूल्यों के सार को उन मूल बातों के साथ-साथ समान रूप से दर्शाती हो, जो हम वर्षों से सीखते आ रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, शिक्षकों के एक नूतन दृष्टिकोण की भी आवश्यकता होगी, जो अब नए पैमानों पर उनकी योग्यता का आँकलन करेगा; विशेष रूप से अनेक भाषाओं वाले पाठ्यक्रम के प्रारूप के साथ जिसमें छात्रों को प्रारंभिक चरणों में अंग्रेज़ी या मौजूदा समय में उपयोग की जाने वाली भाषा को अपनाना कठिन लगता है।

वास्तव में, भारत के शिक्षक भी भाषाओं के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांत को एक प्रगतिशील सुधार के रूप में शामिल करने के लिए तैयार हैं जो बात भारत को एक वैश्विक केंद्र बनाती है। मुझे बस बेंजामिन फ्रैंकलिन के शब्द याद आ रहे हैं, “शिक्षा में निवेश करने से सबसे अच्छा ब्याज़ प्राप्त होता है” और मुझे यह प्रतीत होता है कि ये सुधार एक निवेश ही हैं। ये सुधार जितने बेहतर होंगे, भविष्य के लोग उतने ही बेहतर होंगे। किसी देश के द्वारा प्रदान की जाने वाली शिक्षा, विशेष रूप से उच्च शिक्षा के अनुपात में विकास का उतार-चढ़ाव होता है। उदारचरित शिक्षा की ओर भारत का एक कदम भविष्य को सँवारने का अवसर है। छात्रों की प्रतिभा के अनुसार मानकिकृत अध्यापन कला से एक अनुकूलित अध्यापन कला तक का परिवर्तन पूरे विश्व पर एक छाप छोड़ता है और यह इस बात को दर्शाता है कि भारत की भूमि अपनी समृद्ध विरासत की संस्कृति और विरासत, साहित्य और अभिनवता से भरी हुई है। इस प्रकार, एक नई शिक्षा नीति के प्रभावी कार्यान्वयन से व्यापक तौर पर एक प्रत्ययात्मक ढाँचे के साथ समाज को परिवर्तित करने में मदद मिलेगी।

इसके अलावा, चूँकि शिक्षा का रूप बेहतर होता जा रहा है, नियमन करने वाले प्राधिकरणों का यह कर्तव्य है कि वे इन सुधारों के कारण इस उद्योग और इसके हितधारकों के बीच नकारात्मकता उत्पन्न होने से बचायें। हर संभव क्षेत्र में संभावित विकास को कार्य करने की योजना के साथ संरेखित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है एक समायोजित और संश्लेषित प्रक्रिया के माध्यम से इसे करना। उच्च और तकनीकी शिक्षा के लिए एक विशिष्ट और प्रकांड स्थान के साथ भारत के महत्व को दर्शाने वाले क्षेत्रों में शोध कार्य के द्वारा समर्थित कार्य योजना का होना और भी महत्वपूर्ण है। यह तब संभव है जब पढ़ाई के मुख्य क्षेत्रों के साथ भावनात्मक दक्षताओं, जीवन और सूचना को समझने के कौशल को शामिल करने का एक समाकलित दृष्टिकोण विश्वविद्यालयों और शिक्षा संस्थानों द्वारा अपनाया जाए। हालाँकि, अक्सर यह देखा गया है कि संस्थानों में संवेदनशील विषयों पर बोलने पर ज़ोर देने में कमी होती है, यह स्वायत्त संस्थानों और अधिकारियों के लिए छात्रों और शिक्षकों के लिए एक कोड निर्धारित करने का सही समय है ताकि वे पढ़ने के स्थान पर क्षणभंगुर और जटिल विषयों को उठाने में सहजता महसूस कर सकें।

ऊपर बताए गए सभी मुद्दों पर अमल किया जाए, तो इससे देश की शिक्षा व्यवस्था को एक नई दिशा मिल सकती है, जिससे यह पहल महज एक दूरगामी पेशकश बनकर रह जाने की बजाय वास्तव में तरक्की की नई इबारत लिख सकती है.

डॉ. निरंजन हीरानंदानी, एचएसएनसी यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष हैं.

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