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ग्लोबल स्टॉक में निवेश कर बना सकते हैं मोटा पैसा, लेकिन पहले जानें इसके फायदे और नुकसान

Global Equities: वैश्विक स्तर पर कई तरह के इनोवेशन हो रहे हैं या नई तकनीक आ रही है जो कि हमारे दैनिक जीवन पर असर डालती हैं.

Updated: Oct 23, 2020 10:56 AM
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Global Equities: वैश्विक स्तर पर देखें तो कई तरह के इनोवेशन हो रहे हैं या नई तकनीक आ रही है जो कि हमारे दैनिक जीवन पर असर डालती हैं. इन सबका निवेश के लिहाज से भी महत्व होता है. अभी की बात करें तो भारतीय शेयर बाजार में बहुत कम इनोवेटर लिस्टेड हैं. भारत भले ही 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हो, लेकिन यहां का मार्केट कैप करीब 2.1 लाख करोड़ डॉलर ही है, जबकि बाकी दुनिया का मार्केट कैप 90 लाख करोड़ डॉलर के करीब है. ऐसे में अगर आप भारत से बाहर ग्लोबल बाजारों में निवेश नहीं करते हैं, तो इसका मतलब यह है कि आप उस अवसर को नजरअंदाज कर रहे हैं जो करीब 43 गुना ज्यादा है.

क्यों ग्लोबल इक्विटी में निवेश फायदेमंद

सबसे पहले तो इस पर विचार करते हैं कि किसी को ग्लोबल इक्विटीज यानी वैश्विक शेयर बाजार में निवेश क्यों करना चाहिए. निवेश के साथ जोखिम जुड़ा होता है और इस जोखिम को खत्म नहीं किया जा सकता. लेकिन डायवर्सिफिकेशन के द्वारा कम जरूर किया जा सकता है. सभी तरह के एसेट (परिसंपत्ति) में निवेश का डायवर्सिफिकेशन करना जोखिम के प्रबंधन का मूल है.

ग्लोबल फंडों/शेयरों में निवेश से आपको रुपये में गिरावट का फायदा उठाने में भी मदद मिलती है. पिछले 35 साल में रुपया हर साल औसतन 6 फीसदी की दर से कमजोर हुआ है. अगर आप अपने बच्चों को अगले कुछ साल में विदेश में पढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं तो आपको बढ़ती फीस और रुपये की गिरावट की वजह से ज्यादा रकम चुकानी पड़ सकती है.

वैश्विक शेयर बाजारों में निवेश भारतीय निवेशकों के लिए तुलनात्मक रूप से नई बात है. यह यात्रा लगभग उसी तरह से है जैसे निवेशक इक्विटी म्यूचुअल फंडों में निवेश करता है. देश में निवेशकों का ऐसा वर्ग है, जिन्होंने कई साइकिल में निवेश किया है और एक अवधारणा के रूप में म्यूचुअल फंडों के साथ अब सहज हैं. वे अब ऐसी रणनीतियों पर बात करने लगे हैं कि इक्विटी और डेट से भी आगे किस तरह से पोर्टफोलियो में डायवर्सिफिकेशन लाया जा सके.

एक एसेट वर्ग के रूप में किस तरह से करंसी का फायदा उठाया जाए और ऐसे वैश्विक कारोबारों में कैसे हिस्सेदारी ली जाए जिनका भारतीय स्टॉक एक्सचेंज में प्रतिनिधित्व नहीं है. अब ज्यादा लोग इस बात को मानने लगे हैं कि बाजारों में उतार-चढ़ाव सिर्फ घरेलू कारणों ही नहीं ग्लोबल बाजारों में भी उतार चढ़ाव से होता है. आगे के लिए एकमात्र रास्ता यही है कि अपने पोर्टफोलियो का जितना संभव हो सके उतने एसेट वर्ग में डज्ञइवर्सिफाई किया जाए. इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निवेश का आकर्षण बढ़ रहा है.

सीधे ग्लोबल इक्विटीज में निवेश

सीधे ग्लोबल शेयरों में निवेश करने के कई फायदे हैं जैसे निवेशक अपनी समझ, सुविधा और सूझबूझ के मुताबिक कुछ चुनिंदा शेयरों के पोर्टफोलियो पर अपना ध्यान केंद्रित रख सकता है (एक शेयर से लेकर 10 शेयरों तक). उसका इसमें पूरा नियंत्रण होता है और यह एक आसान विकल्प लग रहा है. लेकिन ऐसा वही कर सकता है जो शेयर बाजार का अच्छा खासा जानकार हो. इसके अलावा, उसके पास ऐसी क्षमताएं होनी चाहिए कि वह ऐसी वैश्विक घटनाओं को पहचान सके और उन पर नजर रख सके जो उसके शेयरों पर असर डाल सकती हैं. ऐसे निवेशक के पास अनुपालन और नियामक मसलों से भी निपटने की क्षमता होनी चाहिए. उदाहरण के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) के शेड्यूल एफए में निवेशकों को अपने पास रहने वाले विदेशी एसेट का विस्तृत ब्योरा देना अनिवार्य होता है. इसी तरह, लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत प्रति व्यक्ति के सालाना 2.5 लाख डॉलर ही भेजने की सीमा तय है.

म्यूचुअल फंडों के जरिए निवेश

दूसरी तरफ, किसी म्यूचुअल फंड में निवेश करने (चाहे वह इंटरनेशनल फंड ऑफ फंड्स हो या फीडर फंड) के कई फायदे हैं, जैसे-

1. इन फंडों में निवेश को उसी तरह से देखा जाता है जैसा किसी घरेलू फंड में निवेश करना. इनके लिए कोई अतिरिक्त नियम-कायदा नहीं है, जैसा कि शेयरों में निवेश के मामले में होता है.
2. इन पर लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) लागू नहीं होता.
3. इन फंडों का प्रबंधन विशेषज्ञों के द्वारा होता है, जिनके पास शेयरों और पोर्टफोलियो की पहचान, विश्लेषण और उन पर निगरानी रखने की विशेषता, टेक्नोलॉजी और वैश्विक पहुंच होती है.
4. आमतौर पर म्यूचुअल फंडों में कई देशों और विभिन्न तरह के उद्योगों से जुड़े कई शेयर होते हैं (एक्टिव फंडों की बात करें तो यह संख्या 30 से 50 शेयरों की होती है), जिनके द्वारा भौगोलिक क्षेत्रों, सेक्टर और मुद्रा की विविधता हासिल होती है.

कुछ निगेटिव प्वॉइंट भी

हालांकि, म्यूचुअल फंडों के द्वारा निवेश के कई नुकसान भी हैं, जैसे-लागू एनएवी एक दिन बाद आता है, मुद्रा का जोखिम होता है, तीन साल से कम रखने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स लग जाता है.

निष्कर्ष

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि छोटे निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंडों के द्वारा वैश्विक शेयरों में निवेश करना, सीधे शेयरों में निवेश करने से बेहतर होता है. ज्यादा सलाहकार पहली बार इक्विटी में निवेश करने वाले निवेशकों को डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स में निवेश करने की सलाह देते हैं. इनमें उन फंडों को पहला विकल्प रखना चाहिए जो कि दुनिया भर में निवेश करते हैं. इसी तरह समझदार हाई नेटवर्थ वाले यानी बड़े निवेशक, जिनके पास पर्याप्त संसाधन हैं और जो सभी तरह की रिपोर्टिंग और रिसर्च को हासिल कर सकते हैं, वे रुपये के प्रभुत्व वाले ग्लोबल फंडों के साथ ही सीधे शेयरों में निवेश कर सकते हैं या अन्य इक्विटी विकल्पों में जो LRS के मुताबिक उनके लिए उपलब्ध हो.

(लेखक: श्रीनिवास राव रावुरी, CIO-इक्विटीज, PGIM इंडिया म्यूचुअल फंड)

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