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सेबी ने FPI के लिए आसान किए KYC नियम, अब बाजार के बाहर भी खरीद सकेंगे सिक्योरिटीज

सेबी ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के संबंध में अपने नियमनों में बदलाव किया है.

August 21, 2019 7:37 PM
Sebi eases requirements for FPIs and kyc norms amomg other changesबाजार नियामक ने बुधवार को नए नियमों की घोषणा की.

SEBI: सेबी ने विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) के लिए नियामकीय व्यवस्था को आसान करते हुए बुधवार को उनके लिए केवाईसी (ग्राहक को जानो) नियमों को सरल बनाया. साथ ही बाजार के बाहर सिक्योरिटीज के लेनदेन की अनुमति भी दी है. सेबी के बोर्ड की बैठक के दौरान इन प्रस्तावों को मंजूरी दी गई. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया को सरल बनाने और उसमें तेजी लाने के मद्देनजर ये कदम उठाए गए हैं. नई व्यवस्था के तहत , विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को तीन के बजाए दो श्रेणियों में बांटा जाएगा.

बाजार नियामक ने बोर्ड की बैठक के बाद जारी विज्ञप्ति में कहा, “केवाईसी के लिए जरूरी दस्तावेजी कामकाज को आसान बनाया गया है.” भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर एच.आर.खान की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिश के आधार पर एफपीआई नियमों को नए सिरे से तैयार किया गया है.

IFSC यूनिट्स को FPI नियमों को मानना होगा

विदेश में जारी डेरिवेटिव उत्पाद के सब्सक्रिप्शन और जारी करने की आवश्यकताओं को भी तर्कसंगत बनाया गया है. म्यूचुअल फंड की ओर से पेश विदेशी फंड्स को एफपीआई के रूप में रजिस्ट्रेशन करने के बाद देश में निवेश करने की अनुमति होगी. इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (आईएफएससी) में स्थापित इकाइयों को एफपीआई के मानदंडों को ही मानना होगा. सेबी ने विज्ञप्ति में कहा , “एफपीआई को घरेलू या विदेशी निवेशकों को बाजार के बाहर सिक्योरिटीज के लेनदेन (ट्रांसफर) की अनुमति होगी. ये सिक्योरिटी अनलिस्टेड , निलंबित , आसानी से नकदी में नहीं परिर्वितत होने वाली होंगी. ”

इसके अलावा , बहु निवेश प्रबंधक (एमआईएम) के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को भी आसान बनाया है. ऐसे केंद्रीय बैंक जो अंतरराष्ट्रीय सेटलमेंट बैंक के सदस्य नहीं है विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक के रूप में रजिस्ट्रेशन करने के लिए पात्र होंगे. इसका उद्देश्य बाजार में ज्यादा से ज्यादा विदेशी पूंजी को आर्किषत करना है.

कंपनियों को रेटिंग एजेंसियों को देनी होगी डिफॉल्ट की पूरी जानकारी

सेबी के नए नियम के अनुसार अब कंपनियों को कर्ज चूक या डिफॉल्ट से संबंधित पूरी जानकारी रेटिंग एजेंसियों को मुहैया करानी अनिवार्य होगी. यह निर्णय ऐसे स्थिति में किया गया है जबकि बैंक अपने ग्राहकों की गोपनीयता का हवाला देकर कंपनियों की ओर से ऋण की किस्ते चुकाने में देरी या चूक होने की जानकारी देने से कतराते हैं. बड़ी कंपनियों के ऋण भुगतान में चूक के काफी मामले सामने आए हैं. इसके अलावा इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल र्सिवसेज (IL&FS) का मामला भी सामने आया है. इससे क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भी सवालों के घेरे में आ गई हैं. रेटिंग एजेंसियों द्वारा जिन प्रतिभूतियों या इकाइयों की रेटिंग दी गई है, उनको लेकर संभावित जोखिमों का वे पता लगाने में विफल रही हैं. हालांकि, रेटिंग एजेंसियों ने इसका पूरा दोष कंपनियों पर डालते हुए कहा है कि उन्हें बैंक के ऋण भुगतान में विलंब या चूक से संबंधित पूरी जानकारी इकाइयों द्वारा उपलब्ध नहीं कराई जाती है.

इस नियामकीय खामी को दूर करने के लिए सेबी ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के संबंध में अपने नियमनों में बदलाव किया है. ऐसे में किसी भी सूचीबद्ध या गैर सूचीबद्ध इकाई को रेटिंग हासिल करने से पहले रेटिंग एजेंसियों को अपने मौजूदा और भविष्य के कर्ज तथा ऋण भुगतान में विलंब या चूक की पूरी जानकारी देनी होगी. सेबी के निदेशक मंडल की यहां हुई बैठक में इस बारे में प्रस्ताव को मंजूरी दी गई. नियामक का कहना है कि इससे रेटिंग एजेंसियों को संभावित डिफॉल्ट के बारे में समय पर जानकारी मिल सकेगी.

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