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हर साल 5% की दर से बढ़ रही पाम ऑयल की खपत, निवेशकों के पास कमाई का मौका

भारत में एडिबल आयात का एक बड़ा हिस्सा करीब 62 फीसदी पाम ऑयल का है.

Updated: Nov 02, 2020 8:05 AM
palm oil consumption increasing 5 percent annualy investers may benefittedभारत में पाम ऑयल 60 फीसदी इस्तेमाल अनब्रांडेड कुकिंग ऑयल के रूप में होता है.

भारत में एडिबल ऑयल (खाने वाले तेल) की खपत हर साल करीब 5 फीसदी की दर से बढ़ रही है. मांग और आपूर्ति में बड़े गैप और भारतीय किसानों का दूसरी फसल की तरफ शिफ्ट होने की वजह से एडिबल ऑयल की शॉर्टेज होती जा रही है. ऐसे में एडिबल ऑयल की कमी को पूरा करने के लिए अब आयात पर निर्भरता बढ़ी है. इसमें भी सबसे अधिक पाम ऑयल सबसे अधिक आयात होता है. वहीं लेबर शॉर्टेज, खराब मौसम की वजह से पाम आयल के निर्यातक देशों में प्रोडक्शन कम हुआ है. ऐसे में फेस्टिव सीजन के दौरान मांग के मुताबिक आपूर्ति न होने से पाम आयल की कीमतें बढ़ रही हैं. एक्सपर्ट का कहना है कि आगे इसमें और तेजी आएगी.

900 रु तक जा सकता है भाव

क्रूड पाम ऑयल कमोडिटी एक्सचेंज NCDEX पर इस समय 820 रु के भाव पर है. कुछ महीने पहले की बात करें तो 27 अगस्त को यह एनसीडेक्स पर 760 रु के भाव पर था. यानी इसने महज दो महीने में करीब 7 फीसदी का रिटर्न दिया है. कोरोना महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन के हटने के बाद से अब इसकी मांग तेजी से बढ़ी है. ऐसे में निवेशकों के लिए आगे भी मुनाफे का बेहतर मौका दिख रहा है. केडिया कमोडिटी के निदेशक अजय केडिया के मुताबिक इस साल के अंत तक यह 900 रु का भी लेवल दिखा सकता है.

लेबर शॉर्टेज के कारण गिर रहा उत्पादन

एंजेल ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट अनुज गुप्ता के मुताबिक कोरोना महामारी और खराब मौसम के कारण इसकी आपूर्ति पर बुरा प्रभाव डाला है. पाम ऑयल का सबसे अधिक उत्पादन इंडोनेशिया और मलेशिया में होता है. कोरोना महामारी के कारण मलेशिया में लेबर शॉर्टेज हो रही है जिसके कारण उत्पादन प्रभावित हुआ है. लेबर शॉर्टेज की एक वजह यह है कि विदेशी कामगारों का रिन्यूअल नहीं हो रहा है. मलेशियन पाम ऑयल का उत्पादन आगे भी और गिरने की आशंका दिख रही है. इससे पहले ही लॉकडाउन के कारण इस बार 25 फीसदी उत्पादन कम हुआ है.

मौसम ने बिगाड़े हालात

अजय केडिया का कहना है कि इस बार मलेशियन पाम ऑयल का उत्पादन कम हुआ है और अब सबह क्षेत्र (मलेशिया) में हर महीने करीब 50 फीसदी उत्पादन कम हो रहा है. सबह के प्लांटेशन ओनर्स के मुताबिक पाम ऑयल का उत्पादन कंडीशनल मूवमेंट कंट्रोल ऑर्डर के तहत हर महीने 3 लाख टन तक का उत्पादन कम हो सकता है. सबह में सालाना 50 लाख टन पाम ऑयल का प्रोडक्शन होता है और यहां मलेशिया के कुल आउटपुट का एक-चौथाई पाम ऑयल पैदा होता है.  इंडोनेशिया और मलेशिया में ला निना के कारण इसका आउटपुट प्रभावित हुआ है और इसका प्रभाव इस साल के अंत तक रहने की आशंका है.

लॉकडाउन के कारण घटी खपत

लॉकडाउन के कारण देश में पाम ऑयल की खपत 40 फीसदी तक गिर गई थी और जिसके कारण इसका आयात 25 फीसदी कम हो गया था जो पिछले एक दशक में सबसे कम था. 2015-16 तक हर साल इसके आयात में 12 फीसदी की बढ़ोतरी होती थी. भारत अपनी जरूरत का 96 फीसदी पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात करता है. जब कभी कुकिंग ऑयल के भाव में तेजी आती है तो केंद्र सरकार RBD (रिफाइंड, ब्लीच्ड और डीऑडोराइज्ड) पाम ऑयल खरीद के जरिए निम्न और मध्यम वर्ग की कुकिंग ऑयल की जरूरत पूरी करती है.

जुलाई के बाद से गिर रहा आयात

भारत पाम ऑयल के अलावा सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों और अन्य प्रकार के सॉफ्ट ऑयल आयात होते हैं. सितंबर में कुल आयातित तेलों में सबसे अधिक हिस्सा पाम ऑयल का करीब 62 फीसदी रहा. सितंबर में 643994 टन पाम ऑयल का आयात हुआ जो उसके पिछले महीने अगस्त की तुलना में कम है. अगस्त में 734351 टन पाम ऑयल आयात हुआ था. पाम ऑयल को आरबीडी पामोलिन, सीपीओ, क्रूड ओलेइन और सीपीकेओ के रूप में आयात किया जाता है. आरबीडी पामोलिन को 8 जनवरी 2020 को रिस्ट्रिक्टेड इंपोर्ट लिस्ट में रखा गया था और तभी से इसके आयात में गिरावट आई थी. हालांकि जुलाई में एकाएक इसके आयात में बढ़ोतरी हुई लेकिन इसके बाद फिर गिरावट हुई. ये आंकड़े एसईए के हैं.

60% इस्तेमाल अनब्रांडेड कुकिंग ऑयल के रूप में

पाम ऑयल का इस्तेमाल भारत में कई प्रकार से होता है. भारत में 60 फीसदी पाम ऑयल का इस्तेमाल अनब्रांडेड कुकिंग ऑयल के तौर पर होता है, 30 फीसदी ब्रांडेड कुकिंग ऑयल और फूड्स में होता है. इसके अलावा शेष 10 फीसदी पाम ऑयल का इस्तेमाल औद्योगिक तौर पर होता है. भारत दुनिया में सबसे बडा़ पाम ऑयल आयातक है और यहां 20 फीसदी आयात होता है. भारत में हर साल करीब 30-32 लाख मीट्रिक टन पाम आयल की खपत है. पाम ऑयल की खपत हर साल बढ़ती जा रही है क्योंकि पैकेज्ड फूड इंड्स्ट्री इसे प्रिफर करते हैं और खुदरा खरीदारी में अन्य एडिबल ऑयल की तुलना में इसकी कीमत कम होने के कारण इसकी बिक्री अधिक होती है.

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