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अब म्यूचुअल फंड खरीदेंगे तो लगेगी स्टांप ड्यूटी, समझें आपके निवेश पर क्या होगा असर

अगर आप 1 जुलाई से कोई म्यूचुअल फंड खरीदते हैं तो आपको उसपर स्टांप ड्यूटी देनी होगी.

Published: July 1, 2020 9:58 AM
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अगर आप 1 जुलाई से कोई म्यूचुअल फंड खरीदते हैं तो आपको उसपर स्टांप ड्यूटी देनी होगी. अगर सिस्टमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान (SIP) और सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान (STP) खरीदते हैं तो भी आपको स्टांप ड्यूटी चुकानी पड़ेगी. यह ड्यूटी हर तरह के म्यूचुअल फंड (ETFs को छोड़कर) पर देनी होगी. चाहे आप डेट म्यूचुअल फंड खरीदे या इक्विटी म्यूचुअल फंड. इस स्टांप ड्यूटी का सबसे ज्यादा असर डेट फंड्स पर देखने को मिलेगा जो आम तौर पर छोटी अवधि के लिए होती है.

म्यूचुअल फंड की खरीद पर 0.005 फीसदी की दर से स्टांप ड्यूटी लगेगी. इसके अलावा म्यूचुअल फंड की यूनिट्स को डीमैट अकाउंट से ट्रांसफर करने पर 0.015 फीसदी की स्टांप ड्यूटी लगेगी. यानी इस पर यह 3 गुना हो जाएगा. स्टांप ड्यूटी के लगने से 90 दिन और इससे कम अवधि वाले होल्डिंग पर ज्यादा असर पड़ेगा. हालांकि म्यूचुअल फंड की निकासी पर निवेशकों को स्टांप ड्यूटी नहीं देनी होगी.

एंट्री लोड की तरह

स्टांप ड्यूटी म्यूचुअल फंड की खरीद पर लगेगी ना कि निकासी पर इसलिए इस राशि को एंट्री लोड की तरह भी देखा जा रहा है. बता दें कि साल 2009 में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड ने म्यूचुअल फंड पर से एंट्री लोड का हटा दिया था.

कैसे होगा असर

जानकारों का मानना है कि इससे लांग टर्म निवेशकों पर असर बहुत कम होगा. लेकिन 30 दिन और इससे कम वाली छोटी अवधि के निवेशकों पर स्टांप ड्यूटी लगने का ज्यादा असर पड़ेगा क्योंकि स्टांप ड्यूटी वन टाइम जार्च के तौर पर लगाई जाती है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि मान लीजिए आपने 1 लाख रुपये डेट फंड में डाले, जिस पर 5 फीसदी सालाना रिटर्न मिल रहा है. इसका मतलब यह हुआ कि आपको 1 साल के बाद उस पर 5,000 रुपये रिटर्न मिलेगा और इस पर महज 5 रुपये की ड्यूटी देनी होगी. लेकिन अगर यही निवेश 1 महीने के लिए किया तो रिटर्न 415 रुपये के आस पास होगा और इस पर 5 रुपये के हिसाब से स्टांप ड्यूटी लगेगी.

डेट फंड पर असर ज्यादा

साफ है कि निवेश की अवधि जितनी लंबी होगी, उस पर स्टांप ड्यूटी का असर उतना ही कम होगा. डेट फंडों में शॉर्ट ड्यूरेशन के भी कई विकल्प हैं, जिसमें 1 माह से 3 माह तक के लिए निवेश करते हैं. ऐसे में डेट कटेगिरी में निवेश पर असका असर ज्यादा होगा. जबकि इक्विटी सेग्मेंट में असर कम होगा.

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