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महंगाई से मिलेगी राहत! आगे खाद्य तेलों के भाव स्थिर रहने का अनुमान, ये हैं वजह

पिछले कुछ समय से खाद्य तेलों के बढ़ते भाव से आम लोगों की जेब पर भार बढ़ा है. हालांकि राहत की बात यह है कि अब आगे खाद्य तेलों में महंगाई की आशंका कम है.

Updated: Jan 13, 2021 8:06 AM
no more inflation in oilseeds consumer get releif for mustard oil groundnut oil palm oil soya oilइस बार सरसों और मूंगफली के उत्पादन में बढ़ोतरी का अनुमान है जिसके कारण तेल के भाव में अधिक तेजी देखने को नहीं मिलेगा.

पिछले कुछ समय से खाद्य तेलों के बढ़ते भाव से आम लोगों की जेब पर भार बढ़ा है. हालांकि राहत की बात यह है कि अब आगे खाद्य तेलों में महंगाई की आशंका कम है. एक्सपर्ट का कहना है कि इस बार सरसों और मूंगफली के उत्पादन में बढ़ोतरी का अनुमान है जिसके कारण तेल के भाव में अधिक तेजी देखने को नहीं मिलेगी. वहीं आगे इनकी कीमतों में कुछ राहत भी मिल सकती है. बता दें कि दिल्ली में सरसों के तेल (पैकेज्ड) प्रति किलो के भाव 147 रुपये है, जबकि एक हफ्ते पहले यह 145 रुपये था. मूंगफली, मस्टर्ड, सोया, सन फ्लावर और पॉम ऑयल के भाव में भी तेजी रही है.

मलेशिया और इंडोनेशिया की नीतियों से चढ़ा पॉम ऑयल

  • पॉम ऑयल कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब सभी कुकिंग ऑयल के भाव में तेजी आती है तो केंद्र सरकार RBD (रिफाइंड, ब्लीच्ड और डीऑडोराइज्ड) पाम ऑयल खरीद के जरिए निम्न और मध्यम वर्ग की कुकिंग ऑयल की जरूरत पूरी करती है.
  • दुनिया में सबसे अधिक पॉम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया में उत्पादित होता है. भारत अपनी जरूरत का 96 फीसदी पॉम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आया करता है. हालांकि अब इंडोनेशिया ने 30 फीसदी पॉम ऑयल का इस्तेमाल बॉयो डीजल बनाने के लिए अनिवार्य कर दिया है. मलेशिया ने भी इसी तरह का फैसला लेते हुए 20 फीसदी पॉम ऑयल का इस्तेमाल बॉयो डीजल के लिए अनिवार्य किया है. इस वजह से इसके भाव में तेजी देखने को मिल रही है. सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के एग्जेक्यूटिव डायरेक्टर बीवी मेहता के मुताबिक इससे पॉम ऑयल के निर्यात पर प्रभाव पड़ेगा.
  • मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक पॉम ऑयल के भाव कोरोना महामारी के बाद से बढ़े हैं. एक साल पहले 12 मार्च को प्रति किलो पॉम ऑयल (पैकेज्ड) के भाव 100 रुपये प्रति किग्रा था. एक हफ्ते में पॉम ऑयल के भाव तेजी से बढ़े और 5 जनवरी 2021 को यह 117 रुपये के भाव पर था जो बढ़कर 12 जनवरी को 130 रुपये प्रति किग्रा पर पहुंच गया.
  • कोरोना महामारी के कारण लेबर शॉर्टेज की समस्या आई और इसकी वजह से पॉम ऑयल के उत्पादन में गिरावट आई है. यूनाइटेड स्टेट डिपॉर्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर (यूएसडीए) वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक मार्केटिंग इयर 2020-21 के लिए क्रूड पॉम ऑयल का उत्पादन 1 लाख मीट्रिक टन गिरकर 1.96 करोड़ मीट्रिक टन रह सकता है.
  • भारत में 60 फीसदी पाम ऑयल का इस्तेमाल अनब्रांडेड कुकिंग ऑयल के तौर पर होता है, 30 फीसदी ब्रांडेड कुकिंग ऑयल और फूड्स में होता है. इसके अलावा शेष 10 फीसदी पाम ऑयल का इस्तेमाल औद्योगिक तौर पर होता है. भारत दुनिया में सबसे बडा़ पाम ऑयल आयातक है और यहां 20 फीसदी आयात होता है. भारत में हर साल करीब 30-32 लाख मीट्रिक टन पाम आयल की खपत है.

खपत बढ़ने पर महंगा हो रहा मूंगफली का तेल

  • मूंगफली की बात करें तो सर्दियों में इसकी खपत बहुत अधिक हो जाती है. इसकी वजह से इसके भाव में इस समय तेजी का माहौल बना हुआ है.
  • मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक मूंगफली के तेल (पैकेज्ड) के भाव कोरोना महामारी के दौरान बढ़े हैं. पिछले साल 12 मार्च 2020 को इसके भाव 162 रुपये प्रति किलो थे जो 12 जनवरी 2021 को बढ़तर 191 रुपये प्रति किलो हो चुके हैं.
  • उत्पादन की बात करें तो मूंगफली की आवक में बढ़ोतरी होगी. मिनिस्ट्री ऑफ एग्रीकल्चर एंड फार्मर्स वेलफेयर की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक खरीफ 2019-20 के चौथे आकलन के मुताबिक खरीफ मूंगफली 83.67 लाख टन और रबी मूंगफली 13.4 लाख टन उत्पादित हुआ था. 2020-21 के पहले एडवांस एस्टीमेट के मुताबिक इस बार 93.35 लाख टन खरीफ मूंगफली के उत्पादन का अनुमान है.
  • मूंगफली की आवक शुरू हो गई है. ऐसे में इसके भाव लगभग स्थिर रहेंगे.

ब्लेंडिंग की मंजूरी ने स्थिर किए मस्टर्ड ऑयल के भाव

  • आमतौर पर उत्तर भारत के अधिकतर घरों में तेल के नाम पर सरसों के तेल का उपयोग होता है. खपत बढ़ने के कारण सरसों के तेल में तेजी आई थी. पिछले साल 2020 में कोरोना महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन को जब हटाया गया, सरसों के तेल की खपत बढ़ी है. इसका एंटीबॉयोटिक के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है जिसके कारण पिछले कुछ समय से भाव बढ़े थे.
  • पिछले साल सितंबर में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) ने सरसों तेल में किसी भी अन्य तेल के ब्लेंडिंग को रोकने का आदेश दिया था. इसकी वजह से इसके भाव में तेजी आने लगी थी. हालांकि दिसंबर में एफएसएसएआई ने अपने फैसले को वापस ले लिया.
  • मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक सरसों के तेल (पैकेज्ड) के भाव 12 जनवरी 2021 को 147 रुपये प्रति किग्रा था. एक महीने पहले 12 दिसंबर 2020 को इसका भाव 154 रुपये प्रति किग्रा था. कोरोना महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन से पहले 12 मार्च 2020 को इसके भाव 124 रुपये प्रति किग्रा थे.
  • सरसों का उत्पादन इस बार बेहतर होने का अनुमान है. पिछले साल 2019-20 में 91.16 लाख टन सरसों का उत्पादन हुआ था जबकि इस बार 2020-21 में 100 लाख टन से अधिक सरसों के उत्पादन होने का अनुमान है.
    सरसों के तेल के भाव में अब अधिक तेजी के आसार नहीं है. अगले महीने फरवरी से इसकी क्रॉप आनी शुरू हो जाएगी. हालांकि न तो इसके भाव में अधिक गिरावट की उम्मीद की जा सकती है और न ही अधिक उछाल की.

बर्ड फ्लू के कारण सोया में आ सकती है गिरावट

  • ब्राजील दुनिया में सबसे बड़ा सोया उत्पादक देश है. उसके बाद इसका सबसे अधिक उत्पादन अमेरिका में होता है. केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया के मुताबिक इस बार दक्षिणी अमेरिका में सूखे मौसम के कारण इसकी फसल प्रभावित हुई है जिसके कारण आउटपुट में कमी आ सकती है.
  • यूएसडीए ने भारत में सोया के उत्पादन का अनुमान संशोधित किया है और संशोधित आंकड़ों के मुताबिक भारत में सोया उत्पादन में गिरावट आ सकती है. यूएसडीए के मुताबिक भारत में 90लाख टन सोया उत्पादित होगा जो उसके पहले के अनुमान से करीब 20 फीसदी कम है. इससे पहले यूएसडीए ने अनुमान लगाया था कि भारत में 114 लाख टन सोया उत्पादित होगा.
  • मिनिस्ट्री ऑफ कंज्यूमर अफेयर्स, फूड एंड पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक सोया तेल (पैकेज्ड) के भाव 12 जनवरी को 134 रुपये प्रति किलो था. एक महीने पहले 12 दिसंबर 2020 को इसके भाव 131 रुपये प्रति किलो और 12 मार्च 2020 को इसके भाव 114 रुपये प्रति किलो था.
  • सोया तेल के भाव में पिछले कुछ समय में तेजी रही है लेकिन अब अधिक बढ़त की उम्मीद कम ही है. एंजेल ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट (कमोडिटी एंड रिसर्च) अनुज गुप्ता के मुताबिक इसका सबसे बड़ा कारण बर्ड फ्लू है. बर्ड फ्लू के कारण पोल्ट्री उद्योग से सोयाबीन की मांग कम हो सकती है.

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