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मोदी 2.0: 3 माह में 80% शेयर लाल निशान में, BSE 500 के 22 शेयरों में 40 से 70% तक गिरावट

मोदी सरकार के दूसरे टर्म में शेयर बाजार का क्या है हाल

September 11, 2019 4:19 PM
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मोदी सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद से शेयर बाजार में शानदार रैली देखी गई. इस दौरान शेयर बाजार ने रिकॉर्ड हाई बनाया. लेकिन बजट के बाद से पूरा सेंटीमेंट ही बदलता चला गया. सेंसेक्स अपने रिकॉर्ड हाई से करीब 2900 अंक टूट गया तो निफ्टी में भी 1000 अंकों की गिरावट रही. हालत यह है कि मोदी सरकार के पहले 100 दिनों में ब्रॉडर मार्केट में 80 फीसदी से ज्यादा शेयर लाल निशान में चले गए. पिछले 3 महीने के आंकड़ों की बात करें तो BSE 500 पर कम से कम 22 शेयर ऐसे हैं, जिनमें 40 से 70 फीसदी तक गिरावट रही. हालांकि पिछले दिनों सरकार की ओर से मार्केट के सेंटीमेंट सुधारने के लिए कुछ उपाय भी किए गए हैं.

BSE 500 के 402 शेयर लाल निशान में

पिछले 3 महीनों की बात करें तो BSE 500 के 402 शेयर यानी 80 फीसदी के करीब शेयरों ने निगेटिव रिटर्न दिया है. इस दौरान 22 शेयरों में 40 से 70 फीसदी गिरावट रही. सबसे ज्यादा गिरावट वाले शेयरों में कॉफी डे इंटरप्राइजेस, जेट एयरवेज, रिलायंस कैपिटल, सीजी पावर एंड इंडस्ट्रियल सॉल्यूशन, वोडाफोन आइडिया, मैग्मा फिनकॉर्प, Inox विंडख्, आरकॉम, पीसी ज्वेलर्स, तेजस नेटवर्क, इंडियाबुल्स, सद्भाव इंजीनियरिंग, लक्ष्मी विलास बैंक, जैन इरीगेशन, आरबीएल बैंक और दीवान हाउसिंग शामिल हैं.

इस दौरान इन शेयरों में रही तेजी

हालांकि इस दौरान HDFC एसेट मैनेजमेंट कंपनी, अडानी पावर, रिलायंस निप्पॉन, डॉ लाल पैथलैब, एवेन्यू सुपरमार्ट, रिलैक्सो फुटवियर और गुजरात स्टेट पेट्रोनेट में तेजी भी आई है.

3 महीनों में गिरावट की बड़ी वजहें

  • जीडीपी में सुस्ती की आशंका से घरेलू निवेशक भी बाजार से दूर रहे. जून तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट 5 फीसदी पर आ गई जो 6 साल का लो है.
  • बजट में सुपररिच पर सरचार्ज लगाकर सरकार ने विदेशी निवेशकों का सेंटीमेंट बिगाड़ दिया. बजट के बाद से विदेशी निवेशकों ने बाजार से रिकॉर्ड बिकवाली की. जुलाई और अगस्त में विदेशी ​निवेशकों ने बाजार से 29 हजार करोड़ निकाल लिए. हालांकि बाद में इसे हटा दिया गया.
  • बजट से बाजार को लिकिव्डिटी बढ़ाने की उम्मीदें थीं, लेकिन ऐसा कोई क्लीयर रोडमैप नहीं पेश किया कि किस तरह से लिक्विडिटी आएगी.
  • एनबीएफसी में कैश क्राइसिस की समस्या और बढ़ती गई.
  • जून और मिड जुलाई तक मॉनसून की बेरुखी से भी निवेशकों का रुख सतर्क रहा.
  • कंपनियों द्वारा पेमेंट में डिफॉल्ट के नए मामले भी सामने आए. बाजार में लिक्विडिट्री क्राइसिस की स्थिति बनी.
  • कंजम्पशन स्टोरी बेहद सुस्त दौर में है. मांग में कमी से खासतौर से आटोमोबाइल इंडस्ट्री की हालत खराब हो चुकी है.

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