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जानिए क्यों एक बंपर मानसून भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरुरी है

IMD का कहना है कि दक्षिणपश्चिम मानसून तमिलनाडु, दक्षिणपश्चिम, पश्चिम-मध्य, पूर्व-मध्य और बंगाल की पूर्वोत्तर खाड़ी, त्रिपुरा के अधिकांश हिस्सों, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम के बाकी हिस्सों में आगे बढ़ गया है और असम और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी.

June 4, 2018 6:02 PM
96 से 104 फीसदी तक होने वाली वर्षा को सामान्य मानसून कहा जाता है. (Reuters)

भारत में वर्षा ऋतु का आगमन जून-जुलाई महीने से शुरू होता है जब दक्षिण-पश्चिम मानसून की हवाएं बहनी शुरु हो जाती है. हिन्दी महीनों के अनुसार यह आषाढ़ और श्रावण मास में आता है. यह मौसम अत्यंत ही महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह न केवल हमें गर्मी से निजात दिलाता है बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था को दुरुस्त तरीके से चलाने में भी सहायक होता है. भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने अनुमान लगाया है कि इस वर्ष मानसून बारिश 2018 में अपने दीर्घकालिक औसत का 97 फीसदी रहेगा. 96 से 104 फीसदी तक होने वाली वर्षा को सामान्य मानसून कहा जाता है.

IMD का कहना है कि दक्षिणपश्चिम मानसून तमिलनाडु, दक्षिणपश्चिम, पश्चिम-मध्य, पूर्व-मध्य और बंगाल की पूर्वोत्तर खाड़ी, त्रिपुरा के अधिकांश हिस्सों, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम के बाकी हिस्सों में आगे बढ़ गया है और असम और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी. दक्षिणपश्चिम मानसून की मदद से भारत के 50 फीसदी से अधिक खेतों में सिंचाई करी जाती है.

कृषि विकास के लिए मानसून का महत्व

मानसून के समय में होने वाली बारिश देश में सालाना होने वाली बारिश का 70 फीसदी होती है. यह बारिश कुछ प्रमुख खरीफ या सोयाबीन जैसे चावल, दालें और तिलहन जैसे ग्रीष्मकालीन फसलों की पैदावार को भी प्रभावित करती है. जून में मानसून बारिश के आगमन के साथ किसान इन फसलों का रोपण शुरू कर देते हैं.

केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय का कहना है, “भारत में लगभग 1170 मिमी की औसत वर्षा होती है जो बर्फबारी सहित 4000 बीसीएम (अरब घन मीटर) की वार्षिक वर्षा के अनुरूप होती है. साल में जून से सितम्बर के महीने के दौरान देश में लगभग 75 फीसदी बारिश हो जाती है.

भारत के कुल खाद्य उत्पादन का लगभग 50 फीसदी ग्रीष्मकालीन फसलों के रूप में आता है. अगर मानसून में देरी होती है तो खाद्य आपूर्ति में कमी आ सकती जिससे देश में महंगाई बढ़ सकती है. अगर सामान्य से कम भी मानसून देखा जाता है तो देश में सुखाड़ के आसार बढ़ जाते हैं जिसे भारत ने नरेंद्र मोदी सरकार के शासन के पहले दो वर्षों के दौरान देखा था. अनुमान के अनुसार, कृषि क्षेत्र, 2 ट्रिलियन डॉलर भारतीय अर्थव्यवस्था में सिर्फ 15 फीसदी हिस्सेदारी रखता है जबकि यह क्षेत्र देश की आधी आबादी को रोजगार देता है.

मांग पर प्रभाव

अच्छे मानसून से कृषि उत्पादन बढ़ता है, उपभोक्ता वस्तुओं के साथ-साथ ग्रामीण लोगों की आय में भी बढ़ोतरी देखी जाती है. इससे एक मजबूत आर्थिक दृष्टिकोण बनता है जो बदले में इक्विटी मार्किट को बढ़ाने में भी अति अवश्य होता है, खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में माल बेचने वाली कंपनियों की. हालांकि, खराब मानसून में एफएमसीजी उत्पादों, ट्रैक्टर, दोपहिया, ग्रामीण आवास की मांग कमजोर पड़ती है. साथ ही, यह सरकार को भोजन के आयात पर खर्च करने के साथ-साथ कृषि ऋण छूट जैसे उपाय भी करने के लिए मजबूर करता है.

भारत में मानसून की बारिश जलाशयों और भूजल को भी भर देती है जो सिंचाई में सुधार करने में मदद करती है और जल विद्युत उत्पादन को भी बढ़ावा देती है. इसके अलावा, एक अच्छा मॉनसून सब्सिडी वाले डीजल की मांग को कम कर देता है जिसकी मदद से जमीन, तालाबों या नदियों से पानी पंप किया जाता है जो कि अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद होता है.

मुद्रास्फीति पर मानसून का प्रभाव और आरबीआई की नीति

एक अच्छा मॉनसून बम्पर फार्म आउटपुट देता है जो खाद्य कीमतों को नियंत्रण में रखता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि खाद्य पदार्थ देश के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का 50 फीसदी है, जिसकी निगरानी आरबीआई द्वारा की जाती है. सूखे के दौरान, सरकार किसानों के प्रोत्साहन के लिए सब्सिडी के माध्यम से किसानों का समर्थन करती है जिससे राजकोषीय घाटे में वृद्धि होती है. अच्छा मानसून सरकारी खर्च को भी नियमित रखता है.

ख़राब मानसून भारत की अर्थव्यवस्था और विकास पर बुरा प्रभाव द्दाल सकता है. अतीत में डेटा विश्लेषण द्वारा वर्षा और कृषि जीडीपी के बीच एक मजबूत सहसंबंध स्थापित किया गया है.

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