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जून तिमाही में सरकारी तेल कंपनियों को 18480 करोड़ का नुकसान, तेल के स्थिर भाव के चलते घाटे का बना रिकॉर्ड

पेट्रोल-डीजल के भाव नहीं बढ़ाने के चलते तीन सरकारी तेल कंपनियों को अप्रैल-जून 2022 में अब तक की किसी तिमाही में रिकॉर्ड घाटा हुआ है.

जून तिमाही में सरकारी तेल कंपनियों को 18480 करोड़ का नुकसान, तेल के स्थिर भाव के चलते घाटे का बना रिकॉर्ड

पिछले कुछ समय से तेल के खुदरा भाव स्थिर हैं. इसके चलते सरकारी तेल कंपनियों को घाटा हो रहा है. शेयर बाजारों को दी गई जानकारी के मुताबिक सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोलियम कंपनियों को चालू वित्त वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही में लागत मूल्य बढ़ने के बावजूद पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखने की वजह से 18,480 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है. यह किसी भी तिमाही में अब तक का रिकॉर्ड घाटा है. इंडियन ऑयल (Indian Oil), हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम ने रेगुलेटरी फाइलिंग में यह जानकारी दी है.

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मार्केटिंग मार्जिन में गिरावट के चलते नुकसान

तीनों सरकारी तेल कंपनियों ने फाइलिंग में जानकारी दी है कि अप्रैल-जून तिमाही में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ाने की वजह से उनका घाटा काफी बढ़ गया. ऐसा उनके मार्केट मार्जिन में गिरावट आने के कारण हुआ. पेट्रोल-डीजल के अलावा घरेलू एलपीजी के मार्केट मार्जिन में कमी आने से इन पेट्रोलियम कंपनियों को बीती तिमाही में हुआ तगड़ा रिफाइनिंग मार्जिन भी घाटे में जाने से नहीं बचा पाया.

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किसी तिमाही में अब तक का रिकॉर्ड घाटा

इंडियन ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम को लागत के अनुरूप पेट्रोल और डीजल की कीमतों में प्रतिदिन बदलाव करने का अधिकार मिला हुआ है लेकिन बढ़ती खुदरा मुद्रास्फीति के दबाव में चार महीने से इनके दाम नहीं बढ़ाए गए हैं. हालांकि इस दौरान अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें बढ़ने से इन कंपनियों की लागत भी बढ़ गई. इन कंपनियों ने रसोई गैस की एलपीजी दरों को भी लागत के अनुरूप नहीं बदला है. इसके चलते इंडियन ऑयल को अप्रैल-जून तिमाही में 1,995.3 करोड़ रुपये, हिंदुस्तान पेट्रोलियम को 10,196.94 करोड़ रुपये और भारत पेट्रोलियम को 6,290.8 करोड़ रुपये का घाटा हुआ.

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इस तरह इन तीनों सरकारी तेल कंपनियों को एक तिमाही में कुल 18,480.27 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है जो किसी भी तिमाही के लिए अब तक का रिकॉर्ड है. जून 2022 तिमाही में कच्चे तेल का आयात औसतन 109 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के भाव पर किया गया था लेकिन खुदरा बिक्री की दरों को लगभग 85-86 डॉलर प्रति बैरल की लागत के हिसाब से तय किया गया था. इस तरह तेल कंपनियों को प्रति बैरल कच्चे तेल पर करीब 23-24 डॉलर का नुकसान खुद उठाना पड़ा.

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