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अभी खत्म नहीं होगी NBFCs की मुसीबत, FY20 में ग्रोथ घटकर 10-12% रहने का अनुमान: रिपोर्ट

एक साल से नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFC) कैश क्राइसिस की समस्या से जूझ रही हैं.

September 10, 2019 9:52 AM
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एक साल से नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFC) कैश क्राइसिस की समस्या से जूझ रही हैं. इनमें लिक्विडिटी बढ़ाने के भी सरकार द्वारा लगातार कोशिशें की जा रही हैं. लेकिन एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों की मुसीबत इतनी जल्दी खत्म होती नहीं दिख रही है. अर्थव्यवस्था में नरमी को देखते हुए चालू वित्त वर्ष तक यह बनी रह सकती है. घरेलू रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स ने रिपोर्ट जारी की है.

ग्रोथ रेट घटने का अनुमान

इंडिया रेटिंग्स के अनुसार अर्थव्यवस्था में सुस्ती के चलते नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों की ग्रोथ रेट 15 फीसदी से घटकर 10-12 फीसदी पर आ सकती है. घरेलू रेटिंग एजेंसी ने NBFC सेक्टर के आउटलुक को संशोधित करते हुए स्थिर से नकारात्मक कर दिया है. एजेंसी ने कहा कि हमने NBFC के लिए वित्त वर्ष 2019-20 के ग्रोथ अनुमान को घटाकर 10-12 फीसदी कर दिया है.

NBFC सेक्टर की मुसीबत के पीछे कारण

रेटिंग एजेंसी के अनुसार NBFC सेक्टर के आउटलुक को निगेटिव करने के पीछे वित्त पोषण चुनौती और आर्थिक नरमी है. वाहन बिक्री में नरमी, ग्रामीण बुनियादी ढांचा निर्माण गतिविधियों में सुस्ती और छोटी इकाइयों के समक्ष चुनौती है. आईएलएंडएफएस के पिछले साल सितंबर में कई बार चूक के बाद एनबीएफसी के समक्ष नकदी संकट की समस्या है.

एजेंसी ने कहा कि कई एनबीएफसी के बही-खातों का आकार मझोले आकार के बैंकों की तुलना में बड़ा है और उन्हें वित्त पोषण की जरूरत है. उनके पास बैंकों की तरह अंतिम ऋणदाता तक पहुंच नहीं होने को देखते हुए उन्हें अपनी नकदी के बारे में काफी सोच-समझकर योजना बनाने की आवश्यकता है.

NBFC का रीयल एस्टेट में फंसा पैसा

इंडिया रेटिंग्स के एसोसिएट डायरेक्टर पंकज नाइक ने कहा कि नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों ने रीयल एस्टेट डेवलपर कंपनियों को दिए गए कर्ज के मूल धन की वसूली पर 18-24 माह की स्थगन अवधि तय कर रखी है. रीयल एस्टेट डेवलपर इकाइयों पर उनका एक लाख करोड़ रुपये का बकाया है. नाइक ने कहा कि इनमें से 65-80 फीसदी खाते पिछले 18 से 24 महीनों में चालू हुए हैं. इनके मूल धन की वसूली के स्थगन की अवधि चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही या अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही में पूरी हो जाएगी.

उन्होंने कहा कि अगर इसी तरह की समस्या बनी रही तो कर्ज देने वाली इन कंपनियों के सामने रिण की गुणवत्ता की गंभीर चुनौती पैदा हो सकती है. लेकिन उन्होंने कहा कि सूक्ष्म रिण संस्थाओं के कर्जों की स्थिति ठीक चलने की उम्मीद है, क्योंकि भुगतान छोटे छोटे होते हैं और उनकी अवधि जल्दी जल्दी आती रहती है.

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