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भारत-चीन गलवान घाटी तनाव, समझें आपके निवेश पर क्या होगा असर

हाल ही में भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में तनाव बढ़ने से जियो पॉलिटिकल टेंशन बढ़ने की आशंका बढ़ गई है.

Published: June 25, 2020 7:02 AM
India-China Galwan Valley Tension, what impact on your investment, what impact on your stock investment, trade disrupt, which company will be least impacted, which company will be higher impactedहाल ही में भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में तनाव बढ़ने से जियो पॉलिटिकल टेंशन बढ़ने की आशंका बढ़ गई है.

हाल ही में भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में तनाव बढ़ने से जियो पॉलिटिकल टेंशन बढ़ने की आशंका बढ़ गई है. गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं में झड़प के बाद भारत और चीन के बीच भी कारोबारी पार्टनर रहे दोनों देशों के बीच कारोबारी रिश्ते भी बिगड़ते दिख रहे हैं. भारत की बात करें तो ट्रेड में चीन पर निर्भरता बहुत ज्यादा है. फिलहाल मौजूदा समय की बात करें तुरंत चीन का अल्टरनेटिव खोजना भी आसान नहीं दिख रहा है. ऐसे में तनाव बढ़ता है तो घरेलू स्तर कई सेक्टर या कंपनियों पर निगेटिव असर पड़ सकता है. इनमें फार्मा, कंज्यूमर ड्यूरेबल, टेलिकॉम, आटो मोबाइल के साथ साथ कुछ एग्रो कंपनियां भी शामिल हैं. इस बारे में ब्रोकरेज हाउस मोतीलाल ने एक रिपोर्ट जारी की है.

भारत और चीन के बीच ट्रेड

भारत की ट्रेड को लेकर निर्भरता चीन पर लगातार बढ़ी है. इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन (DIPP) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2000 की बात करें तो भारत का चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट शून्य फीसदी के करीब था. लेकिन धीरे धीरे भारत का इंपोर्ट बढ़ता गया. वित्त वर्ष 2020 की बात करें तो चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट बढ़कर 4860 करोड़ डॉलर हो गया जो देश की GDP का 1.7 फीसदी है. भारत का इंपोर्ट वित्त वर्ष 2000 में 2.6 फीसदी के मुकाबले वित्त वर्ष 2018 में रिकॉर्ड हाई 16.4 फीसदी पर पहुंच गया. हालांकि वित्त वर्ष 2019 में यह 14 फीसदी के करीब रहा. इस मुकाबले भारत का चीन को होने वाला एक्सपोर्ट FY20 में 1660 करोड़ डॉलर रहा यानी इंपोर्ट के मुकाबले 3 गुना कम.

किन सेक्टर में ज्यादा निर्भरता

अलग अलग सेक्टर की बात करें तो आटो, कंज्यूमर ड्यूरेबल, फार्मास्युटिकल्स, टेलि​कॉम, केमिकल्स, रीन्यूबल पावर सेक्टर की चीन के साथ निर्भता ज्यादा है. ज्यादातर मामलों में साफ कहें तो अभी चीन का अल्टरनेटिव भी भारत ने नहीं खेाजा है. कंज्यूमर ड्यूरेबल जहां कंनपोनेंट के लिए चीन पर निर्भर है, वहीं फार्मा सेक्टर API यानी दवा बनाने के लिए जरूरी इनग्रेडिएंट्स पर चीन पर निर्भर है. टेलिकॉम सेक्टर नेटवर्क स्टैंडप्वॉइंट के लिए चीन पर निर्भर है. मोबाइल सेकटर में इंडियन हैंडसेट मार्केट में 75 फीसदी कब्जा चीन की कंपनियों का हो गया है. अन्य सेक्टर भी मटेरियल या इक्यूपमेंट के लिए चीन पर बहुत हद तक निर्भर हैं. ऐसे में चीन के साथ गिगड़ते रिश्तों के बीच सप्लाई चेन टूटने का डर है.

किन कंपनियों को फायदा, किन्हें नुकसान

आटो सेक्टर की बात करें तो टायर कंपनियां इस परिस्थिति में फायदे में रहेंगी. टायर कंपनियां कई बार एंटी डंपिंग ड्यूटीज में बढ़ोत्तरी देख चुकी है. ऐसे में वे फायदे में रहेंगी. टाटा मोटर्स, मदरसन सूमी और भारत फोर्ज का बिजनेस डाइवर्सिफाई है. ऐसे में उन पर सप्लाई चेन टूटने का असर दूसरी आटो कंपनियों के मुकाबले कम होगा.

कूमिकल्स और एग्रो केमिकल्स की बात करें तो SRF, आरती इंडस्ट्रीज, अतुल लिमिटेड, भारत रसायन और एक्सेल इंडस्ट्रीज इसमें बेनेफिशियरी होंगी. जबकि रैलीज, धनुका, सुमितोमो इंडिया, इंसेक्टिसाइड इंडिया पर निगेटिव असर होगा. PI इंडस्ट्रीज, UPL, कोरोमंडल, बेसयर इंडिया पर असर बहुत कम होगा.

कंज्यूमर सेक्टर में हॉवेल्स और क्रॉम्पटन ग्रीव्स की निर्भरता चीन पर कम होने से इनमें कम असर दिखेगा. जबकि अगर टैरिफ बढ़ता है तो वोल्टास इसमें लूजर साबित हो सकता है.

फार्मा कंपनियां जरूरी इनग्रेडिएंट के लिए 60-70 फीसदी तक चीन पर निर्भर हैं. ऐसे में अगर इंपोट्र बाधित होता है तो फार्मा कंपनियों के प्रोडक्शन पर असर होगा. हालांकि ब्रांड बेसड बिजनेस के चलते सन फार्मा और सिप्ला पर दबाव सबसे कम होगा.

टेलिकॉम में बात करें तो नेटवर्क इक्यूपमेंट पर निर्भरता की वजह से वोडाफोन आइडिया और एयरटेल पर निगेटिव असर हो सकता है. लेकिन जियो की निर्भरता चीन पर कम है, इसलिए आरआईएल पर असर नहीं होगा.

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