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साढ़े 5 साल में पीएनबी के डूबते खाते में गए 28,500 करोड़ रुपये

जानकार बताते है कि कर्ज देने के आरबीआई ने नियम बनाए हैं और उसी के आधार पर कर्ज दिया जाता है. जब कर्ज लेने वाले की संपत्ति की कीमत शून्य हो जाती है, तब बैंक को कर्ज की राशि को राइट ऑफ करने की जरूरत पड़ती है ताकि, बैलेंस शीट में वह राशि नजर नहीं आए.

February 16, 2018 12:39 PM
Punjab national bank, pnb ghotala, pnb fraud, reserve bank of india, पंजाब नेशनल बैंक, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया, पीएनबी घोटालाअगर पीएनबी द्वारा साढ़े पांच साल में राइट ऑफ की गई राशि पर गौर करें तो एक बात साफ हो जाती है कि, जहां वर्ष 2012-13 में 997 करोड़ रुपये राइट ऑफ किए गए, वहीं वर्ष 2016-17 में 9209 करोड़ राइट ऑफ हुए. (Reuters)

पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) की मुंबई की एक शाखा में फर्जी लेनदेन के जरिए लगभग 11,500 करोड़ रुपये का घोटाला उजागर होने के बाद एक बात और सामने आई है कि इसी बैंक को बीते साढ़े पांच वर्षो में जबरदस्त घाटा हुआ है. यह बैंक विभिन्न लोगों को दिए कर्ज की रकम जब वसूल नहीं पाया तो आपसी समझौते से बतौर कर्ज 28,409 करोड़ रुपये डूबते खाते (राइट ऑफ ) में डाल दिया. सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आए दस्तावेजों में आरबीआई ने स्वीकार किया है कि वित्तीय वर्ष 2012-13 से लेकर सितंबर 2017 की अवधि में पंजाब नेशनल बैंक की आपसी समझौते के तहत 28,409 करोड़ की राशि राइट ऑफ की गई है.

मध्य प्रदेश के नीमच जिले के निवासी सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ को भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी बताती है कि पंजाब नेशनल बैंक की ओर से दिए गए कर्ज में से लंबित पड़े या यूं कहें कि ऐसा कर्ज, जो वापस न आने वाला है, उसमें से वर्ष 2012-13 में 997 करोड़, वर्ष 2013-14 में 1947 करोड़, वर्ष 2014-15 में 5996 करोड़, वर्ष 2015-16 में 6485 करोड़, वर्ष 2016-17 में 9205 करोड़ और वर्ष 2017 में छह माह अप्रैल से सितंबर तक 3778 करोड़ की राशि को आपसी समझौते के आधार पर राइट ऑफ किया गया है. आरबीआई की ओर से उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर देखा जाए, तो एक बात साफ हो जाती है कि पीएनबी के साढ़े पांच साल में 28,409 करोड़ रुपये राइट ऑफ किए गए हैं. अपने जवाब में आरबीआई ने इसे आपसी समझौते (इंक्लूडिंग कम्प्रोमाइज)के आधार पर राइट ऑफ किया जाना माना है.

बैंकिंग कारोबार से जुड़े अधिकारी ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर बताया है कि बैंकों की स्थिति गड़बड़ाने का एक बड़ा कारण एनपीए है और दूसरा उसे राइट ऑफ किया जाना. यह वह रकम होती है, जो वसूल नहीं की जा सकती. सीधे तौर पर कहा जाए तो यह राशि बैलेंस शीट से ही हटा दी जाती है. अगर पीएनबी द्वारा साढ़े पांच साल में राइट ऑफ की गई राशि पर गौर करें तो एक बात साफ हो जाती है कि, जहां वर्ष 2012-13 में 997 करोड़ रुपये राइट ऑफ किए गए, वहीं वर्ष 2016-17 में 9209 करोड़ राइट ऑफ हुए. साथ ही वर्ष 2017-18 के छह माह में 3778 करोड़ रुपये की राशि राइट ऑफ की जा चुकी है. समझौते के आधार पर राइट ऑफ किए जाने वाली राशि की मात्रा साल दर साल बढ़ती जा रही है.

जानकार बताते है कि कर्ज देने के आरबीआई ने नियम बनाए हैं और उसी के आधार पर कर्ज दिया जाता है. जब कर्ज लेने वाले की संपत्ति की कीमत शून्य हो जाती है, तब बैंक को कर्ज की राशि को राइट ऑफ करने की जरूरत पड़ती है ताकि, बैलेंस शीट में वह राशि नजर नहीं आए. इसका सबसे बुरा असर उन लोगों पर होता है, जो बैंक में रकम जमा करते हैं. राइट ऑफ होने के कारण ही ब्याज दरें कम हो रही है, बैंक कर्मचारियों की सुविधाओं में कटौती करनी पड़ रही है.

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