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कैसे होता है DA का कैलकुलेशन, जानें किन्हें मिलता है फायदा और इनकम टैक्स पर क्या होता है इसका असर?

सैलरी पाने वाले कर्मचारियों को डीए पर टैक्स देना पड़ता है. इनकम टैक्स रूल्स के मुताबिक कर्मचारियों को डीए का हिस्सा आईटीआर में अलग से भरना पड़ता है.

July 20, 2021 10:09 AM

सातवें वेतन आयोग के मुताबिक केंद्र सरकार ने अपने कर्मचारियों का महंगाई भत्ता यानी डीए (Dearness Allowance) 17 फीसदी से बढ़ा कर 28 फीसदी कर दिया है. 1 जुलाई से यह महंगाई भत्ता लागू भी हो गया है. साथ ही पेंशनर्स की डीआर ( Dearness relief) भी बढ़ा दी गई है. सरकार अपने कर्मचारियों और पेंशनर्स को महंगाई से बचाने के लिए भत्ता देती है. बढ़ती महंगाई की वजह से इसे बढ़ाना पड़ता है. साल में इसे दो बार यानी जनवरी और जुलाई में कैलकुलेट किया जाता है. शहरी, अर्द्धशहरी और ग्रामीण इलाकों के हिसाब से डीए अलग-अलग होता है. आइए जानते हैं इसे कैलकुलेट कैसे किया जाता है.

डीए कैलकुलेट करने का फॉर्मूला

सरकार ने 2006 में डीए कैलकुलेट के फॉर्मूले में बदलाव किया था. तब से इसी आधार पर डीए कैलकुलेट होता है. इस फॉर्मूले के आधार पर केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए डीए इस आधार पर कैलकुलेट होता है- {पिछले 12 महीनों का औसत ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स ( बेस ईयर-2001=100-115.76/115.76}X100. सेंट्रल पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों के लिए फॉर्मूला इस तरह है- { 3 महीनों का ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स का औसत ( बेस ईयर-2001=100-126.33/126.33}X100

कितनी बढ़ेगी सैलरी

केंद्र सरकार ने डीए, मूल वेतन (Basic Pay) का 28 फीसदी करने का फैसला किया है. पहले यह 17 फीसदी था लेकिन इसमें 11 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है. अगर किसी कर्मचारी की बेसिक सैलरी 30 हजार रुपये है तो 28 फीसदी के हिसाब से यह रकम 8,400 रुपये बैठेगी.

डीए टैक्स दायरे में आता है

सैलरी पाने वाले कर्मचारियों को डीए पर टैक्स देना पड़ता है. इनकम टैक्स रूल्स के मुताबिक कर्मचारियों को डीए का हिस्सा आईटीआर में अलग से भरना पड़ता है. डीए की दो कैटेगरी है. औद्योगिक महंगाई भत्ता ( Industrial Dearness Allowance) और वैरिएबल महंगाई भत्ता ( VDA). इंडस्ट्रियल महंगाई भत्ता केंद्र सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों पर लागू होता है और कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स ( CPI) के आधार पर हर तिमाही पर इसकी समीक्षा होती है.

वीडीए केंद्र सरकार के कर्मचारियों पर लागू होता है और कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) के आधार पर इसका हर छह महीने पर रिव्यू होता है. वीडीए भी तीन चीजों पर आधारित होता है- 1.बेस इंडेक्स 2. कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स और 3.सरकार की ओर से तय किया गया वीडीए. सरकार की ओर इसे संशोधित किए जाने तक यही लागू रहता है.

पेंशनर्स के लिए महंगाई भत्ता

पेंशनर्स के लिए महंगाई भत्ते को डियरनेस रिलीफ (DR) भी कहा जाता है. जब भी वेतन आयोग नया वेतन ढांचा बनाता है, उसमें बदलाव का असर रिटायर्ड कर्मचारियों की पेंशन पर भी पड़ता है. अगर महंगाई भत्ता बढ़ता है तो पेंशनर्स की डीआर भी बढ़ जाती है.

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कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स क्या है?

डीए की गणना कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स पर आधारित खुदरा महंगाई दर पर होती है. इसे आम उपभोक्ता वहन करता है. जबकि थोक महंगाई दर उत्पादक की ओर से अदा की गई कीमत होती है. खुदरा महंगाई दर सीधे तौर पर आम लोगों को प्रभावित करती है इसलिए डीए की गणना इसी आधार पर तय होती है.

डीए और एचआरए में अंतर

अक्सर लोग डीए और एचआरए को एक ही समझ लेते हैं. लेकिन दोनों में अंतर है. इनकम टैक्स के मुताबिक दोनों पर टैक्स देनदारी अलग-अलग होती है. एचआरए प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर कर्मचारी दोनों को मिलता है जबकि डीए सिर्फ पब्लिक सेक्टर के कर्मचारियों के लिए है. एचआरए के लिए कुछ टैक्स छूट भी है. लेकिन डीए पर कोई टैक्स छूट नहीं है. इस पर पूरा टैक्स लगता है.

इस तरह शुरू हुआ महंगाई भत्ता

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान महंगाई भत्ता देने की शुरुआत हुई थी. उस वक्त सैनिकों को खाने और दूसरी सुविधाओं के लिए तनख्वाह से अलग यह पैसा दिया जाता था. उस वक्त इसे खाद्य महंगाई भत्ता या डियरनेस फूड अलाउंस (Dearness food allowance) कहा जाता था. भारत में मुंबई से 1972 में सबसे पहले महंगाई भत्ते देने की शुरुआत हुई थी. इसके बाद केंद्र सरकार के सभी सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ता दिया जाने लगा.

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