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महंगा क्रूड बिगाड़ेगा मोदी सरकार की गणित! अर्थव्यवस्था को ऐसे दे सकता है बड़ा झटका

सुस्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मोदी सरकार के प्रयासों की राह में क्रूड चुनौती बन सकता है.

September 18, 2019 8:36 AM
Crude, Modi, Economy, Crude Prices Increase, CAD, Crude Import, Import Bill, क्रूड, मोदी सरकार, OPEC, crude impact on india economy, petrol and dieselसुस्त अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मोदी सरकार के प्रयासों की राह में क्रूड चुनौती बन सकता है.

देश की सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जहां मोदी सरकार कोई कसर नहीं छोड़ रही, वहीं क्रूड इस दिशा में बड़ी चुनौती बन सकता है. इंटरनेशनल मार्केट में सऊदी अरब की कंपनी अरामको के दो प्लांट पर ड्रोन हमलों के बाद जिस तरह से क्रूड की कीमतों में उछाल आया है, वह आगे भी जारी रहने की आशंका है. एक्सपर्ट का कहना है कि सप्लाई में रुकावट कब तक चलेगी, यह तय नहीं है. ऐसे में इसके भाव 80 डॉलर तक पहुंच जाएं तो इसमें हैरानी नहीं होगी. ऐसा हुआ तो भारत सरकार की बैलेंसशीट पर निगेटिव असर होगा. वहीं, कंज्यूमर्स को सुस्त जीडीपी के बाद अब महंगाई का सामना भी करना पड़ सकता है.

ड्रोन अटैक के कारण सऊदी अरब में ऑयल प्रोडक्शन का आधा हिस्सा ठप पड़ गया है, जोकि डेली ग्लोबल सप्लाई का 6 फीसदी है. बीते हफ्ते 60 डॉलर पर बंद होने के बाद क्रूड का भाव सोमवार को 70 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया. वहीं मंगलवार को यह 68 डॉलर पर ट्रेड कर रहा है. एक्सपर्ट क्रूड की की सप्लाई को लेकर सशंकित हैं. उनका कहना है कि सप्लाई में रुकावट कब तक चलेगी, यह तय नहीं है. वहीं विंटर सीजन पास होने से डिमांड आनी तय है. ऐसे में इसके भाव 80 डॉलर तक पहुंच जाएं तो इसमें हैरानी नहीं होगी.

Crude और इकोनॉमिक ग्रोथ का कनेक्शन

इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार, क्रूड की कीमतें अब 10 डॉलर बढ़ती हैं तो करंट अकाउंट डेफिसिट 1000 करोड़ डॉलर बढ़ सकता है. वहीं, इससे इकोनॉमिक ग्रोथ में 0.2 से 0.3 फीसदी तक कमी आती है. बता दें कि 1 जनवरी से अबतक क्रूड 22.59 फीसदी के करीब महंगा हो चुका है. वहीं, इससे WPI इनफ्लेशन में 1.7 फीसदी की बढ़ोत्तरी होती है.

CAD बढ़ने की आशंका

सिंगापुर के DBS बैंकिंग ग्रुप के अनुसार क्रूड की कीमतों में 10 फीसदी बढ़ोत्तरी होने से करंट अकाउंट डेफिसिटी 0.4 फीसदी से 0.5 फीसदी तक बढ़ सकता है. भारत अपनी जरूरतों का करीब 82 फीसदी क्रूड खरीदता है. ऐसे में क्रूड की कीमतें बढ़ने से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) बढ़ सकता है. क्रूड की कीमतें लगातार बढ़ने से भारत का इंपोर्ट बिल उसी रेश्‍यो में महंगा होगा, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट की स्थिति बिगड़ेगी. देश की अर्थव्यवस्था पर उल्टा असर पड़ने से आम आदमी भी प्रभावित होता है.

बढ़ेगा क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल

क्रूड की कीमतों के बढ़ने से भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ जाएगा. जेफरीज की रिपोर्ट के मुताबिक अगर क्रूड में 10 डॉलर का इजाफा होता है तो देश का क्रूड इंपोर्ट बिल सालाना आधार पर 1500 करोड़ डॉलर बढ़ सकता है. वित्त वर्ष 2017-18 में 22.043 करोड़ टन क्रूड के इंपोर्ट पर 87.7 अरब डॉलर यानी 5.65 लाख करोड़ रुपए खर्च किए थे. वित्त वर्ष 2018-19 में कुल 22.7 करोड़ टन क्रूड का इंपोर्ट किए जाने का अनुमान है, जिसपर करीब 115 अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं, जो 5 साल में सबसे ज्यादा होगा.

महंगा हो सकता है पेट्रोल-डीजल

HPCL के चेयरमैन एमके सुराना के अनुसार क्रूड की कीमतें 10 फीसदी बढ़ती हैं तो फ्यूल आउटलेट पर (पेट्रोल-डीजल) प्रोडक्ट की कीमतों पर भी पड़ सकता है. एक्सपर्ट भी मान रहे हैं कि क्रूड के कीमतों में तेजी जारी रही तो भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम करीब 8-10 फीसदी तक बढ़ सकते हैं. उनका कहना है कि इंपोर्ट बिल महंगा होने से सरकार का खर्च बढ़ेगा. आगे स्टेट इलेक्शन भी हैं, जिनमें खर्च ज्यादा होगा. ऐसे में बैलेंसशीट ठीक करने के लिए सरकार कंज्यूमर्स पर दबाव बढ़ा सकती है.

आगे क्रूड में तेजी के पीछे ये फैक्टर शामिल

वैसे तो सउदी ने कहा है कि वह सप्लाई में कमी दूर करने के लिए इन्वेंट्रीज का इस्तेमालज करेगा. लेकिन अभी यह तय नहीं है कि अरामको से सप्लाई क्राइसिस कितने दिनों तक बना रहेगा. अगर यह लंबा खिंचा तो ग्लोबल मार्केट में क्रूड के दाम बढ़ेंगे. वैसे भी पिछले दिनों
प्रमुख क्रूड उत्पादक देशों के संगठन ओपेक ने अपना स्टैंड साफ किया था कि वे आगे प्रोडक्शन कट करने पर कायम रहेंगे. हालांकि, ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक के महासचिव मोहम्मद बरकिंडो ने कहा है कि पैनिक होने की जरूरत नहीं है.

वहीं, अन्य प्रमुख उत्पादक देशों को भी यह समझ में आ रहा है कि क्रूड के भाव नीचे रहने का उन्हें फायदा नहीं है. वहीं यूएस में आगे इलेक्शन होने वाले हैं, जिनकी तैयारियां अभी से चलेंगी. यह सब क्रूड की कीमतों को सपोर्ट देने वाले फैक्टर हैं. दूसरी ओर युआन सहित प्रमुख एशियाई करंसी के साथ ही भारतीय रुपया भी कमजोर हुआ है. पिछले साल सितंबर में करीब 68 का भाव देखने के बाद यह 71 से 72 के बीच बना हुआ है.

(नोट: अजय केडिया, केडिया एडवाइजरी के डायरेक्टर और अनुज गुप्ता, एंजेल ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट (कमोडिटी एंड करंसी) से बात चीत और अलग अलग एजेंसियों की रिपोर्ट पर आधारित)

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