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MSME को अपना ‘भारत फंड’ कैसे देगा बूस्ट? रोजगार और रेवेन्यू बढ़ाने में बनेगा ‘गेमचेंजर’

MSME Sector: कोविड-19 ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बेहद निगेटिव असर डाला है. खासतौर से माइक्रो, स्मॉल और मीडियम उद्योगों (MSME) पर इसका ज्यादा ही असर पड़ा है.

March 9, 2021 1:27 PM
MSME SectorMSME Sector: कोविड-19 ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बेहद निगेटिव असर डाला है.

MSME Sector: कोविड-19 ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर बेहद निगेटिव असर डाला है. खासतौर से माइक्रो, स्मॉल और मीडियम उद्योगों (MSME) पर इसका ज्यादा ही असर पड़ा है. लगभग 10 करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले इस सेक्टर के रेवेन्यू में लॉकडाउन के चलते भारी गिरावट आई. सेक्टर के सामने वर्किंग कैपिटल की समस्या खड़ी हो गई है. इससे इसके सप्लाई चेन पर भी असर पड़ा हैं. पेमेंट में देरी हो रही है और श्रमिकों की कमी हो गई है. लिक्विडिटी की दिक्कतों ने सेक्टर को जोखिम में डाल दिया है और उसे अब घटे हुए स्केल पर काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है. लेकिन नए पॉलिसी हस्तक्षेप मसलन फंड ऑफ फंड्स को सही तरीके से लागू कर इस सेक्टर को मजबूती दी जा सकती है. वहीं एमएसएमई के लिए मौजूदा वेंचर कैपिटल इकोसिस्टम से अलग हटकर एक भारत फंड की जरूरत है.

डेट फाइनेंसिंग पर निर्भर

जहां तक इस सेक्टर की फंडिंग की बात है तो पंरपरागत तौर पर यह सेक्टर डेट फाइनेंसिंग पर निर्भर करता है. सरकार की ओर से तमाम निर्देशों के बावजूद वित्तीय संस्थान और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां इस सेक्टर को फंड देने में सतर्क रवैया अपनाती रही हैं. इन हालातों को देखते हुए भारत सरकार ने वित्तीय राहत के कदम के तौर पर ‘फंड ऑफ फंड्स’ स्कीम का ऐलान किया है. इससे देश में एमएसएमई सेक्टर के लिए 10 हजार करोड़ रुपये का पूंजी प्रवाह हो सकेगा. इससे देश भर में लगभग 25 लाख एमएसएमई उद्यमों को फंड हासिल हो सकेगा.

अगले वित्त वर्ष के बजट में इस अभियान के तहत आवंटन भी बढ़ा दिया गया है. इसका मकसद एमएसएमई को फंड मुहैया कराना है ताकि वे पूंजी की कमी के मौजूदा संकट से उबर सकें.
‘फंड ऑफ फंड्स’ के तहत ऐसे ट्रिपल-ए रेटेड एमएसएमई को फंड उपलब्ध कराया जाएगा जिनके पास फंड नहीं है या वे फिर किसी दूसरे स्रोत से फंड हासिल करने में सफल नहीं हो पाई हैं.

क्या यह MSME के लिए मददगार होगा?

भारत सरकार की ओर से घोषित फंड ऑफ फंड्स वास्तव में सही दिशा में उठाया गया कदम है. यह उन 25 लाख एमएसएमई उद्यमों को उबारने में मदद करेगा जो अपना विस्तार करने और बाजार में बने रहने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं. यह उन एमएसएमई के लिए भी मददगार साबित होगा जो बिल्कुल शुरुआती चरण में हैं. यह फंड उनकी 15 फीसदी तक इक्विटी खरीद सकता है. यह एमएसएमई को शेयर बाजार में लिस्ट होने में मदद करेगा. इससे न सिर्फ कई उद्यम मुख्यधारा में आएंगे बल्कि उपयुक्त क्रेडिट रेटिंग के साथ वे औपचारिक चैनलों से फंड भी हासिल कर सकेंगे.

क्रेडिट गारंटी स्कीम

इसके साथ ही सरकार ने एक क्रेडिट गारंटी स्कीम का ऐलान किया है. यह स्कीम एमएसएमई को संकट के दौरान लोन हासिल करने में मदद करेगी. परंपरागत तौर पर एमएसएमई के लिए लोन हासिल करना थोड़ा मुश्किल होता है क्योंकि इस सेक्टर के लिए ऊंचा क्रेडिट रिस्क जुड़ा होता है. हालांकि यह गारंटी एमएसएमई को वित्तीय संस्थानों से कर्ज दिलाने में मदद दिलाएगी.

छोटे कारोबारियों को दिक्कत

चूंकि यह फंड ट्रिपल-ए रेटेड एमएसएमई को ही हासिल है इसलिए यह स्कीम देश के ज्यादातर एमएसएमई के लिए पर्याप्त नहीं होगी. इसका मतलब यह कि उन छोटे कारोबारियों की समस्या बनी रहेगी जो हमेशा से औपचारिक वित्तीय चैनलों से फंड हासिल करने में दिक्कतों का सामना करते रहे हैं.

हालांकि एमएसएमई मंत्रालय की ओर शुरू की गई परफॉरमेंस एंड क्रेडिट रेटिंग स्कीम लंबी अवधि में इस समस्या का एक समाधान हो सकती है लेकिन इससे छोटे एमएसएमई को कोई खास राहत नहीं मिलेगी. मौजूदा हालातों ने उनके सामने संकट की स्थिति खड़ी कर दी है.

रीजनल एक्सचेंजों की जरूरत

अगर आप देश के एमएसएमई परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो पाएंगे कि हालात कितने असंतुलित हैं. दक्षिणी राज्यों में 77 लाख एमएसएमई हैं जिनमें एक करोड़ नब्बे लाख कामगार काम करते हैं. इसके बाद उत्तरी भारत, पश्चिमी भारत और उत्तर पूर्व का नंबर आता है.

इसलिए रीजनल एक्सचेंजों की जरूरत है ताकि एमएसएमई फंडिंग की दिशा में पहल की जा सके और एमएसएमई को उनके कारोबार के साइज और जरूरत के हिसाब से फंड मुहैया कराया जा सके. एक्सचेंजों के अलावा रिटेल निवेशकों के लिए इस सेक्टर को खोला भी जा सकता है. यह उन्हें इनकम टैक्स बेनिफिट भी दिला सकता है.

रीजनल एक्सचेंज क्यों जरूरी

रीजनल एक्सचेंज इसलिए भी जरूरी हैं कि इससे न सिर्फ गैर मेट्रो और मिनी मेट्रो शहरों के रिटेल निवेशकों को निवेश का मौका मिलेगा बल्कि संबंधित क्षेत्रों के खास बिजनेस को समझने का भी अवसर प्राप्त होगा. इससे उन्हें अच्छी वैल्यूएशन हासिल होगी साथ ही स्थानीय एमएसएमई की दिक्कतों और चुनौतियों की बेहतर समझ भी बन सकेगी. यह कैश फ्लो की बेहतर समझ भी बनाने में मदद कर सकता है.

MSME के लिए वैकल्पिक इको-सिस्टम की जरूरत क्यों?

एमएसएमई इकोनॉमी को रफ्तार देने में हम भूमिका अदा करता है इसलिए नीतियों और नियमन के जरिये इसे सावधानी से संवारना बेहद जरूरी है ताकि ये अपने पैरों पर खड़े हो सकें.

उभरते स्टार्ट-अप इको सिस्टम और रिकार्ड फंड इकट्ठा करने की खबरों के बीच जाने-माने वेंचर कैपिटल फंडों और स्टार्ट-अप की ओर से एक्सलरेटर/प्रोग्राम की संख्या में इजाफे पर ही सबका ध्यान रहता है. इसलिए सरकार और प्राइवेट प्लेयर्स की ओर से एमएसएमई को फंड और मानव संसाधन दोनो मुहैया कराने की जरूरत है. इससे भारत में एंटरप्रेन्योर इको-सिस्टम का विस्तार हो सकेगा.

जमीनी स्तर पर वैल्यू चेन को सर्विस देने वाले एमएसएमई से बुनियादी अर्थव्यवस्था को न सिर्फ ठोस रफ्तार मिलेगी बल्कि इससे जोखिम लेने, इनोवेशन और उद्यमिता की संस्कृति का भी विकास होगा. यह ग्लोबल मार्केट में भारत की क्षमताओं को और मजबूत करेगी

(लेखक- जितेन अरोरा, वेंचर लीड, SOLV)

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