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रुपये में कमजोरी सरकार और अर्थव्यवस्था के लिए बनी चुनौती, झेलने पड़ेंगे 5 बड़े नुकसान

पिछले साल नोटबंदी, जीएसटी और बैंकिंग सेक्टर में एनपीए ने भारत की इकोनॉमी पर बड़ा असर डाला और देश की ग्रोथ सुस्त रही. अब रुपये में कमजोरी ने सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है.

September 3, 2018 10:33 AM
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पिछले साल नोटबंदी, जीएसटी और बैंकिंग सेक्टर में एनपीए ने भारत की इकोनॉमी पर बड़ा असर डाला और देश की ग्रोथ सुस्त रही. सरकार का फोकस वित्त वर्ष 2018-19 में इकोनॉमी को वापस पटरी पर लाने का है लेकिन अब रुपये ने सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है. डॉलर के मुकाबले रुपया अबने अबतक के सबसे निचले स्तर पर है और शुक्रवार को यह पहली बार 71 प्रति डॉलर के भाव पर आ गया. एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि अभी घरेलू और ग्लोबल स्तर पर कई कारण हैं, जिससे रुपये में कमजोरी बढ़ेगी. ऐसे में रुपए का लगातार कमजोर होना न केवल देश की अर्थव्यवस्था बल्कि 2019 आम चुनावों के पहले मोदी सरकार के लिए बड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है.

पिछले साल की बात करें तो रुपये में लगातार मजबूती देखी गई थी. पिछले साल रुपया 6.75 फीसदी मजबूत हुआ था. लेकिन यह साल रुपये के लिहाज से बुरा रहा है और अबतक रुपये में करीब 11 फीसदी गिराट आ चुकी है. दूसरी ओर डॉलर इंडेक्स लगातार मजबूत हो रहा है. यह ट्रेंड अभी जारी रहने की उम्मीद है.

73/डॉलर का दिख सकता है स्तर

एंजेल ब्रोकिंग के डिप्टी वाइस प्रेसिडेंट रिसर्च, कमोडिटी एंड करंसी अनुज गुप्ता का कहना है कि तुर्की और अर्जेंटीना जैसी इमर्जिंग मार्केट की करंसी में कमजोरी, क्रूड की कीमतें हाई बनी रहने डॉलर की डिमांड बढ.ने से रुपये पर दबाव है. यूएस और चीन के बीच ट्रेड वार का भी असर फॉरेक्स मार्केट पर दिखा है. वहीं, यूएस फेड द्वारा ब्याज दरें बढ़ाए जाने के संकेत ने भी रुपये कमजोर किया है. आने वाले दिनों में रुपया 73 डॉलर का स्तर छू सकता है.

केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया का कहना है कि ग्लोबल कारणों के अलावा रुपये के लिए घरेलू स्तर पर भी संकेत बेहतर नहीं हैं. सरकार का रेवेन्यू कलेक्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं है, वहीं राजनैतिक अस्थिरता का माहौल अगले कुछ महीनों तक रहेगा. ऐसे में रुपये को सपोर्ट मिलता नहीं दिख रहा है. आने वाले कुछ हफ्तों में रुपया 72 प्रति डॉलर का स्तर पार कर सकता है.

कैसे बनेगा इकोनॉमी के लिए चैलेंज

1. क्रूड खरीदने पर ज्यादा खर्च, महंगाई बढ़ने का डर

भारत की आॅयल इंपोर्ट बिल 49 फीसदी बढ़कर 3464 करोड़ डॉलर रहा है. रुपये में कमजेारी और क्रूड के महंगा बने रहने से यह और बढ़ने का अनुमान है. भारत अपनी जरूरतों का 82 फीसदी क्रूड खरीदता है. रुपए में कमजोरी के चलते सरकार को क्रूड खरीदने के लिए डॉलर में ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। इससे ट्रेड डेफिसिट और फिर चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका बढ़ गई है. इन सब वजहों से देश में महंगाई भड़क सकती है.

2. जुलाई में ट्रेड डेफिसिट 5 साल में सबसे अधिक

रुपए में कमजोरी से इंपोर्ट महंगा होता है, जिसका सीधा असर ट्रेड डेफिसिट पर देखा जा सकता है. कॉमर्स मिनिस्ट्री के डाटा के अनुसार भारी-भरकम ऑयल इंपोर्ट बिल के चलते भारत का ट्रेड डेफिसिट यानी इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का गैप बढ़कर जुलाई में 1800 करोड़ डॉलर हो गया। यह 5 साल में सबसे अधिक है. ट्रेड डेफिसिट यानी व्यापार घाटे से चालू खाता घाटा बढ़ता है.

3. GDP का 2.5% रह सकता है CAD

मूडीज की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2018-19 में चालू खाता घाटा (CAD) जीडीपी का 2.5 फीसदी रह सकता है. मूडीज के अनुसार रुपये में गिरावट और क्रूड महंगा होने से ऐसा संभव है. वित्त वर्ष 2017-18 में यह 1.5 फीसदी था.

4. शेयर बाजार पर असर

डॉलर में लगातार मजबूती आने से शेयर बाजार से विदेशी निवेशकों के निकलने का खतरा बना है. अगस्त में पिछले कुछ महीनों के मुकाबले विदेशी निवेशकों का नजरिया घरेलू बाजार को लेकर बेहतर रहा है, लेकिन डॉलर में मजबूती बनी रही तो विदेशी निवेशक यहां तेजी से बिकवाली कर सकते हैं.

5. इंपोर्ट बेस्ड कंपनियों को नु​कसान

रुपए में गिरावट से इंपोर्ट बेस्ड कंपनियां प्रभावित होती हैं. उन्हें इंपोर्ट के बदले डॉलर में पेमेंट करना होता है. ऐसे में डॉलर मजबूत होने से कंपनियों को इंपोर्ट के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ता है. जिसका असर सीधे तौर पर उनके मार्जिन पर पड़ता है. कॉरपोरेट अर्निंग घटने का असर इकोनॉमी पर होता है. मसलन मिनरल्स, इंजीनियरिंग, केमिकल, इलेकट्रॉनिक्स, एडिबल ऑयल, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों, मेटल, माइनिंग और जेम्स एंड ज्वैलरी सेक्टर से जुड़ी कंपनियों को नुकसान होगा.

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