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सरकारी प्रोजेक्ट्स की बिडिंग में अब चीनी कंपनियां भी ले सकेंगी हिस्सा, बिना इस शर्त को पूरा किए नहीं मिलेगी मंजूरी

भारत ने चीनी कंपनियों को देश के सरकारी परियोजनाओं में हिस्सा लेने की मंजूरी दे दी है. यह सरकार के उस रुख के विपरीत है जिसके तहत हर संभव तरीके से चीनी कंपनियों को भारत में कारोबार से रोकने के लिए कदम उठाए गए.

Updated: Jun 16, 2021 1:35 PM
hina's cyberspace watchdog said it suspects Didi was involved in illegal collection and use of personal data. It did not cite any specific violations.hina's cyberspace watchdog said it suspects Didi was involved in illegal collection and use of personal data. It did not cite any specific violations.

भारत ने चीनी कंपनियों को देश के सरकारी परियोजनाओं में हिस्सा लेने की मंजूरी दे दी है. सरकार के फैसले के मुताबिक अब सरकारी परियोजनाओं के लिए घरेलू कंपनियां तकनीकी हस्तांतरण समझौते के जरिए चीनी कंपनियों के साथ मिलकर बोली लगा सकेंगी. यह सरकार के उस रुख के विपरीत है जिसके तहत पिछले साल चीन के साथ जारी विवाद के बीच हर संभव तरीके से चीनी कंपनियों को भारत में कारोबार से रोकने के लिए कदम उठाए गए. इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक सरकार द्वारा दी गई राहत से चीनी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में काम करना मुमकिन हुआ है.

पिछले साल की शुरुआत से ही भारत चीनी कंपनियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए हुए है. हुवावे और जेडटीई को सरकारी कंपनी बीएसएनएल या अन्य निजी टेलीकॉम ऑपरेटर्स के लिए नेटवर्क तैयार करने की मंजूरी नहीं दी गई. आयातित कंसाइनमेंट्स पर भी रोक लगाई गई थी लेकिन घरेलू कंपनियों ने उत्पादन प्रभावित होने के चलते गुहार लगाई तो कस्टम अथॉरिटीज ने कंसाइनमेंट्स को क्लियर करना शुरू किया.

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सीमा विवाद के बीच पिछले साल नियमों में हुआ था संसोधन

जुलाई 2020 में सीमा विवाद के बीच केंद्र सरकार ने जनरल फाइनेंशियल रूल्स में संसोधन किया था. इसके तहत प्रावधान किया गया कि भारत की सीमा से लगा हुआ कोई भी देश अगर भारत में किसी सरकारी प्रोजेक्ट के लिए बोली लगाना चाहता है तो पहले उसे कांपिटन्ट अथॉरिटी के पास खुद को रजिस्टर कराना होगा. हालांकि इस प्रावधान से उन देशों को राहत दी गई जिनके साथ भारत ने लाइन ऑफ क्रेडिट को बढ़ाया है या डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स में जुड़ा है. इससे नेपाल, भूटान और बांग्लादेश को राहत मिल गई. इस प्रावधान से चीन प्रभावित हुआ क्योंकि पाकिस्तान पहले से ही भारत के किसी सरकारी प्रोजेक्ट्स का हिस्सा नहीं है.

हालांकि इस महीने की शुरुआत में वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले डिपार्टमेंट ऑफ एक्सपेंडिचर के प्रोक्यूरमेंट पॉलिसी डिवीजन द्वारा जारी किए गए ऑफिस मेमोरेंडम में कहा गया है कि भारतीय सीमा से लगे देशों की कंपनियों के लिए नीलामी के लिए टीओटी (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर) अरेंजमेंट की जरूरत नहीं है. ऐसे में इन्हें कांपिटेंट अथॉरिटी के समक्ष रजिस्टर्ड होने की भी जरूरत नहीं है.

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टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए भारतीय कंपनियां करती हैं पेमेंट

आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए बोली लगाने के लिए भारतीय कंपनियों को इस राहत की जरूरत थी क्योंकि इन कंपनियों का कई चीनी कंपनियों के साथ तकनीकी हस्तांतरण का पैक्ट हुआ है, खासतौर से इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की कंपनियों का. इसके चलते प्रशासनिक मंत्रालयों ने वित्त मंत्रालय से ऐसी कंपनियों को नीलामी में हिस्सा लेने पर स्पष्टीकरण मांगा था कि इन्हें अनुमति दी जाये या अयोग्य घोषित कर दिया जाय. सूत्रों ने बताया कि तकनीकी हस्तांतरण भारतीय कंपनियां चीनी कंपनियों को पेमेंट कर के करती हैं और एग्जेक्यूटिंग फर्म भारतीय हैं तो यह राहत दी गई है.
(Article: Kiran Rathee)

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