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क्या वाकई देश में हो गई है कैश की किल्लत! 2016 के बाद सबसे बुरे दौर में नकदी के हालात

कंपनियों को फंड उपलब्ध कराने के लिए बैंकों या एनबीएफसी को केंद्रीय बैंक आरबीआई से कितना कर्ज लेने की जरूरत हैं, इसी से कैश किल्लत मापी जाती है.

Updated: May 16, 2019 9:48 PM
Funding crisis, Kotak, NBFC, IL&FS Group, Reserve Bank of India, real estate companies, reserve bank of india, bond marketसरकारी खर्चों और महंगे चुनाव के कारण भारतीय बैंकिंग सिस्टम में पिछले कुछ महीनों से कैश की किल्लत और बढ़ी है.

कॉरपोरेट सेक्टर और शैडो बैंकों को फंडिंग की समस्या न होने देने के लिए जरूरी है कि सिस्टम में और नगदी का प्रवाह सुनिश्चित किया जाए. यह बात देश के सबड़े बड़े मनी मैनेजर्स में एक ने कही. कोटक महिंद्रा एसेट मैनेजमेंट कॉरपोरेशन की डेट चीफ इंवेस्टमेंट ऑफिसर लक्ष्मी अय्यर ने एक इंटरव्यू में कहा कि नॉन-बैंकिंग फाइनेंसियल कंपनीज (एनबीएफसी) लंबे समय तक ऐसे बैंकों के लिए ‘सरोगेट वॉम्ब’ के तौर पर करती रही हैं जिन पर कर्ज देने के लिए नियामकीय सीमा निर्धारित हैं. अय्यर के मुताबिक अब यह ‘सरोगेसी’ बंद हो चुकी है और अगर जल्द ही सिस्टम में लिक्विडिटी नहीं बढ़ी तो  Cash Crisis बढ़ सकता है.

IL&FS Group के संकट से बढ़ी NBFC की समस्या

शैडो लेंडर इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंसियल सर्विसेज (आईएलएंडएफएस) की वित्तीय बदहाली के कारण एनबीएफसी संकट बढ़ा. एनबीएफसी के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि उन्होंने जिन लोगों को कर्ज दिया हुआ है, वे नगदी संकट के कारण चुकता नहीं कर पा रहे हैं. फंडिंग के लिए ऑयल इंडस्ट्री कंपनियां, स्टील उत्पादक, प्रॉपर्टी डेवलपर्स और मिनरल कंपनियां फंडिंग के लिए एनबीएफसी पर निर्भर हैं और अब उन्हें फंड जुटाने में समस्या हो रही है.

2016 के बाद से सबसे बुरी स्थिति में नगदी उपलब्धता

कंपनियों को फंड उपलब्ध कराने के लिए बैंकों या एनबीएफसी को केंद्रीय बैंक आरबीआई से कितना कर्ज लेने की जरूरत हैं, इसी से कैश किल्लत को मापा जाता है. ब्लूमबर्ग द्वारा कंपाइल किए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में इस समय नगदी की उपलब्धता 2016 के के बाद से सबसे निचले स्तर पर है. अय्यर के मुताबिक सरकारी खर्चों और महंगे चुनाव के कारण भारतीय बैंकिंग सिस्टम में पिछले कुछ महीनों से कैश की किल्लत और बढ़ी है.

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