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Boycott China: ​’हिंदुस्तानी राखी’ अभियान ने पकड़ा जोर, इस रक्षाबंधन चीन को ऐसे मिलेगा 4000 करोड़ का झटका

इस वर्ष देशभर में राखी का त्योहार "हिन्दुस्तानी राखी" के रूप में मनाया जाएगा और राखी बनाने अथवा बेचने में चीन का बना कोई भी सामान इस्तेमाल में नहीं लाया जाएगा.

Updated: Jul 16, 2020 7:47 PM

 

CAIT CALL FOR HINDUSTANI RAKHI GAINING MOMENTUM, plan to make a business loss of about 4000 crore rupee to China this rakshabandhanचीनी सामान के बहिष्कार का बहुआयामी राष्ट्रीय अभियान गत 10 जून से चलाया हुआ है.

इस वर्ष देशभर में राखी का त्योहार “हिन्दुस्तानी राखी” के रूप में मनाया जाएगा और राखी बनाने अथवा बेचने में चीन का बना कोई भी सामान इस्तेमाल में नहीं लाया जाएगा. “रेशम की डोर नहीं बस मौली बांध देना भाई की कलाई पर, मगर चीन की राखी मत खरीदना और याद रखना एक और भाई भी खड़ा है सीमा की चढ़ाई पर” इस बड़े संदेश को देश भर में फैलाते हुए कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने देश भर में “भारतीय सामान-हमारा अभिमान” के तहत चीनी सामान के बहिष्कार का बहुआयामी राष्ट्रीय अभियान गत 10 जून से चलाया हुआ है. कैट का कहना है कि राखी पहला त्योहार होगा, जिससे चीन को पता लगेगा कि किस मजबूती से देश चीनी वस्तुओं का बहिष्कार कर चीन को एक बड़ा सबक देने की ठान चुका है.

कैट का कहना है कि रक्षाबंधन के त्योहार पर भारत की बहनें भारतीय राखी का इस्तेमाल करते हुए चीन को लगभग 4 हजार करोड़ रुपये के व्यापार का घाटा पहुंचाएंगी. देश में राखी के त्योहार पर एक अनुमान के अनुसार लगभग 6 हजार करोड़ रुपये का राखियों का व्यापार होता है, जिसमें अकेले चीन की हिस्सेदारी लगभग 4 हजार करोड़ होती है. राखी पर चीन से जहां बनी हुई राखियां आती हैं, वहीं दूसरी ओर राखी बनाने का सामान जैसे फोम, कागज की पन्नी, राखी धागा, मोती, बूंदे, राखी के ऊपर लगने वाला सजावटी सामान आदि भी चीन से आयात होता है.

यूं तैयार हो रही हैं भारतीय राखियां

कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया एवं राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीन खंडेलवाल ने बताया कि इस अनूठे अभियान में दिल्ली सहित देशभर में कैट के व्यापारी नेता और महिला उद्यमी आंगनवाड़ी व घरों में काम करने वाली एवं कच्ची बस्तियों में रहने वाली महिलाओं से हाथ की बनी राखियां बनवा रहे हैं. वहीं 10 राखी के एक पैकेट के साथ रोली एवं चावल भी रखे जा रहे हैं और मिठाई के तौर पर एक पैकेट में मिश्री भी रखी जा रही है. एक बहुत सुंदर राखी थाल भी बनाया गया है. इस प्रकार के पैकेट देशभर में विभिन्न व्यापारिक संगठनों के माध्यम से व्यापारियों एवं उनके कर्मचारियों को दिए जा रहे हैं और देशभर के विभिन्न बाजारों में भी अनेक प्रकार की हिन्दुस्तानी राखियां पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं. इसके साथ ही जो लोग पिछले अनेक वर्षों से राखियां बनाते हुए आ रहे हैं, वे भी इस बार पर्याप्त मात्रा में भारतीय सामान से ही राखियां बना रहे हैं और किसी भी चीनी सामान का उपयोग नहीं कर रहे हैं.

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कैट ने अपनी इस पहल को अंजाम देते हुए दिल्ली के अलावा नागपुर, भोपाल, ग्वालियर, सूरत, कानपुर, तिनसुकिया, गुवाहाटी, रायपुर, भुवनेश्वर, कोल्हापुर, जम्मू, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, पुडुचेरी, मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, वाराणसी, झांसी, इलाहाबाद आदि शहरों में राखियां बनवा कर व्यापारियों को वितरित करने का काम शुरू कर दिया है.

“वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” की दिशा में है प्रयास

भरतिया एवं खंडेलवाल ने कहा कि राखियां बनवाने के इस काम से जहां महिलाओं को रोजगार उपलब्ध हो रहा है, वहीं राखी बनाने की उनकी कला भी सामने आ रही है. कैट का यह प्रयास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” के आवाह्न को पूरा करने की दिशा में एक बड़ा कदम है. राखियों का यह त्योहार विभिन्न वर्गों की महिलाओं की कल्पना शक्ति और क्रियाशीलता का जीता जागता प्रमाण है.

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