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पश्मीना शॉल इंडस्ट्री अभी तक झेल रही है नोटबंदी-GST की मार, 60% तक डाउन है बिजनेस

वर्किंग कैपिटल के अलावा ओरिजिनल हैंडमेड पश्मीना के नाम पर फेक पश्मीना भी मार्केट को ​डाउन कर रही है.

December 21, 2018 7:08 AM
business of pashmina shawl upto 60 percent decreaseहैंडीक्राफ्ट प्रॉडक्ट्स में पश्मीना भी शामिल है लेकिन इसे सरकार की ओर से किसी तरह की तवज्जो नहीं मिल रही है. (Reuters)

दुनिया भर में मशहूर कश्मीर की पश्मीना शॉल का बिजनेस इस साल भी सुस्ती की मार झेल रहा है. कारोबारियों का कहना है कि 2016 में हुई नोटबंदी के बाद पैदा हुई वर्किंग कैपिटल की किल्लत अभी तक असर डाल रही है, जिसके चलते बिजनेस आधा रह गया है. इसके अलावा फेक आइटम्स भी बिजनेस को और नुकसान पहुंचा रहे है.

पश्मीना शॉल्स के ओनर शाहिद शाह के मुताबिक, इस बार पश्मीना शॉल का बिजनेस 50-60 फीसदी तक डाउन हो गया है. बिजनेस में आई इस गिरावट की कई वजह हैं. इनमें से एक वजह नोटबंदी के बाद से पैदा हुई वर्किंग कैपिटल की कमी है.

पश्मीना शॉल कारोबारियों का कहना है कि वर्किंग कैपिटल के अलावा ओरिजिनल हैंडमेड पश्मीना के नाम पर फेक पश्मीना भी मार्केट को ​डाउन कर रही है. फेक और ओरिजिनल में फर्क कर पाना मुश्किल है, खासकर ऑनलाइन. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर हैंडमेड पश्मीना के नाम पर मशीन व मिक्स फैब्रिक वाली शॉल बेची जा रही हैं. ऐसे प्रॉडक्ट्स लोगों को कन्फ्यूज तो करते ही हैं, साथ ही उनकी कीमत भी कम होती है, जबकि ओरिजिनल हैंडमेड पश्मीना की कीमत लाखों तक जाती है.

प्रोत्साहन की भी है कमी

शाह ने बताया कि पश्मीना को उस तरह का प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा, जितना मिलना चाहिए. हैंडीक्राफ्ट प्रॉडक्ट्स में पश्मीना भी शामिल है लेकिन इसे सरकार की ओर से किसी तरह की तवज्जो नहीं मिल रही है. पहले एग्जीबीशन लगती थीं लेकिन अब वह भी बंद हो चुका है.

business of pashmina shawl upto 60 percent decreaseImage: pashminashawls.co.in

एक्सपोर्ट भी झेल रहा मंदी की मार

मेहराज क्राफ्ट्स के ओनर मेहराज बाबा ने बताया कि डॉमेस्टिक मार्केट के साथ-साथ एक्सपोर्ट के लेवल पर भी ​पश्मीना बिजनेस मंदी की मार झेल रहा है. इसमें भी एक हद तक फेक प्रॉडक्ट्स जिम्मेदार हैं. हालांकि चीन के मार्केट में अच्छी डिमांड देखने को मिल रही है, वहां एंब्रॉयडरी वाला प्रोडक्ट काफी पसंद किया जा रहा है. पर्ल क्रॉफ्ट्स के ओनर इरफान अहमद के मुताबिक, गल्फ कंट्रीज से काफी अच्छी डिमांड रहती थी लेकिन इस बार वहां से भी डिमांड सुस्त है.

GST ने बनाया और महंगा

पश्मीना पर 12 फीसदी GST है, जो नया टैक्स सिस्टम आने से पहले शून्य था. चूंकि यह महंगा प्रोडक्ट है तो टैक्स का अमाउंट भी ज्यादा रहता है, जिसके चलते पहले से महंगी पश्मीना और महंगी हो चली है.

कहां सबसे ज्‍यादा सप्‍लाई

पश्‍मीना शॉल के बिजनेस से कश्‍मीर के 60 फीसदी लोग जुड़े हैं. कश्‍मीर से इनकी सप्‍लाई सबसे ज्‍यादा दिल्‍ली और नॉर्थ इंडिया में होती है. बाहर के देशों की बात करें तो यूरोप, जर्मनी, गल्फ कंट्रीज जैसे कतर, सउदी आदि देशों में भी कश्‍मीर से पश्‍मीना शॉल का एक्‍सपोर्ट होता है.

बकरी से मिलती है पश्‍मीना वूल

लद्दाख में हिमालयन शॉल्‍स के ओनर अब्‍दुल बशीर के मुताबिक, पश्‍मीना वूल सबसे अच्‍छा वूल माना जाता है. यह बहुत ज्‍यादा ठंडी जगहों पर पाई जाने वाली बकरी से मिलता है. भारत में ऐसी बकरी लद्दाख में पाई जाती है. भारत में इसे पश्‍मीना वूल कहते हैं लेकिन यूरोप के लोग इसे कैश्‍मीर वूल कहते हैं. पश्‍मीना से बनने वाली शॉल पर कश्‍मीरी एंब्रॉयडरी की जाती है.

business of pashmina shawl upto 60 percent decreaseRepresentational Image

केवल कश्‍मीर में बनती है ओरिजिनल हैंडमेड पश्मीना

लद्दाख से पश्‍मीना वूल कश्‍मीर आता है और वहां इससे धागे और फिर धागे से पश्‍मीना शॉल बनाने की प्रोसेस और एंब्रॉयडरी होती है. वैसे तो पश्‍मीना शॉल फुली हैंडमेड होती है लेकिन कहीं-कहीं अब इसे मशीन से बनाया जाने लगा है. भारत में केवल कश्‍मीर में ही हैंडमेड पश्मीना की मैन्‍युफैक्‍चरिंग होती है. कश्‍मीर में कारीगर घर-घर में वूल से धागा बनाते हैं और फिर शॉल बनाई जाती है. उसके बाद उस पर एंब्रॉयडरी होती है. किसी-किसी बहुत ज्‍यादा बारीक और हैवी वर्क वाली को पूरा करने में में कारीगरों को 1 साल तक का समय लग जाता है.

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