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Mutual Fund: म्यूचुअल फंड के नियमों में हुए हैं ये 7 बड़े बदलाव, हर निवेशक के लिए जानना जरूरी

Mutual Funds Norms: निवेशकों के हितों को देखते हुए मार्केट रेगुलेटर सेबी ने म्यूचुअल फंड के नियमों में कुछ बदलाव किए हैं.

November 3, 2020 4:37 PM
Mutual Fund NormsMutual Funds Norms: निवेशकों के हितों को देखते हुए मार्केट रेगुलेटर सेबी ने म्यूचुअल फंड के नियमों में कुछ बदलाव किए हैं.

Mutual Funds Norms Change: पिछले दिनों म्यूचुअल फंड को लेकर खासतौर से डेट सेग्मेंट से कुछ निगेटिव खबरें आई थीं. कुछ फंडों के डिफाल्ट कर जाने की खबर आई तो वहीं, फ्रैंकलिन टेम्पलटन म्यूचुअल फंड की 6 क्रेडिट स्कीम पेमेंट न कर पाने के चलते बंद हो गईं. इसके बाद से निवेशकों के मन में म्यूचुअल फंड में रिस्क को लेकर डर बन गया. निवेशकों के हितों को देखते हुए मार्केट रेगुलेटर सेबी ने म्यूचुअल फंड के नियमों में कुछ बदलाव किए हैं, जिससे इनमें रिस्क को कम किया जा सके. साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगे. हालांकि सेबी ने डेट के अलावा इक्विटी सेग्मेंट के लिए भी कुछ नए मानक तय किए हैं. पिछले कुछ महीनों में ऐसे ही कुछ 10 बदलावों के बारे में हम आपको बता रहे हैं.

1. जोखिम की ठीक से पहचान

निवेशक म्यूचुअल फंड के जोखिम को ठीक तरह से पहचान सकें इसके लिए बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने बाजार नियामक सेबी ने निवेशकों को चेतावनी देने के लिए “very high risk” कटेगिरी की शुरुआत की है. सभी म्यूचुअल फंड्स को अब रिस्क-ओ-मीटर में 5 के बदले 6 संकेत दिखाने होंगे. सेबी के सर्कुलर के मुताबिक अब एक संकेत “very high risk” का भी होगा. इसके अलावा अन्य 5 श्रेणियों में लो, मॉडरेटरी लो, मॉडरेट, मॉडेटरी हाई और हाई हैं. अब इसमें वेरी हाई भी जोड़ा जाएगा. यह 1 जनवरी 2021 से लागू होगा.

2. नाम के अनुरूप होगा मल्टीकैप

SEBI ने मल्टीकैप म्यूचुअल फंड के लिए एसेट अलोकेशन के नियमों में बदलाव किया है. नए नियमों के मुताबिक अब फंड्स का 75 फीसदी हिस्सा इक्विटी में निवेश करना जरूरी होगा, जो कि अभी न्यूनतम 65 फीसदी है. SEBI के नए नियमों के मुताबिक मल्टी कैप फंड्स के स्ट्रक्चर में बदलाव होगा. फंडों को मिडकैप और स्मॉलकैप में 25-25 फीसदी निवेश करना जरूरी होगा. वहीं, 25 फीसदी लार्ज कैप में लगाना होगा. पहले फंड मैनेजर्स अपनी मनमर्जी के हिसाब से आवंटन करते थे. अभी मल्टीकैप में लार्जकैप का वेटेज ज्यादा रहता है. जनवरी 2021 से ये नया नियम लागू होगा.

3. पोर्टफोलियो का खुलासा

इस साल जुलाई में सेबी ने कहा था कि डेट म्यूचुअल फंड को 30 दिनों के बजाय हर 15 दिनों में अपने पोर्टफोलियो का खुलासा करना होगा. क्योंकि केवल चुनिंदा फंड ही महीने में दो बार अपने पोर्टफोलियो का खुलासा कर रहे थे. यह कदम किसी भी जोखिम को समझने में भी मदद करेगा.

4. लिक्विड फंड में बदलाव

सेबी ने लिक्विड फंडों को अपने पोर्टफोलियो का कम से कम 20 फीसदी हिस्सा लिक्विड एसेट्स जैसे कैश, टी बिल, सरकारी प्रतिभूतियां और हर समय सरकारी प्रतिभूतियों पर रेपो दर में रखना अनिवार्य कर दिया है. इसके अलावा, कम अवधि के लिए अपना पैसा जमा करने के लिए लिक्विड फंड का उपयोग करने से कॉरपोरेट्स को रोकने के उपाय किए हैं.

5. अनलिस्टेड एनसीडी में निवेश

सितंबर के अंत तक, सेबी ने म्यूचुअल फंड को नॉन कन्वर्टिबल डिबेंचर (एनसीडी) में निवेश करने की अनुमति दी थी, जो किसी स्कीम के डेट पोर्टफोलियो का अधिकतम 10 फीसदी तक होता है. इसका उद्देश्य म्युचुअल फंडों द्वारा ऋण और मुद्रा बाजार के साधनों में निवेश के लिए पारदर्शिता लाना है.

6. फंड मैनेजर्स, डीलर्स होंगे जवाबदेह

एएमसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) यह सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होंगे कि आचार संहिता का पालन फंड मैनेजर्स और डीलर्स द्वारा किया जा रहा है या नहीं. फंड मैनेजर और डीलर्स ट्रस्टी को तिमाही आधार पर सेल्फ सर्टिफिकेशन प्रस्तुत करेंगे कि उन्होंने आचार संहिता का पालन किया है. फंड मैनेजर के पास निवेश के निर्णय के लिए उचित और पर्याप्त आधार होने चाहिए होंगे और वही अपने द्वारा प्रबंधित फंड में निवेश के लिए जिम्मेदार होंगे. इसके अलावा, फंड मैनेजर सिक्योरिटीज में खरीद और बिक्री के बारे में डिटेल जस्टिफिकेशन के साथ लिखित में रिकॉर्ड रखेंगे.

7. प्रलोभन के मामले में

फंड मैनेजर्स को या डीलर्स को किसी भी ऐसी काउंटर पार्टी के साथ फंड की ओर से किसी भी लेनदेन को करने की अनुमति नहीं होगी, जो स्पांसर/एएमसी/फंड मैनेजर/डीलर/सीईओ के सहयोगी तौर पर जुड़ा है. वे यूनिटहोल्डर्स के धन के प्रबंधन के मामलों में किसी भी प्रलोभन की पेशकश को स्वीकार नहीं कर सकते हैं. फंड मैनेजर्स और डीलर्स को हमेशा स्पष्ट, पारदर्शी और सटीक तरीके से संवाद करना होगा और केवल दर्ज किए गए मोड और चैनलों के माध्यम से बाजार के घंटों के दौरान सभी संचार का संचालन करना होगा.

8. इंटर स्कीम ट्रांसफर

कैपिटल मार्केट रेग्‍युलेटर सेबी (SEBI) ने म्यूचुअल फंड्स निवेशकों के हितों की रक्षा के लिए इंटर स्‍कीम ट्रांसफर के मानकों को सख्त कर दिया है. बाजार नियामक के मुताबिक, एक फंड हाउस की ओर से लिक्विडिटी बढ़ाने की कोशिश करने और खत्‍म होने के बाद ही इंटर-स्कीम ट्रांसफर किया जा सकता है. इनमें योजनाओं में उपलब्ध नकद व कैश इक्विवेलेंट एसेट्स का इस्‍तेमाल और बाजारों में स्‍कीम एसेट्स की बिक्री शामिल होगी. सेबी के मुताबिक, यह सर्कुलर 1 जनवरी से लागू होंगे.

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